22 जुलाई 2026
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संतकबीरनगर: अरुण उर्फ डग्गू हत्याकांड में दोनों आरोपी बरी, कोर्ट ने विवेचक पर विभागीय कार्रवाई की संस्तुति की

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संतकबीरनगर: अरुण उर्फ डग्गू हत्याकांड में दोनों आरोपी बरी, कोर्ट ने विवेचक पर विभागीय कार्रवाई की संस्तुति की

सारांश

चार साल की सुनवाई के बाद संतकबीरनगर की अदालत ने 7 वर्षीय अरुण उर्फ डग्गू हत्याकांड में दोनों आरोपियों को साक्ष्य के अभाव में बरी कर दिया। साथ ही जाँच अधिकारी पर विभागीय कार्रवाई की संस्तुति — एक मासूम की मौत, और न्याय अभी भी अधूरा।

मुख्य बातें

संतकबीरनगर की अदालत ने 22 जुलाई 2026 को अरुण उर्फ डग्गू हत्याकांड में दोनों आरोपियों को बरी किया।
आरोपी रविचंद्र उर्फ मंटू और धनेश्वर उर्फ झिंगेलाल को संदेह का लाभ देते हुए सभी आरोपों से मुक्त किया गया।
अभियोजन पक्ष 'लास्ट सीन', मकसद, बरामदगी और वैज्ञानिक साक्ष्य — किसी भी बिंदु पर संदेह से परे अपराध सिद्ध नहीं कर सका।
अदालत ने तत्कालीन विवेचक निरीक्षक विजय नारायण प्रसाद की जाँच को दोषपूर्ण मानते हुए विभागीय कार्रवाई की संस्तुति की।
रविचंद्र करीब चार वर्षों तक न्यायिक हिरासत में रहे; धनेश्वर को पहले उच्च न्यायालय से जमानत मिली थी।
पीड़ित परिवार के लिए न्याय का प्रश्न अभी भी अनुत्तरित है।

संतकबीरनगर के बहुचर्चित सात वर्षीय अरुण उर्फ डग्गू हत्याकांड में 22 जुलाई 2026 को अदालत ने बड़ा फैसला सुनाते हुए दोनों आरोपियों — रविचंद्र उर्फ मंटू और धनेश्वर उर्फ झिंगेलाल — को संदेह का लाभ देते हुए सभी आरोपों से बरी कर दिया। इसके साथ ही अदालत ने विवेचना में गंभीर खामियाँ पाते हुए तत्कालीन जाँच अधिकारी के विरुद्ध विभागीय कार्रवाई की संस्तुति भी की।

मामले की पृष्ठभूमि

5 मार्च 2022 को कोतवाली खलीलाबाद क्षेत्र के मटिहना गाँव की एक महिला ने पुलिस को सूचना दी कि उसका 7 वर्षीय बेटा अरुण उर्फ डग्गू लापता हो गया है। अगले दिन 6 मार्च 2022 को महुली थाना क्षेत्र के राजघाट के निकट एक नाले के किनारे झाड़ियों में बच्चे का शव बरामद हुआ।

शव मिलने के बाद पीड़ित महिला ने पुलिस में शिकायत दर्ज कराई और आरोप लगाया कि गाँव के ही रविचंद्र उर्फ मंटू और धनेश्वर उर्फ झिंगेलाल ने उसके बेटे का अपहरण कर हत्या की। पुलिस ने दोनों को गिरफ्तार कर जेल भेज दिया। बाद में धनेश्वर को उच्च न्यायालय से जमानत मिल गई, जबकि रविचंद्र करीब चार साल तक न्यायिक हिरासत में रहे।

अदालत का फैसला और आधार

अपर सत्र न्यायाधीश एवं विशेष न्यायाधीश (एससी/एसटी एक्ट) की अदालत ने करीब चार वर्षों की सुनवाई के पश्चात निर्णय सुनाया कि अभियोजन पक्ष आरोपियों के विरुद्ध परिस्थितिजन्य साक्ष्यों की मजबूत और पूर्ण श्रृंखला प्रस्तुत करने में असफल रहा। अदालत के अनुसार 'लास्ट सीन', अपराध का मकसद, बरामदगी और वैज्ञानिक साक्ष्य — किसी भी पहलू ने संदेह से परे अपराध सिद्ध नहीं किया। इसी आधार पर दोनों आरोपियों को दोषमुक्त कर रिहा करने का आदेश दिया गया।

विवेचक पर कड़ी टिप्पणी

फैसले में अदालत ने जाँच की गुणवत्ता पर भी कड़ी नाराजगी व्यक्त की। अदालत ने कहा कि तत्कालीन विवेचक निरीक्षक विजय नारायण प्रसाद ने जाँच के दौरान आवश्यक कानूनी प्रक्रियाओं का पालन नहीं किया, जिससे पूरी जाँच की निष्पक्षता और विश्वसनीयता प्रभावित हुई। अदालत ने इसे घोर लापरवाही मानते हुए उनके विरुद्ध विभागीय कार्रवाई की संस्तुति की है।

पुलिस जाँच पर उठे सवाल

यह फैसला ऐसे समय में आया है जब उत्तर प्रदेश में बाल अपराध मामलों में जाँच की गुणवत्ता पहले से ही बहस का विषय रही है। गौरतलब है कि इस मामले में रविचंद्र चार साल तक जेल में रहे और अब अदालत ने ही जाँच को दोषपूर्ण करार दिया है — यह स्थिति पुलिस विवेचना की कार्यशैली पर गंभीर प्रश्नचिह्न खड़े करती है। आलोचकों का कहना है कि त्रुटिपूर्ण जाँच न केवल न्याय की राह में बाधा बनती है, बल्कि निर्दोष व्यक्तियों को वर्षों की कैद भी दिला सकती है।

आगे की स्थिति

अदालत की संस्तुति के बाद अब निरीक्षक विजय नारायण प्रसाद के विरुद्ध विभागीय कार्रवाई की प्रक्रिया शुरू होने की संभावना है। वहीं, अरुण उर्फ डग्गू के परिजनों के लिए न्याय का प्रश्न अभी भी अनुत्तरित है — असली दोषी कौन है, यह अब भी जाँच का विषय बना हुआ है।

संपादकीय दृष्टिकोण

और अंत में खुद अदालत को जाँच को दोषपूर्ण करार देना पड़ा। निरीक्षक विजय नारायण प्रसाद पर विभागीय कार्रवाई की संस्तुति स्वागतयोग्य है, लेकिन यह उन चार वर्षों की भरपाई नहीं कर सकती जो रविचंद्र ने जेल में बिताए। असली सवाल यह है कि अरुण उर्फ डग्गू का हत्यारा अभी भी पकड़ से बाहर है — और कमज़ोर विवेचना ने उसे शायद कभी न पकड़े जाने का मौका दे दिया।
RashtraPress
22 जुलाई 2026

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

अरुण उर्फ डग्गू हत्याकांड क्या है?
यह उत्तर प्रदेश के संतकबीरनगर जिले के मटिहना गाँव के 7 वर्षीय बच्चे अरुण उर्फ डग्गू की हत्या का मामला है। 5 मार्च 2022 को वह लापता हुआ और 6 मार्च 2022 को राजघाट के पास नाले किनारे उसका शव मिला था।
अदालत ने आरोपियों को क्यों बरी किया?
अपर सत्र न्यायाधीश की अदालत ने पाया कि अभियोजन पक्ष 'लास्ट सीन', अपराध का मकसद, बरामदगी और वैज्ञानिक साक्ष्य — किसी भी पहलू पर संदेह से परे अपराध सिद्ध नहीं कर सका। परिस्थितिजन्य साक्ष्यों की पूरी और मजबूत श्रृंखला न होने के कारण दोनों आरोपियों को संदेह का लाभ देते हुए बरी किया गया।
विवेचक निरीक्षक विजय नारायण प्रसाद पर क्या कार्रवाई होगी?
अदालत ने अपने फैसले में तत्कालीन विवेचक निरीक्षक विजय नारायण प्रसाद के विरुद्ध विभागीय कार्रवाई की संस्तुति की है। अदालत ने माना कि उन्होंने जाँच में आवश्यक कानूनी प्रक्रियाओं का पालन नहीं किया, जिससे जाँच की निष्पक्षता प्रभावित हुई।
आरोपी रविचंद्र और धनेश्वर कितने समय से हिरासत में थे?
रविचंद्र उर्फ मंटू करीब चार वर्षों तक न्यायिक हिरासत में रहे। धनेश्वर उर्फ झिंगेलाल को कुछ समय बाद उच्च न्यायालय से जमानत मिल गई थी, इसलिए वे पहले ही रिहा हो चुके थे।
क्या इस फैसले के बाद असली दोषी की तलाश होगी?
दोनों आरोपियों के बरी होने के बाद अरुण उर्फ डग्गू के हत्यारे की पहचान और गिरफ्तारी का प्रश्न अनुत्तरित है। त्रुटिपूर्ण जाँच के कारण मामले की दोबारा विवेचना की संभावना पर अभी कोई आधिकारिक बयान सामने नहीं आया है।
राष्ट्र प्रेस
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