मार्को रूबियो बहरीन पहुंचे, ईरान समझौते पर खाड़ी देशों को दिया सुरक्षा का भरोसा
सारांश
मुख्य बातें
अमेरिकी विदेश मंत्री मार्को रूबियो 25 जून को मनामा, बहरीन पहुंचे — यह उनकी तीन दिवसीय खाड़ी यात्रा का अंतिम पड़ाव था, जिसका मुख्य उद्देश्य ट्रंप प्रशासन और ईरान के बीच हुए प्रारंभिक समझौते को लेकर चिंतित खाड़ी देशों को आश्वस्त करना है। यह यात्रा पिछले सप्ताह हुए अमेरिका-ईरान प्रारंभिक समझौते के बाद उनकी पहली क्षेत्रीय कूटनीतिक यात्रा है।
यात्रा का दायरा और उद्देश्य
22 जून को अमेरिकी विदेश मंत्रालय ने बयान जारी कर बताया था कि रूबियो 23 से 25 जून तक संयुक्त अरब अमीरात, कुवैत और बहरीन की यात्रा करेंगे। इस दौरान वे गल्फ कोऑपरेशन काउंसिल (जीसीसी) के प्रतिनिधियों से मिलेंगे और ईरान के साथ हुए समझौता ज्ञापन (एमओयू), स्ट्रेट ऑफ होर्मुज के माध्यम से निर्बाध समुद्री आवागमन तथा क्षेत्रीय शांति और स्थिरता जैसे मुद्दों पर चर्चा करेंगे।
जीसीसी में बहरीन, कुवैत, ओमान, कतर, सऊदी अरब और संयुक्त अरब अमीरात शामिल हैं। बहरीन में रूबियो ने बहरीनी अधिकारियों के साथ-साथ जीसीसी प्रतिनिधियों से भी मुलाकात की, जहाँ क्षेत्रीय साझा हितों और प्राथमिकताओं पर विचार-विमर्श हुआ।
खाड़ी देशों की चिंताएँ
खाड़ी देशों को आशंका है कि प्रस्तावित समझौते के तहत ईरान को मिलने वाली संभावित रियायतें उसकी क्षेत्रीय ताकत को और मज़बूत कर सकती हैं। गौरतलब है कि हालिया अमेरिका-इज़रायल और ईरान संघर्ष के दौरान कुछ खाड़ी देशों को भी ईरानी हमलों का सामना करना पड़ा था, जिससे इन देशों की सतर्कता और बढ़ गई है।
यह ऐसे समय में आया है जब मध्य पूर्व में शक्ति-संतुलन पहले से ही नाज़ुक दौर से गुज़र रहा है। खाड़ी देशों और अमेरिका के बीच लंबे समय से सुरक्षा और सैन्य सहयोग रहा है, और इन देशों में महत्वपूर्ण अमेरिकी सैन्य ठिकाने मौजूद हैं।
रूबियो का आश्वासन
कुवैत में पत्रकारों से बात करते हुए रूबियो ने स्पष्ट किया, 'हम ऐसा कुछ नहीं करेंगे जो क्षेत्र में हमारे लंबे समय से चले आ रहे सहयोगियों की सुरक्षा को कमज़ोर करे।' संयुक्त अरब अमीरात और कुवैत में हुई बैठकों के दौरान भी उन्होंने यह भरोसा दिलाने की कोशिश की कि प्रस्तावित समझौता ईरान के पक्ष में अत्यधिक झुका हुआ नहीं है।
आगे क्या
रूबियो की इस यात्रा के बाद अमेरिका और ईरान के बीच औपचारिक वार्ता की दिशा स्पष्ट होने की उम्मीद है। खाड़ी देश यह देखना चाहते हैं कि किसी भी अंतिम समझौते में उनकी सुरक्षा चिंताओं को पर्याप्त स्थान मिले। आलोचकों का कहना है कि जब तक समझौते की विस्तृत शर्तें सार्वजनिक नहीं होतीं, तब तक खाड़ी देशों की बेचैनी पूरी तरह दूर नहीं होगी।