महाराष्ट्र में मानसून 2026: मराठवाड़ा में 40% बारिश की कमी, हिंगोली सबसे प्रभावित — IMD
सारांश
मुख्य बातें
भारत मौसम विज्ञान विभाग (IMD) के निदेशक बिक्रम सिंह ने 1 अक्टूबर 2026 को बताया कि महाराष्ट्र में इस मानसून सीजन में बारिश का वितरण गहरे असंतुलन के साथ समाप्त हुआ है — जहाँ मराठवाड़ा में सामान्य से करीब 40 प्रतिशत तक की कमी दर्ज की गई, वहीं उत्तरी महाराष्ट्र और कोंकण में अपेक्षाकृत बेहतर स्थिति रही। यह स्थिति आने वाले महीनों में कृषि, पेयजल और जलविद्युत उत्पादन के लिए गंभीर चुनौती बन सकती है।
मानसून का मासिक घटनाक्रम
बिक्रम सिंह के अनुसार, मानसून की शुरुआत जून 2026 में कमज़ोर रही और सक्रियता 23 से 25 जून के बाद ही देखी गई। इस दौरान उत्तरी महाराष्ट्र और कोंकण-गोवा क्षेत्र में अपेक्षाकृत अधिक बारिश हुई, जबकि मराठवाड़ा में वर्षा लगातार पिछड़ती रही।
जुलाई एकमात्र ऐसा महीना रहा जब राज्य को समग्र रूप से अच्छी बारिश मिली — एक सप्ताह के अंतराल को छोड़कर अधिकांश समय वर्षा सामान्य से अधिक रही। हालाँकि अगस्त और सितंबर में बारिश की गतिविधियाँ फिर कमज़ोर पड़ गईं और राज्य के अधिकांश हिस्सों में वर्षा सामान्य से नीचे रही।
सर्वाधिक प्रभावित जिले
IMD के आँकड़ों के अनुसार, मराठवाड़ा में सर्वाधिक कमी हिंगोली जिले में रही, जहाँ बारिश सामान्य से करीब 49 प्रतिशत कम रही। जालना में यह कमी लगभग 48 प्रतिशत और धाराशिव में करीब 45 प्रतिशत आँकी गई।
विदर्भ के अमरावती, वाशिम और कुछ अन्य जिलों में भी बारिश सामान्य से कम रही। गौरतलब है कि 30 सितंबर तक के 17 सप्ताह के मानसून काल में केवल 5 से 6 सप्ताह ही ऐसे रहे जब वर्षा सामान्य या उससे अधिक थी — शेष 11 से 12 सप्ताह में बारिश सामान्य से कम या कमी वाले स्तर पर रही।
जलस्रोतों पर संभावित असर
बिक्रम सिंह ने चेताया कि जुलाई की तीव्र वर्षा से कुछ जलाशयों में पानी तो आया, लेकिन भारी और अचानक बहाव के कारण भूजल पुनर्भरण की प्रक्रिया अपेक्षाकृत कम प्रभावी रही। निरंतर बारिश के अभाव में नदियों और जलधाराओं में जल-स्तर धीरे-धीरे घट सकता है।
यह ऐसे समय में आया है जब महाराष्ट्र के कई सूखाग्रस्त जिले पहले से ही जल संकट की आशंका से जूझ रहे हैं। विशेषज्ञों का मानना है कि लगातार बारिश के बिना भूजल पुनर्भरण अधूरा रह जाता है, जिससे रबी फसल के लिए सिंचाई की उपलब्धता पर सीधा दबाव पड़ता है।
कृषि और जल प्रबंधन पर चेतावनी
IMD निदेशक ने सिंचाई और जलापूर्ति विभागों को सतर्क रहने की सलाह दी है। उनके अनुसार, सिंचाई के तरीकों, जलापूर्ति और संभावित पानी की कटौती जैसे विषयों पर समय रहते योजना बनाना आवश्यक है। मराठवाड़ा और विदर्भ जैसे बारिश की कमी वाले क्षेत्रों में खरीफ फसल पर भी प्रतिकूल प्रभाव पड़ने की आशंका जताई गई है।
उपलब्ध जल संसाधनों के विवेकपूर्ण उपयोग पर ज़ोर देते हुए उन्होंने कहा कि आने वाले महीनों में जल प्रबंधन को सर्वोच्च प्राथमिकता देना होगी — खासतौर पर ऐसे जिलों में जहाँ मानसूनी बारिश की कमी 40 प्रतिशत से अधिक रही है।