पीएमईजीपी योजना से पटना के मनोज शर्मा बने उद्यमी, ₹1.75 करोड़ टर्नओवर और 25 लोगों को रोज़गार
सारांश
मुख्य बातें
पटना के कंकड़बाग निवासी मनोज कुमार शर्मा एक समय कोचिंग संस्थान में पढ़ाकर किसी तरह परिवार का गुज़ारा चलाते थे। आज वही मनोज कैटरपिलर सॉल्यूशन नाम की मेडिकल फर्नीचर निर्माण इकाई के मालिक हैं, जहाँ करीब 25 लोगों को स्थानीय रोज़गार मिल रहा है और सालाना टर्नओवर ₹1.75 करोड़ के करीब पहुँच चुका है। इस बदलाव का श्रेय वह प्रधानमंत्री रोज़गार सृजन कार्यक्रम (पीएमईजीपी) और खादी एवं ग्रामोद्योग आयोग (केवीआईसी) को देते हैं।
नौकरी से उद्यमिता तक का सफ़र
ग्रेजुएशन के बाद मनोज शर्मा के सामने रोज़गार की गंभीर चुनौती थी। जीवनयापन के लिए उन्होंने एक स्थानीय कोचिंग संस्थान में पढ़ाना शुरू किया, लेकिन उस आय से परिवार की ज़रूरतें पूरी करना कठिन था। इसके बाद वह रोज़गार की तलाश में कोलकाता चले गए, जहाँ उन्होंने मेडिकल फर्नीचर निर्माण कंपनी में काम किया।
कुछ वर्षों के अनुभव के बाद उन्हें एहसास हुआ कि इस क्षेत्र में बिहार में भी कारोबार की संभावना है। यह ऐसे समय में आया जब बिहार से बड़े पैमाने पर पलायन जारी था और राज्य में स्थानीय उद्योगों की सख्त ज़रूरत थी।
पीएमईजीपी से मिली पूंजी, बना अपना उद्यम
पटना लौटने के बाद मनोज ने कैटरपिलर सॉल्यूशन की नींव रखी। कारोबार को विस्तार देने के लिए पूंजी की ज़रूरत थी और यही सबसे बड़ी बाधा थी। इसी दौरान उन्होंने पीएमईजीपी के तहत आवेदन किया। उनके अनुसार, योजना और केवीआईसी की टीम के सहयोग ने उनकी परियोजना को आगे बढ़ाने में निर्णायक भूमिका निभाई।
गौरतलब है कि पीएमईजीपी केंद्र सरकार की एक प्रमुख सूक्ष्म-उद्यम योजना है, जो शहरी और ग्रामीण दोनों क्षेत्रों में स्वरोज़गार को बढ़ावा देने के लिए सब्सिडी-युक्त ऋण उपलब्ध कराती है। मनोज इसी योजना का लाभ उठाने वाले पटना के उल्लेखनीय उदाहरणों में से एक बन गए हैं।
₹1.75 करोड़ का टर्नओवर, ₹5 करोड़ का लक्ष्य
मनोज शर्मा ने बताया कि उनकी फैक्ट्री में अभी करीब 25 कर्मचारी कार्यरत हैं। उनके मेडिकल फर्नीचर उत्पाद बिहार के बाहर भी भेजे जाते हैं। वर्तमान में कंपनी का सालाना टर्नओवर लगभग ₹1.75 करोड़ है और अगले वर्ष इसे बढ़ाकर ₹5 करोड़ तक पहुँचाने का लक्ष्य है।
उन्होंने स्वीकार किया कि उद्यम शुरू करने के दौरान कई परेशानियों का सामना करना पड़ा, लेकिन संस्थागत सहयोग और केवीआईसी टीम के मार्गदर्शन ने उनका हौसला बनाए रखा। उन्होंने सरकार से युवाओं के लिए ऐसी योजनाएँ जारी रखने की अपील की।
कर्मचारियों की ज़िंदगी भी बदली
फैक्ट्री में काम करने वाले कमलेश विश्वकर्मा पहले दिल्ली में काम करते थे, जहाँ कमाई और खर्च के बीच परिवार चलाना मुश्किल था। अब पटना में स्थानीय रोज़गार मिलने से वह रोज़ घर से फैक्ट्री आते हैं और शाम को परिवार के पास लौटते हैं।
सुदामा कुमार ने बताया कि वह पहले गुजरात में करीब छह महीने काम कर चुके हैं, लेकिन वहाँ की आय पर्याप्त नहीं थी। पटना में रोज़गार मिलने के बाद उनकी स्थिति बेहतर हुई है। गौतम कुमार ने भी कहा कि पहले दिल्ली में कमाई का बड़ा हिस्सा खर्च में चला जाता था और बच्चों की पढ़ाई प्रभावित होती थी — अब वह काम के साथ-साथ खेती-बारी भी कर पाते हैं।
बिहार में रिवर्स माइग्रेशन की उम्मीद
मनोज की फैक्ट्री बिहार में उस रिवर्स माइग्रेशन की एक छोटी लेकिन ठोस तस्वीर पेश करती है, जिसकी चर्चा नीति-निर्माताओं में अक्सर होती है। कर्मचारियों का कहना है कि बिहार में ऐसी और इकाइयाँ स्थापित हों तो रोज़गार के लिए राज्य से बाहर जाने की मजबूरी कम हो सकती है। अगर मनोज का ₹5 करोड़ टर्नओवर का लक्ष्य हासिल होता है, तो रोज़गार में और विस्तार की भी संभावना है।