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मेकेदातु बांध के खिलाफ पीएमके अध्यक्ष अंबुमणि का कावेरी मार्च शुरू, तमिलनाडु की जल सुरक्षा पर बड़ा सवाल

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मेकेदातु बांध के खिलाफ पीएमके अध्यक्ष अंबुमणि का कावेरी मार्च शुरू, तमिलनाडु की जल सुरक्षा पर बड़ा सवाल

सारांश

पीएमके अध्यक्ष अंबुमणि रामदास ने बिलिगुंडलू से पूमपुहार तक कावेरी मार्च शुरू कर मेकेदातु बांध के खिलाफ जंग तेज कर दी है। 5 करोड़ से अधिक लोगों की जीवनरेखा और 12,500 एकड़ घने जंगल को खतरे में बताते हुए यह अभियान तमिलनाडु में जल राजनीति को नई धार दे रहा है।

मुख्य बातें

पीएमके अध्यक्ष अंबुमणि रामदास ने धर्मपुरी जिले के बिलिगुंडलू से पूमपुहार तक राज्यव्यापी कावेरी मार्च शुरू किया।
मार्च का उद्देश्य कर्नाटक की प्रस्तावित मेकेदातु बांध परियोजना के विरुद्ध जनमत जुटाना है।
अंबुमणि के अनुसार, तमिलनाडु में 5 करोड़ से अधिक लोग कृषि, उद्योग और घरेलू उपयोग के लिए कावेरी नदी पर निर्भर हैं।
प्रस्तावित जलाशय क्षेत्र में लगभग 12,500 एकड़ घना वन है, जो हाथियों और बाघों का आवास है।
पीएमके ने तमिलनाडु सरकार से नए कावेरी न्यायाधिकरण के प्रस्ताव का विरोध करते हुए मौजूदा ढाँचे को पर्याप्त बताया।

पट्टाली मक्कल काची (PMK) के अध्यक्ष अंबुमणि रामदास ने 2 जुलाई 2025 को धर्मपुरी जिले के बिलिगुंडलू से एक राज्यव्यापी जन जागरूकता मार्च का शुभारंभ किया, जो ऐतिहासिक तटीय नगर पूमपुहार तक जाएगा। यह मार्च कावेरी नदी पर कर्नाटक की प्रस्तावित मेकेदातु बांध परियोजना के विरोध में आयोजित किया गया है, जिसे पीएमके तमिलनाडु की जल सुरक्षा, कृषि और पर्यावरण के लिए गंभीर खतरा मानती है।

मार्च का उद्देश्य और मुख्य घटनाक्रम

मार्च को हरी झंडी दिखाते हुए अंबुमणि रामदास ने स्पष्ट किया कि इस अभियान का केंद्रीय लक्ष्य कावेरी डेल्टा और नदी पर आश्रित अन्य क्षेत्रों में प्रस्तावित जलाशय के विरुद्ध व्यापक जनमत तैयार करना है। उन्होंने तमिलनाडु सरकार से आग्रह किया कि बांध निर्माण रोकने के लिए कानूनी प्रयासों को और अधिक सुदृढ़ किया जाए।

पत्रकारों से बातचीत में उन्होंने कहा कि कावेरी नदी तमिलनाडु की जीवनरेखा है और राज्य में 5 करोड़ से अधिक लोग कृषि, उद्योग तथा घरेलू उपयोग के लिए प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से इस नदी पर निर्भर हैं।

जल प्रवाह और सिंचाई पर संभावित असर

अंबुमणि ने आरोप लगाया कि कर्नाटक की यह योजना तमिलनाडु में कावेरी के जल प्रवाह को गंभीर रूप से प्रभावित करेगी, जिससे सिंचाई, पेयजल आपूर्ति और लाखों लोगों की आजीविका खतरे में पड़ जाएगी। उन्होंने चेतावनी दी कि यदि मेकेदातु बांध का निर्माण होता है, तो तमिलनाडु को मिलने वाले पानी का पहले से ही सीमित प्रवाह और भी कम हो सकता है, जिससे कई जिलों में जल संकट और गहरा जाएगा।

कर्नाटक के इस तर्क को खारिज करते हुए कि परियोजना मुख्यतः बेंगलुरु की पेयजल आवश्यकताओं के लिए है, अंबुमणि ने कहा कि शहर की जरूरतें इससे कहीं कम मात्रा में पानी से पूरी की जा सकती हैं। उन्होंने यह भी आशंका जताई कि प्रस्तावित 70 टीएमसी क्षमता के जलाशय का उपयोग अंततः सिंचाई के लिए किया जा सकता है, जिससे कर्नाटक कावेरी के ऊपरी हिस्से में अधिक पानी रोक सकेगा।

पर्यावरण संबंधी चिंताएँ

पीएमके नेता ने पर्यावरण के मोर्चे पर भी गंभीर सवाल उठाए। उनके अनुसार, प्रस्तावित जलाशय क्षेत्र में लगभग 12,500 एकड़ घना वन शामिल है, जो हाथियों, बाघों और अन्य वन्यजीव प्रजातियों का प्राकृतिक आवास है। उन्होंने यह भी बताया कि कर्नाटक के पर्यावरण कार्यकर्ताओं ने भी इस परियोजना का विरोध किया है और अधिकारियों से पारिस्थितिक आधार पर पुनर्विचार का आग्रह किया है।

कानूनी और राजनीतिक मोर्चा

अंबुमणि ने कर्नाटक की पिछली सरकारों पर कावेरी जल बंटवारे की प्रतिबद्धताओं का पालन न करने का आरोप लगाया। उन्होंने तमिलनाडु सरकार से इस परियोजना को रोकने के लिए हर संभव कानूनी उपाय अपनाने का आह्वान किया। साथ ही, उन्होंने राज्य सरकार के नए कावेरी न्यायाधिकरण के प्रस्ताव का विरोध दोहराते हुए कहा कि मौजूदा न्यायाधिकरण ढाँचा पर्याप्त है और नए ढाँचे की कोई आवश्यकता नहीं है।

गौरतलब है कि कावेरी जल विवाद दशकों पुराना है और यह पहली बार नहीं है जब किसी राजनीतिक दल ने इस मुद्दे को लेकर जन आंदोलन का रास्ता अपनाया हो। यह मार्च ऐसे समय में शुरू हुआ है जब मानसून सत्र में जल बंटवारे की राजनीति एक बार फिर केंद्र में आ गई है।

संपादकीय दृष्टिकोण

लेकिन पीएमके का यह मार्च महज प्रतीकात्मक राजनीति से आगे जाता दिखता है — 12,500 एकड़ वन और 5 करोड़ निर्भर लोगों के आँकड़े इसे पर्यावरण और आजीविका दोनों का मुद्दा बनाते हैं। असली सवाल यह है कि तमिलनाडु सरकार सर्वोच्च न्यायालय में इस मामले को कितनी प्रभावी तरह से लड़ती है, क्योंकि सड़क पर मार्च और अदालत में तर्क — दोनों की ज़रूरत एक साथ है। कर्नाटक का 'बेंगलुरु पेयजल' वाला तर्क 70 टीएमसी क्षमता के सामने कमज़ोर पड़ता है, और यही विरोधाभास इस परियोजना की सबसे बड़ी कमज़ोरी है।
RashtraPress
1 जुलाई 2026

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

मेकेदातु बांध परियोजना क्या है और इसका विरोध क्यों हो रहा है?
मेकेदातु बांध कर्नाटक की प्रस्तावित परियोजना है, जिसे कावेरी नदी पर बनाया जाना है और जिसकी क्षमता 70 टीएमसी बताई जा रही है। तमिलनाडु का विरोध इसलिए है क्योंकि इससे राज्य को मिलने वाले कावेरी जल प्रवाह में कमी आने की आशंका है, जिससे सिंचाई और पेयजल आपूर्ति प्रभावित होगी।
अंबुमणि रामदास का कावेरी मार्च कहाँ से कहाँ तक जाएगा?
यह राज्यव्यापी मार्च धर्मपुरी जिले के बिलिगुंडलू से शुरू होकर ऐतिहासिक तटीय नगर पूमपुहार तक जाएगा। इसका उद्देश्य मेकेदातु बांध के विरुद्ध जन जागरूकता फैलाना है।
मेकेदातु बांध से तमिलनाडु के कितने लोग प्रभावित होंगे?
पीएमके अध्यक्ष अंबुमणि रामदास के अनुसार, तमिलनाडु में 5 करोड़ से अधिक लोग कृषि, उद्योग और घरेलू उपयोग के लिए प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से कावेरी नदी पर निर्भर हैं। बांध बनने से सिंचाई, पेयजल और आजीविका तीनों पर असर पड़ सकता है।
मेकेदातु परियोजना के पर्यावरणीय खतरे क्या हैं?
प्रस्तावित जलाशय क्षेत्र में लगभग 12,500 एकड़ घना वन शामिल है, जो हाथियों, बाघों और अन्य वन्यजीव प्रजातियों का प्राकृतिक आवास है। कर्नाटक के पर्यावरण कार्यकर्ताओं ने भी पारिस्थितिक आधार पर इस परियोजना पर पुनर्विचार का आग्रह किया है।
पीएमके नए कावेरी न्यायाधिकरण के प्रस्ताव का विरोध क्यों कर रही है?
पीएमके का मानना है कि मौजूदा न्यायाधिकरण ढाँचा पर्याप्त है और नए न्यायाधिकरण की कोई आवश्यकता नहीं है। अंबुमणि रामदास ने तमिलनाडु सरकार से इस प्रस्ताव का विरोध करने और मेकेदातु बांध रोकने के लिए हर संभव कानूनी उपाय अपनाने का आह्वान किया है।
राष्ट्र प्रेस
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