31 अक्टूबर 2026
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राजस्थान IAS शिखर अग्रवाल पर ACB जांच को सरकारी मंज़ूरी, 'अनंता' रिसॉर्ट कंपनी को फायदा पहुँचाने का आरोप

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राजस्थान IAS शिखर अग्रवाल पर ACB जांच को सरकारी मंज़ूरी, 'अनंता' रिसॉर्ट कंपनी को फायदा पहुँचाने का आरोप

सारांश

राजस्थान सरकार ने IAS अधिकारी शिखर अग्रवाल के खिलाफ ACB जांच को मंज़ूरी दे दी है। आरोप है कि उन्होंने 'अनंता' ब्रांड की रिसॉर्ट कंपनी को अनुचित फायदा पहुँचाया और परिवार के नाम पर बाज़ार से कम कीमत पर 26 विला खरीदे — विला पंजीकरण और वित्तीय पैकेज उसी दिन, 27 मार्च 2026 को।

मुख्य बातें

राजस्थान सरकार ने ACB को वरिष्ठ IAS अधिकारी शिखर अग्रवाल के विरुद्ध जांच की पूर्व स्वीकृति भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम, 1988 की धारा 17-ए के तहत दी।
अग्रवाल पर गोयल फैशन प्राइवेट लिमिटेड ( 'अनंता' रिसॉर्ट) के निदेशकों के साथ आपराधिक साजिश और पद के दुरुपयोग का आरोप है।
अग्रवाल और उनकी पत्नी के नाम पर बुझड़ा (उदयपुर) में ₹15 लाख प्रति विला पर 10 विला और अजबगढ़ (अलवर) में ₹16.5 लाख प्रति विला पर 8 विला खरीदे गए।
परिवार के अन्य सदस्यों — दो बेटों और सास-ससुर — के नाम पर 8 और विला खरीदे गए; ACB को संदेह है कि सभी संपत्तियाँ बाज़ार मूल्य से कम पर खरीदी गईं।
27 मार्च, 2026 को 20 विला का पंजीकरण और उसी दिन कंपनी को विशेष रियायती वित्तीय पैकेज जारी होना जांच की केंद्रीय कड़ी है।
ACB महानिदेशक गोविंद गुप्ता ने उद्योग विभाग की फैक्चुअल रिपोर्ट और गोपनीय सूत्रों के आधार पर जांच की आवश्यकता की पुष्टि की।

राजस्थान सरकार ने भ्रष्टाचार विरोधी ब्यूरो (ACB) को वरिष्ठ भारतीय प्रशासनिक सेवा (IAS) अधिकारी शिखर अग्रवाल के विरुद्ध विस्तृत जांच की पूर्व स्वीकृति दे दी है। अग्रवाल पर आरोप है कि उन्होंने अपने आधिकारिक पद का दुरुपयोग कर गोयल फैशन प्राइवेट लिमिटेड — जो 'अनंता' ब्रांड नाम से होटल और रिसॉर्ट संचालित करती है — के निदेशकों के साथ मिलकर कंपनी को अनुचित लाभ पहुँचाने की आपराधिक साजिश रची। इस कथित साजिश से राज्य सरकार को भारी वित्तीय नुकसान पहुँचने की आशंका जताई जा रही है।

जांच का कानूनी आधार

ACB के जनसंपर्क प्रकोष्ठ की प्रेस विज्ञप्ति के अनुसार, यह स्वीकृति भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम, 1988 की धारा 17-ए के तहत प्रदान की गई है। यह धारा किसी लोक सेवक के विरुद्ध जांच शुरू करने से पहले सक्षम प्राधिकारी की अनुमति अनिवार्य बनाती है। ACB के महानिदेशक गोविंद गुप्ता ने कहा कि ब्यूरो ने उद्योग विभाग से प्राप्त तथ्यात्मक रिपोर्ट के आधार पर विस्तृत प्रारंभिक जांच की, जिसके निष्कर्ष और गोपनीय सूत्रों से मिली जानकारी ने औपचारिक जांच की आवश्यकता को रेखांकित किया।

मुख्य आरोप और पदों का दुरुपयोग

ACB की प्रारंभिक जांच के अनुसार, शिखर अग्रवाल ने कथित तौर पर राजस्थान में कई महत्वपूर्ण पदों पर रहते हुए अपने प्रभाव का दुरुपयोग किया। इनमें उदयपुर के जिला कलेक्टर, राजस्थान राज्य प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड के अध्यक्ष और उद्योग विभाग के अतिरिक्त मुख्य सचिव जैसे पद शामिल हैं। ब्यूरो का आरोप है कि इन पदों पर रहते हुए कंपनी को रिसॉर्ट निर्माण के नियमों और शर्तों में छूट, अनिवार्य प्रमाणपत्रों के सत्यापन के बिना अनुमोदन और विशेष रियायती वित्तीय पैकेज दिलाए गए।

विला खरीद और संदिग्ध लेन-देन

ACB ने अग्रवाल और उनके परिवार के सदस्यों के नाम पर दो रिसॉर्ट परिसरों में विला की खरीद को भी जांच के दायरे में लिया है। ब्यूरो के अनुसार, बुझड़ा (उदयपुर) स्थित अनंत रिसॉर्ट में अग्रवाल और उनकी पत्नी के नाम पर ₹15 लाख प्रति विला की दर से 10 विला खरीदे गए। अजबगढ़ (अलवर जिला) स्थित अनंत रिसॉर्ट में उनके और उनकी पत्नी के नाम पर ₹16.5 लाख प्रति विला की दर से 8 विला खरीदे गए।

इसके अतिरिक्त, उनके दो बेटों के नाम पर लगभग ₹15 लाख प्रति विला की दर से 4 विला और सास-ससुर के नाम पर लगभग ₹16.5 लाख प्रति विला की दर से 4 अन्य विला खरीदे गए। ACB को संदेह है कि ये संपत्तियाँ बाज़ार मूल्य से काफी कम कीमत पर खरीदी गई थीं।

लेन-देन की संदिग्ध समयसीमा

ब्यूरो ने इन लेन-देनों की तारीख को विशेष रूप से महत्वपूर्ण बताया है। गोपनीय सूत्रों से मिली जानकारी के अनुसार, अग्रवाल के नाम पर 20 विला का पंजीकरण 27 मार्च, 2026 को हुआ था। यह उल्लेखनीय है कि उसी दिन वित्त विभाग ने कथित तौर पर गोयल फैशन प्राइवेट लिमिटेड को एक विशेष रियायती वित्तीय पैकेज जारी किया। गौरतलब है कि पंजीकरण की तारीख और वित्तीय पैकेज जारी होने की तारीख का एक होना इस मामले में जांच की केंद्रीय कड़ी बन गया है।

आगे की जांच का दायरा

ACB ने स्पष्ट किया है कि परिस्थितियों को देखते हुए समस्त लेन-देन, कंपनी को कथित रूप से दिए गए लाभ और राज्य सरकार को होने वाले संभावित वित्तीय नुकसान की विस्तृत जांच आवश्यक है। यह मामला ऐसे समय में सामने आया है जब राजस्थान में प्रशासनिक पारदर्शिता पहले से ही चर्चा का विषय है। शिखर अग्रवाल के स्वयं का कोई आधिकारिक बयान अभी तक सामने नहीं आया है। आने वाले हफ्तों में औपचारिक जांच के तहत दस्तावेज़ और गवाहियाँ जुटाई जाने की संभावना है।

संपादकीय दृष्टिकोण

या केवल व्यक्ति तक सीमित रहती है। धारा 17-ए की मंज़ूरी मिलना ज़रूरी पहला कदम है, लेकिन राजस्थान में ऐसे कई मामले स्वीकृति के बाद भी वर्षों तक ठंडे बस्ते में रहे हैं।
RashtraPress
31 अक्टूबर 2026

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

IAS अधिकारी शिखर अग्रवाल पर क्या आरोप हैं?
शिखर अग्रवाल पर आरोप है कि उन्होंने उदयपुर के जिला कलेक्टर, राजस्थान राज्य प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड के अध्यक्ष और उद्योग विभाग के अतिरिक्त मुख्य सचिव जैसे पदों पर रहते हुए 'अनंता' ब्रांड की रिसॉर्ट कंपनी गोयल फैशन प्राइवेट लिमिटेड को अनुचित लाभ पहुँचाया। इनमें नियमों में छूट, बिना सत्यापन के अनुमोदन और विशेष वित्तीय पैकेज शामिल हैं, जिससे राज्य सरकार को वित्तीय नुकसान होने की आशंका है।
ACB को जांच की अनुमति किस कानून के तहत मिली?
राजस्थान सरकार ने यह स्वीकृति भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम, 1988 की धारा 17-ए के तहत दी है। यह धारा किसी भी लोक सेवक के विरुद्ध जांच शुरू करने से पहले सक्षम प्राधिकारी की पूर्व अनुमति अनिवार्य करती है।
शिखर अग्रवाल के परिवार ने कितने विला खरीदे और किस कीमत पर?
ACB के अनुसार, बुझड़ा (उदयपुर) में ₹15 लाख प्रति विला की दर से 10 विला और अजबगढ़ (अलवर) में ₹16.5 लाख प्रति विला की दर से 8 विला अग्रवाल और उनकी पत्नी के नाम पर खरीदे गए। उनके दो बेटों के नाम पर 4 और सास-ससुर के नाम पर 4 अतिरिक्त विला खरीदे गए; ACB का संदेह है कि ये सभी बाज़ार मूल्य से काफी कम पर खरीदी गईं।
27 मार्च 2026 की तारीख इस मामले में क्यों अहम है?
गोपनीय सूत्रों के अनुसार, 27 मार्च 2026 को उसी दिन अग्रवाल के नाम पर 20 विला का पंजीकरण हुआ जिस दिन वित्त विभाग ने गोयल फैशन प्राइवेट लिमिटेड को एक विशेष रियायती वित्तीय पैकेज जारी किया। ACB ने इस समयसीमा को लेन-देन की संदिग्ध प्रकृति का प्रमुख संकेतक माना है।
इस मामले में आगे क्या होगा?
सरकारी मंज़ूरी मिलने के बाद ACB अब औपचारिक जांच शुरू करेगी जिसमें दस्तावेज़, गवाहियाँ और वित्तीय रिकॉर्ड खंगाले जाएंगे। जांच का दायरा अग्रवाल के सभी पदों पर लिए गए निर्णयों, कंपनी को दिए गए लाभों और परिवार के नाम पर दर्ज संपत्तियों तक फैला है।
राष्ट्र प्रेस
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