महाकुंभ खर्च विवाद: साध्वी ऋतंभरा बोलीं — 'कुंभ देश की आध्यात्मिक एकता का प्रतीक, आर्थिक नजरिए से न आँकें'
सारांश
मुख्य बातें
वृंदावन में 25 अगस्त को साध्वी ऋतंभरा ने महाकुंभ के आयोजन पर हुए भारी खर्च को लेकर उठ रहे सवालों का सीधा जवाब दिया और कहा कि कुंभ को केवल आर्थिक व्यय के चश्मे से देखना उचित नहीं है — यह भारत की आध्यात्मिक और सांस्कृतिक एकता का सबसे बड़ा प्रतीक है। उनके अनुसार, इस आयोजन में देश के विभिन्न संप्रदायों और वर्गों के लोग एकसाथ आते हैं, जिससे सामाजिक भेदभाव की दीवारें कमज़ोर होती हैं।
महाकुंभ के खर्च पर साध्वी का पक्ष
साध्वी ऋतंभरा ने स्पष्ट किया कि महाकुंभ में पूरे भारत की आध्यात्मिक शक्ति एक स्थान पर एकत्रित होती है। उन्होंने कहा कि अलग-अलग पृष्ठभूमि के लोग एकसाथ गंगा स्नान करते हैं और स्वयं को एक विशाल सांस्कृतिक समुदाय का हिस्सा अनुभव करते हैं। उनके शब्दों में, 'ऐसे आयोजनों पर अगर अरबों रुपये भी खर्च होते हैं, तो भारतीय संस्कृति और आध्यात्मिक परंपरा के संदर्भ में इसे केवल खर्च के रूप में नहीं देखा जाना चाहिए।'
उन्होंने यह भी कहा कि जो लोग महाकुंभ पर खर्च किए गए धन को अन्यत्र लगाने की वकालत करते हैं, उन्हें पहले देश में भ्रष्टाचार और घोटालों को समाप्त करने पर ध्यान केंद्रित करना चाहिए।
शिक्षा और स्वास्थ्य पर भी दिया ज़ोर
साध्वी ऋतंभरा ने एक संतुलित दृष्टिकोण रखते हुए यह भी स्वीकार किया कि देश में शिक्षा और स्वास्थ्य व्यवस्था को सुदृढ़ करना उतना ही आवश्यक है। उन्होंने कहा कि देश के प्रत्येक विद्यार्थी को विद्यालय मिले, बेहतर चिकित्सा सुविधाएँ उपलब्ध हों और बच्चों को उत्तम संस्कार दिए जाएँ — यह सुनिश्चित करना सरकार और समाज दोनों की प्राथमिकता होनी चाहिए।
भ्रष्टाचार पर साध्वी का निशाना
भ्रष्टाचार के मुद्दे पर साध्वी ऋतंभरा ने कहा कि यदि सरकारी और सार्वजनिक धन के साथ किसी प्रकार की बेईमानी न हो और भ्रष्टाचार पर प्रभावी रोक लगे, तो देश के विकास एवं जनकल्याण के लिए पर्याप्त संसाधन स्वतः उपलब्ध हो सकते हैं। उन्होंने भ्रष्टाचार को देश की खुशहाली के मार्ग में सबसे बड़ी बाधाओं में से एक बताया।
सांस्कृतिक परंपराओं की रक्षा का आह्वान
मुंबई में गणपति उत्सव के दौरान हुई घटना पर पूछे गए प्रश्न के जवाब में साध्वी ऋतंभरा ने भारत की धार्मिक और सांस्कृतिक परंपराओं की रक्षा पर बल दिया। उन्होंने कहा कि गणपति उत्सव, दुर्गा उत्सव, नवरात्रि, रामनवमी और दीपावली जैसे पर्व पूरे उत्साह और श्रद्धा के साथ मनाए जाते रहेंगे। उनके अनुसार, देश की सांस्कृतिक परंपराएँ भारत की पहचान का अभिन्न अंग हैं। उन्होंने यह भी कहा कि जिन्हें इन परंपराओं से आपत्ति हो, उन्हें देश में रहने को लेकर पुनर्विचार करना चाहिए — और इस संदर्भ में उन्होंने पाकिस्तान और बांग्लादेश का उल्लेख किया।
रक्षाबंधन अभियान: ढाई लाख राखियाँ सीमाओं तक पहुँचेंगी
साध्वी ऋतंभरा ने रक्षाबंधन से जुड़े अभियान की जानकारी देते हुए बताया कि इस बार देशभर से करीब ढाई लाख राखियाँ प्राप्त हुई हैं, जबकि शुरुआत में केवल सवा लाख राखियों का संकल्प लिया गया था। उन्होंने कहा कि ये राखियाँ देश के विभिन्न सीमावर्ती क्षेत्रों तक पहुँचाई जाएँगी, जहाँ बेटियाँ जाकर जवानों को राखी बाँधेंगी। देश की सीमाओं की रक्षा करने वाले जवानों के प्रति सम्मान और कृतज्ञता व्यक्त करना समाज की ज़िम्मेदारी है — यह उनका स्पष्ट संदेश था।
गौरतलब है कि महाकुंभ के खर्च को लेकर विभिन्न तबकों में बहस जारी है और साध्वी ऋतंभरा का यह बयान उस बहस में एक महत्वपूर्ण धार्मिक-सामाजिक दृष्टिकोण जोड़ता है।