PM मोदी का 'मन की बात': असम में हाथी लौटे, पिग्मी हॉग की संख्या 190 पार — प्रकृति संरक्षण की बड़ी जीत
सारांश
मुख्य बातें
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने 27 सितंबर 2026 को प्रसारित 'मन की बात' कार्यक्रम के 138वें एपिसोड में असम के वन्यजीव संरक्षण प्रयासों की सराहना करते हुए कहा कि प्रकृति की रक्षा राज्य में ठोस और सकारात्मक बदलाव ला रही है। उन्होंने सोनाई रूपाई वन्यजीव अभयारण्य में हाथियों की वापसी और दुनिया के सबसे दुर्लभ जंगली सुअर पिग्मी हॉग की बढ़ती आबादी को इस बदलाव के प्रमाण के रूप में रेखांकित किया।
सोनाई रूपाई में हाथियों की घर-वापसी
असम स्थित सोनाई रूपाई वन्यजीव अभयारण्य कभी हाथियों का प्रमुख आवास था। प्रधानमंत्री मोदी ने बताया कि धीरे-धीरे जंगल की ज़मीन पर मानवीय अतिक्रमण बढ़ता गया, जिसके चलते हाथियों ने इस इलाके से दूरी बना ली और उनका आना-जाना काफी कम हो गया।
लगभग तीन साल पहले इस वन भूमि को अतिक्रमण से मुक्त कराया गया और जंगल को उसका प्राकृतिक स्वरूप लौटाया गया। इस प्रयास के उत्साहवर्धक नतीजे सामने आए हैं — हाथी एक बार फिर इस अभयारण्य में लौट आए हैं। गौरतलब है कि हाथियों को 'इकोसिस्टम इंजीनियर' कहा जाता है, क्योंकि वे पारिस्थितिकी तंत्र को स्वस्थ और संतुलित बनाए रखने में अहम भूमिका निभाते हैं। उनकी वापसी जंगल के पुनर्जीवित होने का सबसे मज़बूत संकेत है।
पिग्मी हॉग संरक्षण: 6 से 190 की अद्भुत यात्रा
प्रधानमंत्री ने असम में एक और उल्लेखनीय संरक्षण प्रयास का ज़िक्र किया — पिग्मी हॉग को विलुप्ति के कगार से बचाने की मुहिम। यह दुनिया की सबसे छोटी और सबसे दुर्लभ जंगली सुअर प्रजाति है, जो हिमालय की तलहटी में लंबे जलोढ़ घास के मैदानों में पाई जाती है।
एक दौर था जब इस प्रजाति के अस्तित्व पर गहरा संकट मंडरा रहा था और इनकी संख्या बेहद कम रह गई थी। तब केवल 6 पिग्मी हॉग के साथ एक संरक्षण कार्यक्रम शुरू किया गया। इस कार्यक्रम के तहत उन्हें सुरक्षित वातावरण में पाला गया, घास के मैदानों को उनके प्राकृतिक आवास के अनुरूप संवारा गया और फिर उन्हें जंगल में छोड़ा गया।
आज इस समर्पित प्रयास का परिणाम यह है कि पिग्मी हॉग की संख्या बढ़कर 190 से अधिक हो चुकी है — जिसे वन्यजीव संरक्षण के क्षेत्र में एक उल्लेखनीय सफलता माना जा रहा है।
पर्यावरण संरक्षण का व्यापक संदेश
प्रधानमंत्री मोदी ने इन दोनों उदाहरणों के ज़रिए यह संदेश दिया कि जब स्थानीय समुदाय और प्रशासन मिलकर प्रकृति की रक्षा के लिए काम करते हैं, तो नतीजे चमत्कारी हो सकते हैं। यह ऐसे समय में आया है जब भारत जैव विविधता संरक्षण को अपनी नीतियों में केंद्रीय स्थान देने की बात करता रहा है।
असम, जो पहले से ही काजीरंगा राष्ट्रीय उद्यान में एक सींग वाले गैंडे के सफल संरक्षण के लिए विश्वविख्यात है, अब सोनाई रूपाई और पिग्मी हॉग कार्यक्रम के ज़रिए वन्यजीव प्रबंधन में एक और मिसाल कायम करता दिख रहा है।
आगे की राह
विशेषज्ञों के अनुसार, इन सफलताओं को दीर्घकालिक बनाए रखने के लिए वन भूमि पर अतिक्रमण की निगरानी और स्थानीय समुदायों की भागीदारी सुनिश्चित करना ज़रूरी होगा। पिग्मी हॉग के आवास — घास के मैदान — अभी भी कृषि विस्तार और आग लगने की घटनाओं से खतरे में हैं। सोनाई रूपाई में हाथियों की स्थायी वापसी इस बात पर निर्भर करेगी कि वन भूमि अतिक्रमण-मुक्त बनी रहे।