30 जुलाई 2026
LIVE
Get it on Google Play Download on the App Store

एनजीटी का बड़ा फैसला: कोटपूतली एसटीपी की जगह नहीं बदलेगी, कड़े पर्यावरण सुरक्षा उपाय अनिवार्य

शेयर करें:
ऑडियो वॉइस लोड हो रही है…
एनजीटी का बड़ा फैसला: कोटपूतली एसटीपी की जगह नहीं बदलेगी, कड़े पर्यावरण सुरक्षा उपाय अनिवार्य

सारांश

एनजीटी ने कोटपूतली-बहरोड़ के चतुर्भुज गांव में ₹25.5 करोड़ की लागत से बन रहे 10 एमएलडी एसटीपी को दूसरी जगह ले जाने से इनकार किया — लेकिन जनस्वास्थ्य की रक्षा के लिए ग्रीन बफर, बोरवेल सुरक्षा और उपचारित जल पुनः उपयोग जैसे सख्त पर्यावरण उपाय अनिवार्य कर दिए।

मुख्य बातें

एनजीटी की भोपाल सेंट्रल जोन बेंच ने 30 जुलाई 2026 को कोटपूतली-बहरोड़ के चतुर्भुज गांव में प्रस्तावित 10 एमएलडी एसटीपी की जगह बदलने की मांग खारिज की।
एसटीपी अमृत योजना के तहत लगभग ₹25.5 करोड़ की लागत से एसबीआर तकनीक पर बनाया जा रहा है।
ट्रिब्यूनल ने वैकल्पिक स्थल को नदी के निकट होने और बाढ़ के खतरे के कारण अनुपयुक्त माना।
राजस्थान राज्य प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड से अनिवार्य सहमति के बिना निर्माण या संचालन प्रतिबंधित।
अधिकारियों को ग्रीन बफर , बदबू-शोर नियंत्रण तंत्र, बोरवेल सुरक्षा और उपचारित जल पुनः उपयोग सुनिश्चित करने के निर्देश।

नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल (एनजीटी) की भोपाल स्थित सेंट्रल जोन बेंच ने 30 जुलाई 2026 को कोटपूतली-बहरोड़ जिले के चतुर्भुज गांव में प्रस्तावित 10 एमएलडी (मिलियन लीटर प्रति दिन) क्षमता वाले सीवेज ट्रीटमेंट प्लांट (एसटीपी) की जगह बदलने की मांग खारिज कर दी। साथ ही ट्रिब्यूनल ने अधिकारियों को निर्देश दिया कि स्थानीय जनस्वास्थ्य और आस-पास के पारिस्थितिकी तंत्र की रक्षा के लिए कड़े पर्यावरण सुरक्षा उपाय अनिवार्य रूप से लागू किए जाएं।

मामले की पृष्ठभूमि

यह आदेश जस्टिस शिव कुमार सिंह (न्यायिक सदस्य) और डॉ. प्रशांत गर्गवा (विशेषज्ञ सदस्य) की खंडपीठ ने 'सत्यनारायण शर्मा और अन्य बनाम राजस्थान राज्य और अन्य' मामले का निपटारा करते हुए दिया। स्थानीय निवासियों ने यह आवेदन इसलिए दायर किया था क्योंकि उनके अनुसार प्रस्तावित जगह प्राचीन मंदिरों, एक सरकारी स्कूल, गौशाला, रिहायशी बस्तियों और पीने के पानी के सार्वजनिक स्रोतों के अत्यंत निकट है।

याचिकाकर्ताओं ने तर्क दिया कि इस परियोजना से बदबू, शोर, मच्छरों के पनपने और भूजल प्रदूषण जैसी गंभीर समस्याएं उत्पन्न हो सकती हैं। उन्होंने एक वैकल्पिक स्थल का भी सुझाव दिया।

ट्रिब्यूनल के प्रमुख निष्कर्ष

सभी पक्षों की दलीलें सुनने और स्थल निरीक्षण के लिए गठित संयुक्त समिति की रिपोर्ट पर विचार करने के बाद ट्रिब्यूनल ने पाया कि यह एसटीपी अमृत योजना के तहत लगभग ₹25.5 करोड़ की लागत से बनाया जा रहा है और यह आधुनिक 'सीक्वेंसिंग बैच रिएक्टर' (एसबीआर) तकनीक पर आधारित है। जांच में प्रस्तावित स्थल के निकट मंदिर, गौशाला, रिहायशी घर, पीएचईडी के बोरवेल और वनस्पति की उपस्थिति की पुष्टि हुई।

ट्रिब्यूनल ने माना कि आधुनिक सीवेज ट्रीटमेंट प्लांट शहरी पर्यावरण अवसंरचना का अनिवार्य अंग हैं और नदियों, भूजल व स्थानीय पारिस्थितिकी को प्रदूषण से बचाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। यह ऐसे समय में आया है जब राजस्थान में जल प्रदूषण और अपशिष्ट प्रबंधन को लेकर कई मामले न्यायालयों में विचाराधीन हैं।

वैकल्पिक स्थल की मांग क्यों खारिज हुई

खंडपीठ ने परियोजना को दूसरी जगह स्थानांतरित करने की अपील इस आधार पर अस्वीकार की कि याचिकाकर्ताओं द्वारा सुझाया गया वैकल्पिक स्थल एक नदी के निकट है और वहां बाढ़ का खतरा है। इसके अलावा, ट्रिब्यूनल ने माना कि स्थानांतरण तकनीकी दृष्टि से व्यावहारिक नहीं होगा और इससे सरकारी खजाने पर अतिरिक्त वित्तीय बोझ पड़ेगा।

गौरतलब है कि ट्रिब्यूनल ने यह भी स्पष्ट किया कि 'जल (प्रदूषण निवारण और नियंत्रण) अधिनियम, 1974' के अंतर्गत राजस्थान राज्य प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड से 'स्थापना के लिए आवश्यक सहमति' प्राप्त किए बिना एसटीपी का निर्माण या संचालन नहीं किया जा सकता।

अनिवार्य पर्यावरण सुरक्षा उपाय

ट्रिब्यूनल ने अधिकारियों को निम्नलिखित उपाय सुनिश्चित करने के निर्देश दिए:

एसटीपी के चारों ओर घने वृक्षारोपण के साथ एक चौड़ा 'ग्रीन बफर' बनाया जाए; बदबू, शोर और मच्छरों की उत्पत्ति रोकने के लिए प्रभावी तंत्र स्थापित किए जाएं; यह सुनिश्चित किया जाए कि अनुपचारित सीवेज कभी भी खुली भूमि या प्राकृतिक जलस्रोतों में न बहाया जाए; और उपचारित जल का अधिकतम पुनः उपयोग सड़क किनारे वृक्षारोपण, पार्कों, बगीचों व अन्य अनुमोदित कार्यों हेतु किया जाए।

इसके अतिरिक्त, ट्रिब्यूनल ने आदेश दिया कि निकटवर्ती सार्वजनिक पेयजल बोरवेल को प्रदूषण की किसी भी संभावना को समाप्त करने के लिए या तो भलीभांति सुरक्षित किया जाए अथवा किसी अन्य उपयुक्त स्थान पर स्थानांतरित किया जाए।

आगे की राह

इस निर्णय के बाद अब संबंधित अधिकारियों को राजस्थान राज्य प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड से विधिवत अनुमति लेकर ट्रिब्यूनल के निर्देशों का पालन करते हुए निर्माण कार्य आगे बढ़ाना होगा। यह फैसला राजस्थान में पर्यावरणीय न्याय और शहरी अपशिष्ट प्रबंधन के संतुलन की दिशा में एक महत्वपूर्ण मिसाल स्थापित करता है।

संपादकीय दृष्टिकोण

लेकिन असली परीक्षा यह है कि अधिकारी निर्देशित पर्यावरण उपायों को कागज़ से ज़मीन पर कितनी ईमानदारी से उतारते हैं। राजस्थान में ऐसे कई मामले हैं जहाँ एसटीपी बने, लेकिन संचालन मानक नहीं बने — और नतीजतन भूजल प्रदूषण की शिकायतें बनी रहीं। बोरवेल सुरक्षा और ग्रीन बफर के निर्देश सही दिशा में हैं, पर इनकी निगरानी का ढाँचा स्पष्ट नहीं है।
RashtraPress
30 जुलाई 2026

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

एनजीटी ने कोटपूतली एसटीपी की जगह बदलने से क्यों इनकार किया?
एनजीटी ने पाया कि याचिकाकर्ताओं द्वारा सुझाया गया वैकल्पिक स्थल एक नदी के निकट है और वहाँ बाढ़ का खतरा है। इसके अलावा, स्थानांतरण तकनीकी रूप से व्यावहारिक नहीं होता और सरकारी खजाने पर अतिरिक्त बोझ पड़ता।
कोटपूतली एसटीपी परियोजना की लागत और तकनीक क्या है?
यह एसटीपी अमृत योजना के तहत लगभग ₹25.5 करोड़ की लागत से बनाया जा रहा है और आधुनिक 'सीक्वेंसिंग बैच रिएक्टर' (एसबीआर) तकनीक पर आधारित है। इसकी क्षमता 10 मिलियन लीटर प्रति दिन (10 एमएलडी) है।
ट्रिब्यूनल ने कौन-से पर्यावरण सुरक्षा उपाय अनिवार्य किए हैं?
ट्रिब्यूनल ने एसटीपी के चारों ओर घने वृक्षारोपण के साथ ग्रीन बफर बनाने, बदबू-शोर-मच्छर नियंत्रण तंत्र स्थापित करने, निकटवर्ती पेयजल बोरवेल को सुरक्षित या स्थानांतरित करने और उपचारित जल का अधिकतम पुनः उपयोग सुनिश्चित करने के निर्देश दिए हैं।
क्या एसटीपी का निर्माण अभी से शुरू हो सकता है?
नहीं। ट्रिब्यूनल ने स्पष्ट किया कि 'जल (प्रदूषण निवारण और नियंत्रण) अधिनियम, 1974' के तहत राजस्थान राज्य प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड से 'स्थापना के लिए आवश्यक सहमति' प्राप्त किए बिना एसटीपी का निर्माण या संचालन नहीं किया जा सकता।
स्थानीय निवासियों की मुख्य आपत्तियाँ क्या थीं?
निवासियों का तर्क था कि चुनी गई जगह प्राचीन मंदिरों, सरकारी स्कूल, गौशाला, रिहायशी बस्तियों और पीने के पानी के सार्वजनिक स्रोतों के अत्यंत निकट है। उन्हें बदबू, शोर, मच्छरों के पनपने और भूजल प्रदूषण की आशंका थी।
राष्ट्र प्रेस
सिलसिला

जुड़े बिंदु

इस ख़बर के पीछे की कड़ियाँ — सबसे नई पहले।

8 बिंदु
  1. नवीनतम 2 महीने पहले
  2. 3 महीने पहले
  3. 3 महीने पहले
  4. 6 महीने पहले
  5. 9 महीने पहले
  6. 9 महीने पहले
  7. 10 महीने पहले
  8. 1 साल पहले