30 अगस्त 2026
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मेकेदातु बांध पर पीएमके की चेतावनी: कावेरी जल अधिकार खतरे में, तमिलनाडु सरकार से तत्काल कार्रवाई की माँग

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मेकेदातु बांध पर पीएमके की चेतावनी: कावेरी जल अधिकार खतरे में, तमिलनाडु सरकार से तत्काल कार्रवाई की माँग

सारांश

कर्नाटक के मुख्यमंत्री शिवकुमार ने मेकेदातु बांध को किसानों के लिए फायदेमंद बताया — और इसी बयान ने पीएमके को हथियार दे दिया। अंबुमणि का कहना है कि यह कर्नाटक के 'सिर्फ पेयजल' वाले पुराने आश्वासन को खारिज करता है, और तमिलनाडु के कावेरी जल अधिकार अब सीधे खतरे में हैं।

मुख्य बातें

अंबुमणि रामदास ने 30 अगस्त 2026 को तमिलनाडु सरकार को मेकेदातु बांध पर तत्काल कानूनी कार्रवाई की चेतावनी दी।
कर्नाटक के मुख्यमंत्री डी.के.
शिवकुमार ने कहा कि बांध से किसानों को फायदा होगा — जो कि कर्नाटक के 'केवल पेयजल' वाले पुराने रुख से विरोधाभासी है।
परियोजना रिपोर्ट में डूब क्षेत्र 5,000 हेक्टेयर बताया गया था, जबकि शिवकुमार ने इसे 5,400 हेक्टेयर कहा — जिससे 67 टीएमसी से अधिक जल संग्रह की आशंका।
अंबुमणि ने माँग की कि तमिलनाडु कर्नाटक के ताजा रुख को केंद्र सरकार और सर्वोच्च न्यायालय के समक्ष रखे।
बड़े जलाशय से जंगलों, वन्यजीवों और स्थानीय पारिस्थितिकी तंत्र को गंभीर नुकसान की चेतावनी।

पट्टाली मक्कल कच्ची (पीएमके) के नेता डॉ. अंबुमणि रामदास ने 30 अगस्त 2026 को तमिलनाडु सरकार को कड़ी चेतावनी दी कि यदि मेकेदातु बांध परियोजना को समय रहते नहीं रोका गया, तो राज्य कावेरी नदी पर अपने दशकों पुराने जल अधिकार गँवा सकता है। यह बयान कर्नाटक के मुख्यमंत्री डी.के. शिवकुमार की उस घोषणा के तत्काल बाद आया, जिसमें उन्होंने कहा कि उनकी सरकार बांध निर्माण की मंजूरी के लिए जल्द ही केंद्र सरकार से संपर्क करेगी।

मुख्य घटनाक्रम

कर्नाटक के मुख्यमंत्री शिवकुमार ने हाल ही में कहा कि मेकेदातु बांध से कर्नाटक के किसानों को उसी तरह लाभ मिलेगा जैसे कृष्णराज सागर बांध से मिला था। उन्होंने एक सुप्रीम कोर्ट के फैसले का हवाला देते हुए — जिसे उन्होंने कर्नाटक के पक्ष में बताया — कहा कि राज्य सरकार केंद्र से निर्माण की अनुमति माँगेगी और इस दिशा में प्रयास तेज किए जाएँगे।

डॉ. अंबुमणि ने इस बयान को 'निंदनीय' करार दिया, खासकर तब जब तमिलनाडु के नागरिकों और पर्यावरण कार्यकर्ताओं की ओर से इस परियोजना का व्यापक विरोध जारी है।

कर्नाटक के रुख में बड़ा बदलाव

पीएमके नेता ने तर्क दिया कि शिवकुमार के ताजा बयान ने कर्नाटक के उस पुराने आश्वासन की पोल खोल दी है, जिसमें कहा गया था कि मेकेदातु परियोजना केवल पेयजल आपूर्ति के लिए है और सिंचाई हेतु जलाशय के पानी का उपयोग नहीं किया जाएगा।

अंबुमणि के अनुसार, किसानों को लाभ का दावा करके शिवकुमार ने परोक्ष रूप से स्वीकार किया है कि जलाशय में संग्रहीत पानी सिंचाई के लिए भी इस्तेमाल होगा। उन्होंने कहा कि यह स्थिति परियोजना की डिटेल्ड प्रोजेक्ट रिपोर्ट (DPR) में दर्ज उद्देश्यों से सीधे विरोधाभासी है, और यह अपने आप में इस परियोजना को रद्द करने का पर्याप्त आधार है।

डूब क्षेत्र पर विवाद

अंबुमणि ने प्रस्तावित जलाशय के आकार को लेकर भी गंभीर सवाल उठाए। जहाँ परियोजना रिपोर्ट में डूब क्षेत्र का अनुमान 5,000 हेक्टेयर (लगभग 12,500 एकड़) लगाया गया था, वहीं मुख्यमंत्री शिवकुमार ने इसे 5,400 हेक्टेयर (लगभग 13,500 एकड़) बताया। पीएमके नेता ने दावा किया कि इस बड़े क्षेत्र के कारण कर्नाटक प्रस्तावित 67 टीएमसी से अधिक पानी संग्रहीत कर सकता है, जिससे तमिलनाडु को मिलने वाले कावेरी जल का प्रवाह और घट सकता है।

उन्होंने यह भी चेतावनी दी कि बड़े जलाशय से आस-पास के जंगलों, वन्यजीवों और पारिस्थितिकी तंत्र को गंभीर नुकसान पहुँचने की आशंका है।

तमिलनाडु सरकार से अपील

डॉ. अंबुमणि ने तमिलनाडु सरकार से माँग की कि वह कर्नाटक के इस ताजा रुख को बिना देरी किए केंद्र सरकार और सर्वोच्च न्यायालय के समक्ष रखे। उन्होंने कहा कि राज्य को हर उपलब्ध कानूनी और संवैधानिक रास्ते का इस्तेमाल करते हुए इस परियोजना को आगे बढ़ने से रोकना चाहिए।

गौरतलब है कि कावेरी जल विवाद दशकों से तमिलनाडु और कर्नाटक के बीच एक संवेदनशील मुद्दा रहा है, और सर्वोच्च न्यायालय तथा कावेरी जल प्रबंधन प्राधिकरण (CWMA) इस विवाद में मध्यस्थ की भूमिका निभाते रहे हैं। यह नया घटनाक्रम ऐसे समय में आया है जब दक्षिण भारत में जल संकट गहराता जा रहा है और नदी जल बँटवारे को लेकर अंतर-राज्यीय तनाव बढ़ रहे हैं।

यदि मेकेदातु परियोजना को केंद्रीय मंजूरी मिलती है, तो यह कावेरी जल बँटवारे की मौजूदा व्यवस्था को बुनियादी रूप से प्रभावित कर सकती है — और तमिलनाडु के लिए अगली कानूनी लड़ाई की पटकथा अभी से लिखी जा रही है।

संपादकीय दृष्टिकोण

और अंबुमणि ने इस विरोधाभास को सटीक पकड़ा है। असली सवाल यह है कि तमिलनाडु सरकार अब तक मूकदर्शक क्यों बनी है, जबकि कर्नाटक केंद्रीय मंजूरी की दिशा में सक्रिय रूप से आगे बढ़ रहा है। कावेरी जल प्रबंधन प्राधिकरण की निगरानी प्रक्रिया और DPR में दर्ज उद्देश्यों से विचलन — दोनों मिलकर एक ऐसा कानूनी दरवाजा खोलते हैं जिसका तमिलनाडु को तुरंत उपयोग करना चाहिए, वरना चुप्पी को सहमति माना जाएगा।
RashtraPress
30 अगस्त 2026

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

मेकेदातु बांध परियोजना क्या है और यह विवादास्पद क्यों है?
मेकेदातु बांध कर्नाटक द्वारा कावेरी नदी पर प्रस्तावित एक जलाशय परियोजना है, जिसकी क्षमता लगभग 67 टीएमसी बताई गई है। तमिलनाडु इसका विरोध करता है क्योंकि उसे आशंका है कि इससे कावेरी का प्रवाह घटेगा और उसके जल अधिकार प्रभावित होंगे।
पीएमके नेता अंबुमणि रामदास ने क्या चेतावनी दी है?
डॉ. अंबुमणि रामदास ने तमिलनाडु सरकार से माँग की है कि वह कर्नाटक के बदले रुख को केंद्र सरकार और सर्वोच्च न्यायालय के सामने तत्काल रखे। उन्होंने कहा कि यदि समय पर कदम नहीं उठाए गए तो तमिलनाडु कावेरी पर अपने ऐतिहासिक जल अधिकार खो सकता है।
कर्नाटक के रुख में क्या बदलाव आया है जो विवाद की वजह बना?
कर्नाटक ने पहले कहा था कि मेकेदातु परियोजना केवल पेयजल आपूर्ति के लिए है। लेकिन मुख्यमंत्री शिवकुमार ने हाल ही में कहा कि इससे किसानों को भी फायदा होगा, जिसे पीएमके ने सिंचाई उपयोग की परोक्ष स्वीकृति बताया है।
डूब क्षेत्र के आँकड़ों में अंतर क्यों महत्वपूर्ण है?
परियोजना रिपोर्ट में डूब क्षेत्र 5,000 हेक्टेयर बताया गया था, जबकि मुख्यमंत्री शिवकुमार ने 5,400 हेक्टेयर का उल्लेख किया। अंबुमणि के अनुसार यह अंतर कर्नाटक को 67 टीएमसी से अधिक पानी संग्रहीत करने की क्षमता देता है, जो तमिलनाडु के हिस्से के पानी को प्रभावित कर सकता है।
तमिलनाडु के पास अब क्या कानूनी विकल्प हैं?
पीएमके के अनुसार तमिलनाडु कर्नाटक के बदले रुख को सर्वोच्च न्यायालय और केंद्र सरकार के समक्ष रख सकता है, और DPR से विचलन के आधार पर परियोजना को चुनौती दे सकता है। कावेरी जल प्रबंधन प्राधिकरण में भी इस मुद्दे को उठाया जा सकता है।
राष्ट्र प्रेस
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