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एनसीईआरटी की कक्षा-9 की किताब में पहली बार 'आपातकाल' अध्याय, लोकतंत्र की बड़ी चुनौती के रूप में वर्णन

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एनसीईआरटी की कक्षा-9 की किताब में पहली बार 'आपातकाल' अध्याय, लोकतंत्र की बड़ी चुनौती के रूप में वर्णन

सारांश

पाँच दशक बाद एनसीईआरटी ने कक्षा 9 की किताब में 1975 का आपातकाल शामिल किया — 21 महीने की संवैधानिक बंदिशें, जयप्रकाश नारायण का प्रतिरोध और 1977 की मतपेटी से वापसी। यह बदलाव आपातकाल की 50वीं वर्षगाँठ पर आया है और भावी पीढ़ी को लोकतंत्र के उस कठिन अध्याय से रूबरू कराएगा।

मुख्य बातें

एनसीईआरटी ने पहली बार कक्षा 9 की सामाजिक विज्ञान पाठ्यपुस्तक 'अंडरस्टैंडिंग सोसाइटी: इंडिया एंड बियॉन्ड' में 1975 के आपातकाल को शामिल किया।
यह बदलाव आपातकाल की 50वीं वर्षगाँठ ( 25 जून 2025 ) के अवसर पर किया गया है।
पुस्तक में बताया गया है कि आपातकाल के दौरान 21 महीने तक संवैधानिक स्वतंत्रताएँ निलंबित रहीं और प्रेस सेंसरशिप लागू थी।
लोकनायक जयप्रकाश नारायण की बिहार व गुजरात में प्रतिरोध आंदोलन की भूमिका को विशेष स्थान दिया गया है।
1977 के चुनावों को लोकतंत्र की पुनर्स्थापना के प्रमाण के रूप में प्रस्तुत किया गया है।
नई पुस्तक में 'डेमोक्रेसी एंड यू' खंड भी जोड़ा गया है, जो छात्रों को नागरिक दायित्व से परिचित कराएगा।

राष्ट्रीय शैक्षिक अनुसंधान और प्रशिक्षण परिषद (एनसीईआरटी) ने 25 जून 2025 को पहली बार कक्षा 9 की सामाजिक विज्ञान पाठ्यपुस्तक में 1975 के आपातकाल को शामिल किया है — यह कदम आपातकाल की 50वीं वर्षगाँठ के अवसर पर उठाया गया है। नई पुस्तक 'अंडरस्टैंडिंग सोसाइटी: इंडिया एंड बियॉन्ड' में इस ऐतिहासिक कालखंड को भारतीय लोकतंत्र के समक्ष आई एक गंभीर चुनौती के रूप में प्रस्तुत किया गया है।

पाठ्यपुस्तक में क्या शामिल है

एनसीईआरटी अधिकारियों के अनुसार, यह पहला अवसर है जब कक्षा 9 के विद्यार्थियों को आपातकाल के इतिहास और उसके व्यापक प्रभावों के बारे में विस्तारपूर्वक पढ़ाया जाएगा। पुस्तक में लोकतंत्र की उपलब्धियों और चुनौतियों पर आधारित अध्याय के अंतर्गत यह विषय रखा गया है। इसमें उन राजनीतिक और सामाजिक परिस्थितियों का विस्तृत उल्लेख है जिनके चलते जून 1975 में राष्ट्रीय आपातकाल घोषित किया गया था।

आपातकाल की पृष्ठभूमि और प्रभाव

पाठ्यपुस्तक के अनुसार, 1970 के दशक की शुरुआत में देश में बढ़ती बेरोज़गारी, महँगाई और शासन व्यवस्था को लेकर व्यापक असंतोष था। इन हालात में कई राज्यों में विरोध प्रदर्शन और राजनीतिक अशांति का माहौल बना, जिसके परिणामस्वरूप 'आंतरिक अशांति' के आधार पर राष्ट्रीय आपातकाल लागू किया गया।

किताब में बताया गया है कि इसके बाद 21 महीनों तक कई संवैधानिक स्वतंत्रताएँ निलंबित रहीं। प्रेस सेंसरशिप लागू की गई, अनेक विपक्षी नेताओं और सामाजिक कार्यकर्ताओं को हिरासत में लिया गया, और लोकतांत्रिक संस्थाओं पर गहरा दबाव पड़ा।

जयप्रकाश नारायण की भूमिका

पाठ्यपुस्तक में 'लोकनायक' के नाम से विख्यात वरिष्ठ नेता और समाज सुधारक जयप्रकाश नारायण की भूमिका का विशेष उल्लेख किया गया है। पुस्तक के अनुसार, उन्होंने आपातकाल के विरोध में छात्रों, युवाओं और आम नागरिकों को एकजुट किया। विशेष रूप से बिहार और गुजरात में उनके नेतृत्व में चले आंदोलनों ने लोकतांत्रिक सुधारों की माँग को व्यापक रूप दिया।

लोकतंत्र की पुनर्स्थापना और आधुनिक चुनौतियाँ

किताब में यह भी दर्ज है कि 1977 में आपातकाल की समाप्ति के बाद हुए आम चुनावों ने भारतीय लोकतंत्र की मज़बूती को प्रमाणित किया, क्योंकि मतदाताओं ने मतपेटी के ज़रिये निर्णायक राजनीतिक बदलाव को संभव किया।

आपातकाल के अतिरिक्त, नई पाठ्यपुस्तक में फेक न्यूज़, गलत सूचनाओं, गरीबी, क्षेत्रीय विभाजन, सामाजिक भेदभाव और लैंगिक असमानता जैसी समकालीन चुनौतियों पर भी विमर्श शामिल है। साथ ही 'डेमोक्रेसी एंड यू' नामक एक नया खंड जोड़ा गया है, जिसका उद्देश्य विद्यार्थियों को लोकतांत्रिक मूल्यों और एक ज़िम्मेदार नागरिक की भूमिका से परिचित कराना है।

पुस्तक में मीडिया की लोकतंत्र के चौथे स्तंभ के रूप में भूमिका, मतदान प्रक्रिया, पंचायत व्यवस्था, महिलाओं के मतदान अधिकार और स्थानीय निकायों में आरक्षण जैसे विषयों को भी विस्तार से समेटा गया है। यह पाठ्यक्रम परिवर्तन संकेत देता है कि भारत का शैक्षिक ढाँचा इतिहास के कठिन अध्यायों को भावी पीढ़ी के समक्ष रखने की दिशा में आगे बढ़ रहा है।

संपादकीय दृष्टिकोण

और यह रुख किस हद तक तथ्यात्मक संतुलन बनाए रखता है — यह प्रश्न शिक्षाविदों के बीच बहस का विषय बनेगा। गौरतलब है कि दशकों तक इस कालखंड को पाठ्यपुस्तकों में जगह न मिलना भी एक चुप्पी थी, जिसके अपने निहितार्थ थे। असली कसौटी यह होगी कि कक्षा में शिक्षक इस अध्याय को किस गहराई और निष्पक्षता से पढ़ाते हैं — क्योंकि पाठ्यपुस्तक में शब्द डालना और विद्यार्थियों में आलोचनात्मक सोच विकसित करना दो अलग-अलग काम हैं।
RashtraPress
10 अगस्त 2026

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

एनसीईआरटी की कक्षा 9 की नई किताब में आपातकाल को कैसे प्रस्तुत किया गया है?
नई पाठ्यपुस्तक 'अंडरस्टैंडिंग सोसाइटी: इंडिया एंड बियॉन्ड' में 1975 के आपातकाल को भारतीय लोकतंत्र के समक्ष आई एक बड़ी चुनौती के रूप में दर्शाया गया है। इसमें आपातकाल की पृष्ठभूमि, 21 महीनों की संवैधानिक बंदिशें और 1977 के चुनावों में लोकतंत्र की पुनर्स्थापना का विवरण है।
एनसीईआरटी ने पहली बार आपातकाल को कक्षा 9 में क्यों शामिल किया?
एनसीईआरटी अधिकारियों के अनुसार, यह बदलाव 1975 के आपातकाल की 50वीं वर्षगाँठ के अवसर पर किया गया है। इससे पहले कक्षा 9 स्तर पर इस विषय को विस्तार से नहीं पढ़ाया जाता था।
पाठ्यपुस्तक में जयप्रकाश नारायण की क्या भूमिका बताई गई है?
'लोकनायक' जयप्रकाश नारायण को आपातकाल के प्रतिरोध के प्रमुख नेता के रूप में प्रस्तुत किया गया है। पुस्तक के अनुसार, उन्होंने बिहार और गुजरात में छात्रों, युवाओं और आम नागरिकों को एकजुट कर लोकतांत्रिक सुधारों की माँग को व्यापक आधार दिया।
नई एनसीईआरटी पुस्तक में आपातकाल के अलावा और क्या नया है?
पुस्तक में फेक न्यूज़, गरीबी, लैंगिक असमानता और सामाजिक भेदभाव जैसी आधुनिक चुनौतियाँ भी शामिल हैं। 'डेमोक्रेसी एंड यू' नामक नया खंड छात्रों को नागरिक दायित्व और लोकतांत्रिक मूल्यों से परिचित कराने के लिए जोड़ा गया है।
1975 का आपातकाल क्या था और यह कितने समय तक चला?
जून 1975 में 'आंतरिक अशांति' के आधार पर राष्ट्रीय आपातकाल घोषित किया गया था, जो 21 महीनों तक लागू रहा। इस दौरान प्रेस सेंसरशिप लागू हुई, विपक्षी नेताओं को हिरासत में लिया गया और कई संवैधानिक स्वतंत्रताएँ निलंबित रहीं; 1977 के चुनावों के बाद यह समाप्त हुआ।
राष्ट्र प्रेस
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