पीएम मोदी संसद में संवाद, तर्क और विचार-विमर्श के प्रति गहरा विश्वास रखते हैं: ओम बिरला
सारांश
Key Takeaways
- पीएम मोदी ने संसद के अविश्वास प्रस्ताव को खारिज करने पर सदन को बधाई दी।
- ओम बिरला ने मोदी के पत्र में संवाद और विचार-विमर्श के प्रति गहरे विश्वास को रेखांकित किया।
- लोकसभा अध्यक्ष का दायित्व लोकतांत्रिक परंपराओं और नियमों का संरक्षण करना है।
नई दिल्ली, 15 मार्च (राष्ट्र प्रेस)। लोकसभा स्पीकर ओम बिरला ने पीएम मोदी के पत्र के संदर्भ में बताया कि वे संसद की मूल प्रकृति-संवाद, तर्क और विचार-विमर्श में गहरी प्रतिबद्धता रखते हैं। पीएम मोदी ने लोकसभा स्पीकर को भेजे गए पत्र में कहा कि आपके खिलाफ लाया गया अविश्वास प्रस्ताव सदन में विफल हो गया। जिस प्रकार सदन ने इस राजनीतिक कुकृत्य को स्पष्ट रूप से अस्वीकार किया, उसके लिए मैं सदन के सदस्यों को बधाई देता हूं।
पीएम मोदी के पत्र को साझा करते हुए लोकसभा स्पीकर ओम बिरला ने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म एक्स पर लिखा कि भारत के संसदीय लोकतंत्र के नियमों, प्रक्रियाओं और परंपराओं में आपके द्वारा निरंतर अटूट विश्वास व्यक्त किया गया है। आपका पत्र लोक सेवा के उच्चतम नैतिक मूल्यों को दर्शाता है, जिन्हें आपने अपने लंबे सार्वजनिक जीवन में अपनाया है, चाहे वह वर्तमान में भारत के प्रधानमंत्री के रूप में हो या इससे पहले गुजरात के मुख्यमंत्री के रूप में।
आप हमेशा संसद के मूल सिद्धांत-संवाद, तर्क और विचार-विमर्श में गहरी आस्था रखते हैं। आप संसद में उठने वाली हर आवाज को करोड़ों भारतीय नागरिकों की आवाज के रूप में मान्यता देते हैं। आप संसदीय कार्यों को प्राथमिकता देते हैं और हर मुद्दे का समाधान निकालने का प्रयास करते हैं। आपका यह संदेश दलगत सीमाओं से परे जाकर सभी जनप्रतिनिधियों को प्रेरित करेगा और हमारे स्वतंत्रता सेनानियों तथा संविधान सभा के सदस्यों द्वारा स्थापित लोकतंत्र के नैतिक आधार को मजबूत करेगा। आपके प्रेरणादायक शब्दों के लिए धन्यवाद।
पीएम मोदी ने स्पीकर को लिखे पत्र में दोहराया कि लोकसभा में आपके खिलाफ लाया गया अविश्वास प्रस्ताव खारिज हो गया। जिस तरह सदन ने इस राजनीतिक कुकृत्य को अस्वीकार किया, उसके लिए मैं सदन के सभी सदस्यों को बधाई देता हूं।
अविश्वास प्रस्ताव के गिरने के बाद आपके वक्तव्य को मैंने ध्यानपूर्वक सुना। आपने जिस संतुलन, धैर्य और स्पष्टता के साथ संसदीय इतिहास, अध्यक्ष के दायित्व और नियमों की सर्वोच्चता का उल्लेख किया, वह अत्यंत प्रभावशाली था। इसके लिए मैं आपको बधाई देता हूं। यह वक्तव्य केवल उस क्षण का उत्तर नहीं है, बल्कि भारतीय संसदीय परंपरा और लोकतांत्रिक मूल्यों की गहरी व्याख्या भी है।
उन्होंने कहा कि भारतीय लोकतंत्र की सबसे बड़ी ताकत उसकी संवैधानिक संस्थाएं हैं। संसद इन संस्थाओं का सर्वोच्च मंच है। इस सदन में प्रत्येक आवाज देश के करोड़ों नागरिकों की आशाओं और अपेक्षाओं का प्रतिनिधित्व करती है। इस संदर्भ में लोकसभा अध्यक्ष का कार्य केवल कार्यवाही संचालित करने का नहीं होता, बल्कि वह लोकतांत्रिक परंपराओं, नियमों और संस्थागत गरिमा का संरक्षक भी होता है। आपने अपने वक्तव्य में जिस स्पष्टता के साथ कहा कि इस सदन में कोई भी नियमों से ऊपर नहीं है, वह हमारे लोकतंत्र की मूल भावना को पुनः स्थापित करने वाला संदेश है।
लोकतंत्र में मतभेद स्वाभाविक हैं। विचारों की विविधता ही लोकतंत्र को जीवित बनाती है, लेकिन यह भी सत्य है कि असहमति और असम्मान के बीच एक स्पष्ट अंतर होता है। लोकतंत्र और उसकी संस्थाओं में विश्वास रखने वाले सभी के लिए यह चिंता का विषय है कि कभी-कभी राजनीतिक असहमति, संसदीय मर्यादा के प्रति अनादर में बदल जाती है। ऐसे क्षणों में आसन पर बैठे व्यक्ति की परीक्षा होती है। आपने संयम, संतुलन और निष्पक्षता के साथ इन परिस्थितियों का सामना किया, जो सराहनीय है।
लोकतांत्रिक विचारों में आस्था रखने वाले देश के हर नागरिक ने महसूस किया कि आपके खिलाफ लाए गए अविश्वास प्रस्ताव के पीछे निजी स्वार्थ और अहंकार की भावना सक्रिय थी। इस स्थिति ने लोकतंत्र में विश्वास रखने वाले हर व्यक्ति को दुखी किया। यह पहली बार नहीं है जब इस आसन को ऐसी परिस्थितियों का सामना करना पड़ा हो।
आपसे पहले जब सुमित्रा महाजन इस पद पर थीं, तब भी हमने देखा था कि कुछ सदस्यों का व्यवहार उस गरिमा के अनुरूप नहीं था जिसकी अपेक्षा सदन के सभी सदस्यों से की जाती है। उस समय भी कई अवसरों पर आसन के प्रति अनावश्यक कटुता और असम्मान देखने को मिला था। दुखद है कि आज भी ऐसे प्रवृत्तियां दिखाई देती हैं। यह प्रवृत्ति केवल किसी व्यक्ति के प्रति नहीं होती, बल्कि उस संस्था की गरिमा को प्रभावित करती है जो पूरे लोकतंत्र का प्रतीक है।
संसद का मूल स्वभाव संवाद, तर्क और विचार-विमर्श का है। यहां हर विचार को अभिव्यक्ति का अवसर मिलना चाहिए। आपने अपने कार्यकाल में निरंतर यह प्रयास किया कि अधिक से अधिक सांसदों को सदन में बोलने का अवसर मिले। युवा सांसद हों, पहली बार निर्वाचित जनप्रतिनिधि हों या महिला सांसद हों, सभी को अपनी बात रखने का मौका देना लोकतंत्र को और अधिक व्यापक बनाता है।
देश को यह देखकर दुख होता है कि परिवारवादी और सामंती सोच रखने वाले कुछ लोग लोकतांत्रिक संस्थाओं को अपने सीमित दायरे में देखना चाहते हैं। वे किसी नए व्यक्ति को सहजता से स्वीकार नहीं कर पाते। उन्हें यह भी स्वीकार्य नहीं होता कि सदन में अन्य जन प्रतिनिधियों को, विशेषकर नए और युवा सांसदों को, बराबरी से बोलने और आगे बढ़ने का अवसर मिले। यह सोच लोकतंत्र की भावना के विपरीत है।
लोकतंत्र का अर्थ ही यही है कि अवसर कुछ लोगों तक सीमित न रहे, बल्कि समाज के हर वर्ग और हर क्षेत्र की आवाज को स्थान मिले। आपने अपनी अध्यक्षता में इस भावना को निरंतर विस्तार दिया है। विपरीत परिस्थितियों में भी आपने जिस प्रकार अपने कर्तव्यों का निर्वहन किया है, वह अत्यंत प्रेरणादायक है।
मुझे यह भी प्रसन्नता है कि इतने महत्वपूर्ण राष्ट्रीय दायित्वों के बीच भी आपने अपने क्षेत्र के लोगों के हितों को कभी पीछे नहीं छोड़ा। हाल ही में कोटा में एयरपोर्ट परियोजना के शिलान्यास के अवसर पर हमने देखा कि आप अपने क्षेत्र के विकास के लिए कितनी प्रतिबद्धता के साथ निरंतर प्रयास करते रहे हैं। राष्ट्रीय दायित्वों और अपने संसदीय क्षेत्र के प्रति जिम्मेदारी के बीच जो संतुलन आपने बनाए रखा है, वह एक जनप्रतिनिधि के रूप में आपकी गहरी प्रतिबद्धता को दर्शाता है।
मुझे विश्वास है कि आप आगे भी इसी निष्ठा, धैर्य और निष्पक्षता के साथ लोकसभा का संचालन करते रहेंगे। लोकतांत्रिक संस्थाओं की प्रतिष्ठा को बनाए रखना और उन्हें और मजबूत करना हम सभी की साझा जिम्मेदारी है। आप इस दायित्व का निर्वहन जिस गरिमा और समर्पण के साथ कर रहे हैं, वह निश्चित ही हमारे संसदीय लोकतंत्र को और सुदृढ़ बनाएगा।