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NEP 2020 की सोच सकारात्मक, लेकिन ज़मीनी क्रियान्वयन अधूरा: दृष्टिबाधित छात्रा सुकृति सूरी

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NEP 2020 की सोच सकारात्मक, लेकिन ज़मीनी क्रियान्वयन अधूरा: दृष्टिबाधित छात्रा सुकृति सूरी

सारांश

दृष्टिबाधित छात्रा सुकृति सूरी की आवाज़ NEP 2020 की असली परीक्षा को उजागर करती है — नीति कागज़ पर मज़बूत है, लेकिन स्मार्ट बोर्ड से वंचित स्कूल, CUET का दबाव और दिव्यांग छात्रों के लिए अधूरा ढाँचा बताता है कि इरादे और अमल के बीच की खाई अभी बड़ी है।

मुख्य बातें

दृष्टिबाधित छात्रा सुकृति सूरी ने जम्मू से NEP 2020 के ज़मीनी क्रियान्वयन को 'बहुत धीमा' बताया।
अनेक सरकारी और निजी स्कूलों में स्मार्ट बोर्ड और डिजिटल सुविधाएँ अभी भी अनुपलब्ध हैं।
CUET की परीक्षा प्रणाली और स्कूल स्तर की सरल शिक्षा के बीच के अंतर से छात्रों पर मानसिक दबाव बढ़ रहा है।
केवल MCQ -आधारित मूल्यांकन को अपर्याप्त बताते हुए वर्णनात्मक प्रश्नों को शामिल करने का सुझाव दिया।
दिव्यांग छात्रों के लिए समर्पित शिकायत निवारण पोर्टल बनाने की माँग।
पेपर लीक की घटनाओं को शिक्षा तंत्र की विश्वसनीयता के लिए गंभीर खतरा बताया।

दृष्टिबाधित छात्रा सुकृति सूरी ने 18 जुलाई को जम्मू से राष्ट्रीय शिक्षा नीति (NEP 2020) पर अपनी राय साझा करते हुए कहा कि इस नीति के उद्देश्य और दिशा सकारात्मक हैं, किंतु इसका वास्तविक प्रभाव तभी सामने आएगा जब इसे ज़मीनी स्तर पर पूरी गंभीरता और संसाधनों के साथ लागू किया जाएगा। उन्होंने विशेष रूप से दिव्यांग छात्रों के लिए सुलभ शिक्षण सामग्री, सहायक तकनीक, प्रशिक्षित शिक्षकों और सशक्त शिकायत निवारण तंत्र की माँग रखी।

नीति की उम्मीद और धीमी रफ़्तार

सुकृति सूरी ने कहा कि जब 2020 में राष्ट्रीय शिक्षा नीति घोषित हुई, तब उन्हें शिक्षा व्यवस्था में बड़े और त्वरित बदलावों की उम्मीद थी। लेकिन वास्तविकता में बदलाव की गति काफी मंद रही है। सरकार की ओर से कई डिजिटल ऐप और तकनीकी संसाधन तैयार किए जा रहे हैं, परंतु इनका लाभ सभी सरकारी और निजी स्कूलों तक समान रूप से नहीं पहुँच पा रहा। उन्होंने बताया कि अनेक स्कूलों में स्मार्ट बोर्ड और बुनियादी डिजिटल सुविधाएँ अभी भी अनुपलब्ध हैं, जिससे नई शिक्षा प्रणाली का उद्देश्य पूरी तरह साकार नहीं हो पा रहा।

प्रैक्टिकल शिक्षा और बुनियादी ढाँचे का अभाव

सुकृति ने NEP में प्रायोगिक एवं व्यावहारिक शिक्षा पर दिए गए ज़ोर को एक अच्छी पहल बताया, लेकिन साथ ही यह भी स्पष्ट किया कि इसके लिए आवश्यक बुनियादी ढाँचा और संसाधन अभी पर्याप्त नहीं हैं। उनके अनुसार केवल पाठ्यक्रम का बोझ घटाने या छात्रों का तनाव कम करने से उद्देश्य पूरा नहीं होगा — स्कूलों को व्यावहारिक शिक्षा के अनुरूप तैयार करना भी उतना ही ज़रूरी है।

उन्होंने कॉमन यूनिवर्सिटी एंट्रेंस टेस्ट (CUET) को लेकर भी चिंता जताई। उनका कहना था कि स्कूल स्तर पर पाठ्यक्रम को सरल बनाने की कोशिश और कॉलेज प्रवेश की परीक्षा प्रणाली के बीच एक बड़ा अंतर है। इससे छात्र अचानक बदली हुई परीक्षा पद्धति के लिए तैयार नहीं हो पाते और मानसिक दबाव बढ़ जाता है।

MCQ-आधारित मूल्यांकन पर सवाल

सुकृति सूरी ने यह भी कहा कि केवल बहुविकल्पीय प्रश्नों (MCQ) के आधार पर किसी छात्र की विषय की गहराई और विश्लेषण क्षमता का सही मूल्यांकन नहीं किया जा सकता। उन्होंने सुझाव दिया कि प्रतियोगी परीक्षाओं में वस्तुनिष्ठ प्रश्नों के साथ-साथ वर्णनात्मक और विश्लेषणात्मक प्रश्न भी शामिल किए जाने चाहिए। इसके अलावा, स्कूल और कॉलेज में छात्रों के शैक्षणिक प्रदर्शन को भी प्रवेश प्रक्रिया में उचित महत्व दिया जाना चाहिए।

विषय-संयोजन की स्वतंत्रता और शिक्षकों की दोहरी ज़िम्मेदारी

सुकृति ने NEP के उस प्रावधान की सराहना की जिसमें छात्रों को विभिन्न विषयों के स्वतंत्र संयोजन चुनने का अधिकार दिया गया है — जैसे कि भौतिकी के साथ इतिहास पढ़ने का विकल्प। लेकिन उन्होंने स्वीकार किया कि यह व्यवस्था अधिकांश संस्थानों में अभी व्यावहारिक रूप नहीं ले पाई है।

उन्होंने यह भी उठाया कि सरकारी स्कूलों के शिक्षकों को चुनाव ड्यूटी और अन्य प्रशासनिक कार्यों में लगाया जाता है, जिससे पढ़ाई प्रभावित होती है। उनका सुझाव था कि ऐसे कार्यों के लिए अलग से कर्मचारियों की नियुक्ति की जाए — इससे रोज़गार के अवसर भी बढ़ेंगे और शिक्षकों का ध्यान पूरी तरह शिक्षा पर केंद्रित रहेगा।

दिव्यांग छात्रों और पेपर लीक पर माँगें

सुकृति ने माँग की कि दिव्यांग छात्रों से जुड़े मामलों के लिए एक समर्पित शिकायत निवारण पोर्टल बनाया जाए, जहाँ शिकायतों का समयबद्ध समाधान सुनिश्चित हो। उन्होंने सरकार से अपील की कि नीति के क्रियान्वयन में शिक्षा विशेषज्ञों और दिव्यांगजनों के साथ काम करने वाले विशेषज्ञों की राय को प्राथमिकता दी जाए।

पेपर लीक की घटनाओं पर उन्होंने कहा कि ऐसी घटनाएँ छात्रों के मनोबल और पूरे शिक्षा तंत्र की विश्वसनीयता को गंभीर रूप से कमज़ोर करती हैं। वर्षों की मेहनत, मानसिक और आर्थिक संघर्ष के बाद यदि परीक्षा प्रणाली में गड़बड़ी सामने आती है, तो छात्रों का सिस्टम पर भरोसा टूट जाता है। गौरतलब है कि यह आवाज़ ऐसे समय में उठी है जब देशभर में NEP के क्रियान्वयन की गति और दिव्यांग-समावेशी शिक्षा पर बहस तेज़ हो रही है।

संपादकीय दृष्टिकोण

बल्कि उस व्यवस्था के भीतर से कर रही हैं जिसे NEP 'समावेशी' बनाने का दावा करती है। NEP 2020 को लागू हुए पाँच वर्ष होने को हैं, फिर भी स्कूलों में डिजिटल बुनियादी ढाँचे की कमी और CUET जैसी केंद्रीकृत परीक्षाओं का दबाव यह सवाल उठाता है कि क्या नीति-निर्माण में दिव्यांगजनों की ज़रूरतें वाकई केंद्र में थीं। शिक्षकों को चुनाव ड्यूटी में लगाने जैसी प्रशासनिक प्राथमिकताएँ यह भी दर्शाती हैं कि शिक्षा को अभी भी 'अवशिष्ट' विभाग की तरह ट्रीट किया जाता है। जब तक नीति के क्रियान्वयन में दिव्यांग विशेषज्ञों की भागीदारी अनिवार्य नहीं होती, NEP का समावेशी स्वप्न केवल दस्तावेज़ों तक सीमित रहेगा।
RashtraPress
19 जुलाई 2026

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

NEP 2020 के बारे में सुकृति सूरी की मुख्य आपत्ति क्या है?
सुकृति सूरी का कहना है कि NEP 2020 की नीतिगत सोच सकारात्मक है, लेकिन ज़मीनी स्तर पर इसका क्रियान्वयन बेहद धीमा है। डिजिटल संसाधनों की असमान उपलब्धता और दिव्यांग छात्रों के लिए अपर्याप्त ढाँचा इसकी बड़ी कमियाँ हैं।
CUET परीक्षा को लेकर सुकृति सूरी ने क्या कहा?
उन्होंने कहा कि स्कूल स्तर पर पाठ्यक्रम सरल करने और CUET जैसी कठिन प्रवेश परीक्षाओं के बीच बड़ा अंतर है, जिससे छात्र अचानक बदली परीक्षा प्रणाली के लिए तैयार नहीं हो पाते और मानसिक दबाव बढ़ता है।
दिव्यांग छात्रों के लिए सुकृति सूरी ने क्या माँगें रखीं?
उन्होंने दिव्यांग छात्रों के लिए सुलभ शिक्षण संसाधन, सहायक तकनीक, प्रशिक्षित शिक्षक और एक समर्पित शिकायत निवारण पोर्टल की माँग की, जहाँ शिकायतों का समयबद्ध समाधान हो।
MCQ-आधारित परीक्षा प्रणाली पर उनका क्या सुझाव है?
सुकृति सूरी का मानना है कि केवल बहुविकल्पीय प्रश्नों से किसी छात्र की गहरी समझ और विश्लेषण क्षमता का सही आकलन नहीं हो सकता। उन्होंने प्रतियोगी परीक्षाओं में वर्णनात्मक और विश्लेषणात्मक प्रश्नों को भी शामिल करने का सुझाव दिया।
पेपर लीक पर सुकृति सूरी का क्या कहना है?
उन्होंने कहा कि पेपर लीक की घटनाएँ छात्रों के वर्षों के संघर्ष को बेकार कर देती हैं और पूरे शिक्षा तंत्र की विश्वसनीयता को गंभीर नुकसान पहुँचाती हैं। इससे छात्रों का सिस्टम पर भरोसा कमज़ोर पड़ता है।
राष्ट्र प्रेस
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