माखनलाल विश्वविद्यालय में SC/ST वक्ताओं की अनुपस्थिति पर कांग्रेस का सवाल, संघ विचारधारा का आरोप
सारांश
मुख्य बातें
मध्य प्रदेश कांग्रेस अनुसूचित जाति विभाग के प्रदेश अध्यक्ष प्रदीप अहिरवार ने 17 अगस्त 2026 को माखनलाल चतुर्वेदी राष्ट्रीय पत्रकारिता एवं संचार विश्वविद्यालय (एमसीयू), भोपाल में आयोजित होने वाले तीन दिवसीय नवागत विद्यार्थी प्रबोधन कार्यक्रम की वक्ता सूची पर गंभीर सवाल उठाए। उनका आरोप है कि 18 से 20 अगस्त तक चलने वाले इस कार्यक्रम में अनुसूचित जाति (SC) और अनुसूचित जनजाति (ST) वर्ग से किसी भी वक्ता का स्पष्ट प्रतिनिधित्व नहीं है।
मुख्य आरोप और चिंताएँ
अहिरवार ने कहा कि विश्वविद्यालय द्वारा जारी वक्ताओं की सूची में बड़ी संख्या में आमंत्रितों के बावजूद वंचित और ऐतिहासिक रूप से कम प्रतिनिधित्व वाले वर्गों को मंच पर स्थान नहीं दिया गया। उन्होंने इसे 'बेहद चिंताजनक और निंदनीय' बताया। उनके अनुसार, पत्रकारिता एवं संचार जैसे संवेदनशील क्षेत्र में विद्यार्थियों को समाज के सभी वर्गों के अनुभवों से परिचित कराना विश्वविद्यालय की मूलभूत जिम्मेदारी है।
संघ विचारधारा का आरोप
कांग्रेस नेता ने आरोप लगाया कि माखनलाल विश्वविद्यालय का समग्र वातावरण राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (RSS) की विचारधारा से प्रभावित दिखाई देता है और इसी मानसिकता का प्रतिबिंब कार्यक्रम की वक्ता चयन प्रक्रिया में भी नजर आता है। अहिरवार ने स्पष्ट किया कि उनकी आपत्ति किसी वक्ता की व्यक्तिगत योग्यता पर नहीं, बल्कि चयन प्रक्रिया की सामाजिक समावेशिता पर है।
सामाजिक प्रतिनिधित्व का सवाल
अहिरवार ने तर्क दिया कि मध्य प्रदेश में अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति समाज की बड़ी आबादी है। इसके बावजूद इन वर्गों से आने वाले पत्रकारों, शिक्षाविदों, लेखकों और विशेषज्ञों को विद्यार्थियों से संवाद के अवसर से वंचित रखना सामाजिक न्याय के सिद्धांतों के विरुद्ध है। यह ऐसे समय में आया है जब उच्च शिक्षण संस्थानों में समावेशी प्रतिनिधित्व पर राष्ट्रीय स्तर पर बहस तेज हो रही है।
विश्वविद्यालय की जिम्मेदारी पर जोर
कांग्रेस नेता ने कहा कि यदि विश्वविद्यालय वास्तव में सामाजिक न्याय, समान अवसर और समावेशी सोच को महत्व देता तो दलित और आदिवासी समाज के प्रतिनिधियों को भी इस महत्वपूर्ण मंच पर आमंत्रित किया जाता। गौरतलब है कि एमसीयू एक सार्वजनिक विश्वविद्यालय है और इस पर संविधान प्रदत्त समानता के सिद्धांतों का पालन करने का दायित्व है। विश्वविद्यालय प्रशासन की ओर से इन आरोपों पर अभी तक कोई आधिकारिक प्रतिक्रिया सामने नहीं आई है।