राजिंदर गोयल: रणजी ट्रॉफी में 637 विकेट का अटूट रिकॉर्ड, जेल से डकैत ने भेजी बधाई, फिर भी भारतीय टीम में नहीं मिली जगह
सारांश
मुख्य बातें
हरियाणा के स्पिन जादूगर राजिंदर गोयल भारतीय घरेलू क्रिकेट के उन विरले खिलाड़ियों में हैं, जिनका नाम इतिहास के पन्नों में स्वर्णाक्षरों में दर्ज है — लेकिन जिन्हें कभी राष्ट्रीय टीम की जर्सी नसीब नहीं हुई। रणजी ट्रॉफी में 637 विकेट का उनका रिकॉर्ड आज भी अटूट है और घरेलू क्रिकेट की दुनिया में एक ऐसी विरासत है जिसे पूर्व कप्तान बिशन सिंह बेदी तक अभेद्य मानते थे।
गलियों से रणजी तक का सफर
राजिंदर गोयल का जन्म 20 सितंबर 1942 को हरियाणा में हुआ था। बचपन से ही क्रिकेट उनकी रगों में दौड़ता था। गली-मोहल्ले की पिचों से शुरू हुई उनकी यात्रा जल्द ही हरियाणा की घरेलू टीम तक पहुँची, जहाँ उनकी बाएँ हाथ की स्पिन गेंदबाज़ी ने बल्लेबाज़ों को बार-बार चकमा दिया। वे उन पिचों पर भी गेंद को ख़तरनाक तरीके से टर्न कराने में सक्षम थे, जहाँ आमतौर पर बल्लेबाज़ रनों की बाढ़ ला देते थे।
आँकड़े जो इतिहास बन गए
प्रथम श्रेणी क्रिकेट में राजिंदर गोयल ने 157 मैच खेले और मात्र 18.58 की औसत से 750 विकेट हासिल किए। एक मैच में 10 या अधिक विकेट लेने का कारनामा उन्होंने 18 बार किया, जबकि एक पारी में पाँच या अधिक विकेट झटकने का सिलसिला 59 बार दोहराया। रणजी ट्रॉफी में उनके 637 विकेट आज भी सर्वाधिक विकेट का रिकॉर्ड बने हुए हैं। भारत के पूर्व कप्तान और दिग्गज स्पिनर बिशन सिंह बेदी ने एक बार कहा था कि उन्हें नहीं लगता कि यह रिकॉर्ड कभी टूट पाएगा।
जेल से डकैत का पत्र — लोकप्रियता की अनोखी मिसाल
राजिंदर गोयल की लोकप्रियता केवल क्रिकेट के मैदान तक सीमित नहीं थी। उन्होंने स्वयं बताया था कि रणजी ट्रॉफी में 600 विकेट पूरे करने के बाद उन्हें ग्वालियर जेल से कुख्यात डकैत भूरा सिंह यादव का एक पत्र प्राप्त हुआ था। उस पत्र में भूरा सिंह ने इस ऐतिहासिक उपलब्धि पर उन्हें बधाई दी और खुद को उनका बड़ा प्रशंसक बताया। उस दौर में भूरा सिंह यादव उत्तर प्रदेश और मध्य प्रदेश के सर्वाधिक चर्चित डकैतों में गिने जाते थे। यह वाकया इस बात का प्रमाण है कि राजिंदर गोयल का जादू समाज के हर तबके तक पहुँचता था।
भारतीय टीम में जगह क्यों नहीं मिली
यह भारतीय क्रिकेट इतिहास के सबसे बड़े विरोधाभासों में से एक है — घरेलू क्रिकेट में इतनी ऐतिहासिक उपलब्धियाँ हासिल करने के बावजूद राजिंदर गोयल कभी राष्ट्रीय चयनकर्ताओं का भरोसा नहीं जीत सके। उनके समकालीन दौर में बिशन सिंह बेदी, एस. वेंकटराघवन और ई.ए.एस. प्रसन्ना जैसे दिग्गज स्पिनरों की मौजूदगी ने उनकी राह और कठिन बना दी। आलोचकों का कहना है कि उस दौर में चयन प्रक्रिया में क्षेत्रीय संतुलन और व्यक्तिगत प्राथमिकताओं का भी असर पड़ता था, जिसने गोयल जैसे प्रतिभाशाली खिलाड़ियों को हाशिये पर धकेल दिया।
विरासत और अंतिम विदाई
गौरतलब है कि राजिंदर गोयल ने अपने पूरे करियर में बिना किसी अंतरराष्ट्रीय मैच के घरेलू क्रिकेट को वह सब कुछ दिया, जो एक खिलाड़ी दे सकता है। 21 जून 2020 को 77 वर्ष की आयु में उन्होंने रोहतक, हरियाणा स्थित अपने घर पर अंतिम साँस ली। उनका निधन भारतीय घरेलू क्रिकेट के एक युग के अवसान का प्रतीक था। उनका रिकॉर्ड आने वाली पीढ़ियों को यह याद दिलाता रहेगा कि महानता हमेशा सुर्खियों की मोहताज नहीं होती।