पिनाराई विजयन की माँग: केरल में 308 आदिवासी मार्गदर्शक शिक्षकों को तत्काल बहाल करे यूडीएफ सरकार
सारांश
मुख्य बातें
केरल में विपक्ष के नेता पिनाराई विजयन ने शुक्रवार, 5 जून को यूडीएफ सरकार द्वारा 308 आदिवासी मार्गदर्शक शिक्षकों को बर्खास्त किए जाने के फैसले को 'घोर अन्याय' करार देते हुए उनकी तत्काल बहाली की माँग की। उन्होंने चेतावनी दी कि यह कदम वायनाड, पलक्कड़ और मलप्पुरम जिलों के आदिवासी छात्रों की शिक्षा पर गंभीर प्रतिकूल प्रभाव डालेगा।
क्या है पूरा मामला
गोत्र बंधु योजना के तहत नियुक्त ये शिक्षक कक्षा 1 से 4 तक के आदिवासी छात्रों को पढ़ाते थे और उनका मासिक वेतन ₹21,900 था। इन पदों के लिए टीटीसी और बी.एड जैसी योग्यताएँ रखने वाले आदिवासी युवाओं को प्राथमिकता दी गई थी।
विजयन के अनुसार, अनुसूचित जनजाति विभाग के निदेशक के निर्देशों के बाद एकीकृत जनजातीय विकास परियोजना (आईटीडीपी) के अधिकारियों ने वर्तमान शैक्षणिक वर्ष में इन शिक्षकों की सेवाएँ समाप्त करने के आदेश जारी किए, जिसके चलते स्कूल खुलने पर वे ड्यूटी पर उपस्थित नहीं हो सके।
एलडीएफ की मूल पहल और उसका महत्व
पूर्व मुख्यमंत्री विजयन ने बताया कि यह मेंटर टीचर कार्यक्रम 2016 में पहली एलडीएफ सरकार की सबसे महत्वपूर्ण पहलों में से एक था। उन्होंने दावा किया कि केरल देश का पहला राज्य था जिसने आदिवासी छात्रों के लिए इस तरह की समर्पित शैक्षिक सहायता प्रणाली शुरू की थी।
विजयन ने कहा, 'इस कार्यक्रम ने आदिवासी समुदायों के शिक्षकों को छात्रों से उनकी अपनी भाषा में संवाद करने में सक्षम बनाया, जिससे सीखने के परिणामों में सुधार हुआ और स्कूल छोड़ने की दर में काफी कमी आई।' उन्होंने यह भी रेखांकित किया कि इस पहल से आदिवासी परिवारों की सामाजिक और आर्थिक स्थितियों में सुधार लाने में भी सहायता मिली थी।
प्रभावित शिक्षकों की स्थिति
बर्खास्त किए गए 308 शिक्षकों में से वायनाड में 241, पलक्कड़ में 50 और मलप्पुरम में 17 शिक्षक शामिल हैं। इनमें से अधिकांश कमज़ोर आदिवासी समुदायों से संबंधित हैं।
गौरतलब है कि इनमें से कई शिक्षकों ने अप्रैल और मई के दौरान भी बिना वेतन के स्कूली गतिविधियों में सहयोग दिया और आदिवासी बच्चों को कक्षाओं में वापस लाने में मदद करते रहे।
विरोध प्रदर्शन और राजनीतिक माँग
विजयन ने बताया कि बर्खास्त शिक्षक इस समय विरोध प्रदर्शन कर रहे हैं। उन्होंने कहा, 'राज्य सरकार को उनकी जायज माँगों पर विचार करना चाहिए और उनकी नौकरियों को बहाल करने के लिए तत्काल कदम उठाने चाहिए।'
यह ऐसे समय में आया है जब केरल में आदिवासी शिक्षा और जनजातीय अधिकारों को लेकर राजनीतिक बहस पहले से ही तेज़ है। विशेषज्ञों का मानना है कि मातृभाषा में शिक्षा देने वाले ऐसे शिक्षकों की अनुपस्थिति से आदिवासी बच्चों में स्कूल छोड़ने की दर फिर बढ़ सकती है।