13 जुलाई 2026
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पाकिस्तान की न्यायपालिका सुरक्षा तंत्र का हथियार बनी: FIDH रिपोर्ट, 24 लाख मामले लंबित

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पाकिस्तान की न्यायपालिका सुरक्षा तंत्र का हथियार बनी: FIDH रिपोर्ट, 24 लाख मामले लंबित

सारांश

FIDH की रिपोर्ट के हवाले से सामने आया है कि पाकिस्तान की न्यायपालिका अब स्वतंत्र संस्था नहीं, बल्कि सुरक्षा तंत्र का औज़ार बन चुकी है। 24 लाख लंबित मामले, 26वें-27वें संवैधानिक संशोधन और 95% दोषसिद्धि दर वाले ईशनिंदा मामले — यह तस्वीर पाकिस्तान में न्याय की पहुँच पर गंभीर सवाल खड़े करती है।

मुख्य बातें

FIDH की रिपोर्ट 'अंडर द बेंच' के अनुसार, पाकिस्तान की न्यायपालिका को कथित तौर पर सुरक्षा तंत्र के हथियार के रूप में इस्तेमाल किया जा रहा है।
पाकिस्तान में करीब 24 लाख मामले अदालतों में लंबित हैं; वर्ल्ड जस्टिस प्रोजेक्ट के इंडेक्स में 143 देशों में आपराधिक न्याय में 101वाँ और दीवानी न्याय में 129वाँ स्थान।
2024-2025 में पारित 26वें और 27वें संवैधानिक संशोधनों ने जजों की नियुक्ति में सांसदों को शामिल किया और प्रधानमंत्री शहबाज शरीफ के नियंत्रण वाले नए संघीय संवैधानिक न्यायालय की स्थापना की।
सिर्फ 2024 में ईशनिंदा के मामलों में करीब 800 लोग गिरफ्तार, जिनमें अधिकांश गरीब और अल्पसंख्यक; दोषसिद्धि दर करीब 95% ।
NAB, FIA और सुप्रीम ज्यूडिशियल काउंसिल पर आरोप कि ये संस्थाएँ जवाबदेही के बजाय चुनिंदा कार्रवाई के औजार बन गई हैं।
सेना की आलोचना करने वाले पत्रकारों और व्हिसलब्लोअर पर मानहानि व साइबर अपराध कानून के तहत कार्रवाई के आरोप।

पाकिस्तान की न्यायपालिका को कथित तौर पर जानबूझकर एक स्वतंत्र न्याय-संस्था से बदलकर सुरक्षा तंत्र का विस्तार बना दिया गया है — यह निष्कर्ष इंटरनेशनल फेडरेशन फॉर ह्यूमन राइट्स (FIDH) की रिपोर्ट 'अंडर द बेंच: मैपिंग करप्शन रिस्क्स इन पाकिस्तान्स जस्टिस सिस्टम' के हवाले से सामने आया है। 12 जुलाई को प्रकाशित एक विश्लेषण लेख में इस रिपोर्ट का विस्तार से उल्लेख किया गया है। देशभर में करीब 24 लाख मामले अदालतों में लंबित हैं, जो इस संकट की गहराई को उजागर करते हैं।

रूल ऑफ लॉ इंडेक्स में पाकिस्तान की दयनीय स्थिति

वर्ल्ड जस्टिस प्रोजेक्ट के रूल ऑफ लॉ इंडेक्स में पाकिस्तान 143 देशों में आपराधिक न्याय के मामले में 101वें और दीवानी न्याय के मामले में 129वें स्थान पर है। विश्लेषण के अनुसार, लंबित मामलों का यह अंबार महज व्यवस्था की कमज़ोरी नहीं, बल्कि एक ऐसा 'संसाधन' बन गया है जिसका दुरुपयोग किया जा सकता है।

लेख में कहा गया है, "सुनवाई की तारीख पैसे देकर जल्दी भी मिल सकती है और टल भी सकती है। फर्स्ट इंफॉर्मेशन रिपोर्ट (FIR) भी पैसे लेकर जल्दी दर्ज हो सकती है या जानबूझकर रोकी जा सकती है। इसी तरह सबूतों में भी चुपचाप बदलाव किया जा सकता है।" इस विवरण से स्पष्ट होता है कि न्याय अब उन्हीं को मिलता है जिनके पास धन और पहुँच है।

संवैधानिक संशोधनों ने न्यायपालिका की स्वतंत्रता को कमज़ोर किया

FIDH रिपोर्ट के अनुसार, 2024 और 2025 में पारित 26वें और 27वें संवैधानिक संशोधनों ने न्यायपालिका की बची-खुची स्वायत्तता को और कमज़ोर कर दिया। इन संशोधनों के तहत सांसदों को जजों की नियुक्ति करने वाली समिति में शामिल किया गया। एक न्यायिक परिषद को 'अक्षमता' जैसे अस्पष्ट आधार पर जजों को हटाने का अधिकार दिया गया।

इसके अतिरिक्त एक नया संघीय संवैधानिक न्यायालय बनाया गया, जिसके प्रमुख के चयन पर प्रभावी रूप से प्रधानमंत्री शहबाज शरीफ का नियंत्रण माना जाता है। आलोचकों का कहना है कि ये बदलाव न्यायपालिका को कार्यपालिका और सुरक्षा प्रतिष्ठान के अधीन करने की सुनियोजित कोशिश है।

कमज़ोर तबकों पर सबसे गहरी मार

रिपोर्ट में ईशनिंदा के मामलों का विशेष उल्लेख है। लेख के अनुसार, सिर्फ 2024 में ही ऐसे मामलों में करीब 800 लोगों को गिरफ्तार किया गया, जिनमें अधिकांश गरीब और अल्पसंख्यक समुदायों के थे। ऐसे मामलों में दोषी ठहराए जाने की दर करीब 95 प्रतिशत बताई गई है।

इसकी वजह यह बताई गई कि जज कट्टरपंथी दबाव का सामना करने से बचते हैं, और अधिकांश आरोपियों के पास सबूतों में मौजूद विरोधाभासों को कानूनी रूप से चुनौती देने के लिए न पैसे होते हैं, न पहुँच। यह ऐसे समय में आया है जब पाकिस्तान में धार्मिक अल्पसंख्यकों की सुरक्षा पहले से ही अंतरराष्ट्रीय चिंता का विषय बनी हुई है।

भ्रष्टाचार-विरोधी संस्थाएँ खुद विवादों में

जिन संस्थाओं को जवाबदेही सुनिश्चित करने के लिए बनाया गया था — नेशनल अकाउंटेबिलिटी ब्यूरो (NAB), फेडरल इन्वेस्टिगेशन एजेंसी (FIA) और सुप्रीम ज्यूडिशियल काउंसिल — वे भी आरोपों के घेरे में हैं। व्यवस्था के जानकारों के हवाले से कहा गया है कि ये संस्थाएँ सुरक्षा कवच के बजाय चुनिंदा लोगों के खिलाफ कार्रवाई के औजार बन गई हैं।

आरोप है कि इनका इस्तेमाल सेना की आलोचना करने वालों के विरुद्ध किया जाता है, जबकि अन्य मामलों को नज़रअंदाज़ किया जाता है। लेख में यह भी कहा गया कि जो पत्रकार और व्हिसलब्लोअर इन मुद्दों को उजागर करने की कोशिश करते हैं, उन्हें मानहानि के कानूनों और साइबर अपराध कानून के तहत कानूनी कार्रवाई का सामना करना पड़ता है।

आगे क्या

FIDH की यह रिपोर्ट पाकिस्तान में न्यायिक सुधार की माँग को नई धार देती है। अंतरराष्ट्रीय मानवाधिकार संगठनों का दबाव बढ़ रहा है, लेकिन विशेषज्ञों का मानना है कि जब तक संवैधानिक संशोधनों की समीक्षा नहीं होती और न्यायिक नियुक्तियों में कार्यपालिका का हस्तक्षेप नहीं घटता, तब तक व्यवस्थागत बदलाव की उम्मीद सीमित रहेगी।

संपादकीय दृष्टिकोण

तो व्यवस्था में सुधार की माँग करने वाला कौन बचता है? ईशनिंदा मामलों में 95% दोषसिद्धि दर और 800 गिरफ्तारियाँ यह बताती हैं कि यह संकट सिद्धांत में नहीं, रोज़ की ज़िंदगी में उतर चुका है — और इसकी सबसे बड़ी कीमत वे चुका रहे हैं जिनके पास न पैसा है, न पहुँच।
RashtraPress
13 जुलाई 2026

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

FIDH की पाकिस्तान न्याय व्यवस्था पर रिपोर्ट में क्या कहा गया है?
इंटरनेशनल फेडरेशन फॉर ह्यूमन राइट्स (FIDH) की रिपोर्ट 'अंडर द बेंच' में कहा गया है कि पाकिस्तान की न्यायपालिका को कथित तौर पर स्वतंत्र संस्था के बजाय सुरक्षा तंत्र के हथियार के रूप में ढाल दिया गया है। रिपोर्ट में भ्रष्टाचार, लंबित मामलों के दुरुपयोग और संवैधानिक बदलावों के ज़रिए न्यायिक स्वायत्तता के कमज़ोर होने का विस्तृत विवरण है।
पाकिस्तान में कितने मामले अदालतों में लंबित हैं?
रिपोर्ट के अनुसार पाकिस्तान में करीब 24 लाख मामले अदालतों में लंबित हैं। वर्ल्ड जस्टिस प्रोजेक्ट के रूल ऑफ लॉ इंडेक्स में पाकिस्तान 143 देशों में आपराधिक न्याय में 101वें और दीवानी न्याय में 129वें स्थान पर है।
पाकिस्तान के 26वें और 27वें संवैधानिक संशोधन न्यायपालिका को कैसे प्रभावित करते हैं?
2024 और 2025 में पारित इन संशोधनों के तहत सांसदों को जजों की नियुक्ति समिति में शामिल किया गया और 'अक्षमता' जैसे अस्पष्ट आधार पर जजों को हटाने का अधिकार एक न्यायिक परिषद को दिया गया। इसके अलावा एक नया संघीय संवैधानिक न्यायालय बनाया गया जिसके प्रमुख के चयन पर प्रधानमंत्री शहबाज शरीफ का प्रभावी नियंत्रण माना जाता है।
पाकिस्तान में ईशनिंदा के मामलों में किन लोगों को सबसे ज़्यादा नुकसान होता है?
रिपोर्ट के अनुसार, 2024 में ईशनिंदा के मामलों में करीब 800 लोग गिरफ्तार हुए, जिनमें अधिकांश गरीब और अल्पसंख्यक समुदायों के थे। ऐसे मामलों में दोषसिद्धि दर करीब 95% है, क्योंकि अधिकांश आरोपियों के पास कानूनी पैरवी के लिए न संसाधन हैं और न पहुँच।
NAB और FIA जैसी भ्रष्टाचार-विरोधी संस्थाओं पर क्या आरोप हैं?
रिपोर्ट में कहा गया है कि NAB, FIA और सुप्रीम ज्यूडिशियल काउंसिल जवाबदेही सुनिश्चित करने के बजाय चुनिंदा लोगों के खिलाफ कार्रवाई के औज़ार बन गई हैं। आरोप है कि इनका इस्तेमाल सेना की आलोचना करने वालों के विरुद्ध किया जाता है, जबकि अन्य मामलों को नज़रअंदाज़ किया जाता है।
राष्ट्र प्रेस
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