नक्सलवाद की जड़ें समझना जरूरी है: सैम पित्रोदा
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वॉशिंगटन, 2 अप्रैल (राष्ट्र प्रेस)। इंडियन ओवरसीज कांग्रेस के प्रमुख सैम पित्रोदा ने गुरुवार को केंद्र की भाजपा-नेतृत्व वाली एनडीए सरकार के उस दावे का स्वागत किया है कि देश में नक्सलवाद लगभग समाप्त हो चुका है। हालांकि, उन्होंने यह भी बताया कि नक्सलवाद की “जड़” को समझना अत्यंत आवश्यक है।
राष्ट्र प्रेस के साथ बातचीत में पित्रोदा ने कहा कि भारत की वर्तमान चुनाव प्रक्रिया को लेकर उनके मन में “ट्रस्ट डेफिसिट” है और भविष्य में मोबाइल फोन के माध्यम से ब्लॉकचेन और आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस के जरिए वोटिंग की संभावना है। उन्होंने कई सवालों के जवाब भी दिए।
सवाल: भारत सरकार का दावा है कि देश से नक्सलवाद लगभग समाप्त हो गया है। आप इसे कैसे देखते हैं?
जवाब: मैं संवाद में विश्वास करता हूँ, बल प्रयोग में नहीं। ये समस्याएँ बहुत जटिल हैं और करीब 50 वर्ष से चल रही हैं। मैंने अपने युवा अवस्था में नक्सलवाद का अध्ययन किया है। यदि हम इसकी जड़ में जाएं तो हमें समझना होगा कि लोग हथियार उठाने के लिए क्यों मजबूर हुए। मैं इसे सही नहीं ठहरा रहा, लेकिन हर पहलू को देखना आवश्यक है। हमें दूसरों के दृष्टिकोण से भी सोचना होगा, जैसे महात्मा गांधी कहते थे। मुझे खुशी है कि अब हिंसा और डर नहीं है, लेकिन यह किस कीमत पर हुआ, यह समझना भी आवश्यक है। यह एक जटिल मुद्दा है।
सवाल: केरल और पश्चिम बंगाल में विधानसभा चुनाव हो रहे हैं, आपकी क्या अपेक्षाएं हैं?
जवाब: मुझे भारत में स्वतंत्र और निष्पक्ष चुनावों को लेकर चिंता है। पूरी प्रक्रिया में कुछ न कुछ गड़बड़ है- चाहे वह ईवीएम, वीवीपैट, सॉफ्टवेयर, वोटर लिस्ट, या वीडियो रिकॉर्डिंग हो। कई ऐसे बिंदु हैं जहाँ हेरफेर संभव है। मुझे लगता है कि कहीं न कहीं यह हो भी रहा है। कितना और कहाँ, यह बताना मुश्किल है। इसलिए मुझे चुनाव प्रक्रिया पर भरोसा नहीं है। यह ट्रस्ट डेफिसिट सबसे ज्यादा परेशान करता है।
सवाल: लेकिन इन चुनावों में कुछ जगह सत्तारूढ़ पार्टी जीतती है और कहीं विपक्ष, ऐसे में आपके आरोप कैसे साबित होंगे?
जवाब: यह जीत-हार का मुद्दा नहीं है। आप किसी भी तरह से परिणाम को प्रभावित कर सकते हैं। मान लीजिए कोई छोटा राज्य है तो वहाँ आपको जीतने दिया जाए, लेकिन बड़े और महत्वपूर्ण राज्य में नहीं। यह केवल एक उदाहरण है, मैं यह नहीं कह रहा कि ऐसा हुआ है। जब तक यह ट्रस्ट डेफिसिट खत्म नहीं होगा, तब तक स्पष्ट रूप से कुछ कहना मुश्किल है।
सवाल: आप एक इंजीनियर हैं। तकनीक में सुधार के साथ क्या समाधान हो सकता है?
जवाब: जब तक मुझे एक पेपर रसीद नहीं मिलेगी और उसे एक अलग बॉक्स में डालने का मौका नहीं मिलेगा, मुझे भरोसा नहीं होगा।
सवाल: लेकिन उन पर्चियों की गिनती भी तो कोई करेगा?
जवाब: हाँ, लेकिन कम से कम दोबारा गिनती करके सत्यापन किया जा सकता है। आज मेरे पास सत्यापन का कोई तरीका नहीं है।
सवाल: क्या आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस और ब्लॉकचेन के दौर में कोई तकनीकी समाधान संभव है?
जवाब: बिल्कुल। मुझे लगता है कि भविष्य में मोबाइल फोन पर ब्लॉकचेन आधारित सुरक्षित वोटिंग होगी। इसमें थोड़ी बहुत त्रुटि (0.1%) हो सकती है, लेकिन यह स्वीकार्य है। इससे लोगों को बूथ पर जाने की जरूरत नहीं होगी, लाइनें नहीं लगेंगी और पूरी प्रक्रिया आसान हो जाएगी।
सवाल: ई-गवर्नेंस और शिक्षा जैसे क्षेत्रों में आप क्या बदलाव देखते हैं?
जवाब: अगर मौका मिले तो मैं भारत की मौजूदा ई-गवर्नेंस प्रणाली को पूरी तरह से फिर से डिजाइन करना चाहूंगा ताकि एआई का बेहतर उपयोग हो सके। एआई सरकार के आकार को छोटा करने में मदद कर सकता है, लेकिन इस पर खुलकर बात करना मुश्किल है। मैं यह भी सवाल उठाता हूँ कि क्या आज के समय में डिग्री की जरूरत है? जब सारी जानकारी हमारी उंगलियों पर है, तो हमें अलग तरह से सोचने की जरूरत है। आज के दौर में शिक्षक की भूमिका बदलनी चाहिए, मुझे शिक्षक नहीं, एक मेंटर चाहिए। मेरा सपना है कि एआई के जरिए भूख और गरीबी खत्म की जाए। यह संभव है, बस इसके लिए राजनीतिक इच्छाशक्ति चाहिए। एआई भारत के लिए बड़े समस्याओं का समाधान करने का एक बड़ा अवसर है।