संतकबीरनगर: अरुण उर्फ डग्गू हत्याकांड में दोनों आरोपी बरी, कोर्ट ने विवेचक पर विभागीय कार्रवाई की संस्तुति की
सारांश
मुख्य बातें
संतकबीरनगर के बहुचर्चित सात वर्षीय अरुण उर्फ डग्गू हत्याकांड में 22 जुलाई 2026 को अदालत ने बड़ा फैसला सुनाते हुए दोनों आरोपियों — रविचंद्र उर्फ मंटू और धनेश्वर उर्फ झिंगेलाल — को संदेह का लाभ देते हुए सभी आरोपों से बरी कर दिया। इसके साथ ही अदालत ने विवेचना में गंभीर खामियाँ पाते हुए तत्कालीन जाँच अधिकारी के विरुद्ध विभागीय कार्रवाई की संस्तुति भी की।
मामले की पृष्ठभूमि
5 मार्च 2022 को कोतवाली खलीलाबाद क्षेत्र के मटिहना गाँव की एक महिला ने पुलिस को सूचना दी कि उसका 7 वर्षीय बेटा अरुण उर्फ डग्गू लापता हो गया है। अगले दिन 6 मार्च 2022 को महुली थाना क्षेत्र के राजघाट के निकट एक नाले के किनारे झाड़ियों में बच्चे का शव बरामद हुआ।
शव मिलने के बाद पीड़ित महिला ने पुलिस में शिकायत दर्ज कराई और आरोप लगाया कि गाँव के ही रविचंद्र उर्फ मंटू और धनेश्वर उर्फ झिंगेलाल ने उसके बेटे का अपहरण कर हत्या की। पुलिस ने दोनों को गिरफ्तार कर जेल भेज दिया। बाद में धनेश्वर को उच्च न्यायालय से जमानत मिल गई, जबकि रविचंद्र करीब चार साल तक न्यायिक हिरासत में रहे।
अदालत का फैसला और आधार
अपर सत्र न्यायाधीश एवं विशेष न्यायाधीश (एससी/एसटी एक्ट) की अदालत ने करीब चार वर्षों की सुनवाई के पश्चात निर्णय सुनाया कि अभियोजन पक्ष आरोपियों के विरुद्ध परिस्थितिजन्य साक्ष्यों की मजबूत और पूर्ण श्रृंखला प्रस्तुत करने में असफल रहा। अदालत के अनुसार 'लास्ट सीन', अपराध का मकसद, बरामदगी और वैज्ञानिक साक्ष्य — किसी भी पहलू ने संदेह से परे अपराध सिद्ध नहीं किया। इसी आधार पर दोनों आरोपियों को दोषमुक्त कर रिहा करने का आदेश दिया गया।
विवेचक पर कड़ी टिप्पणी
फैसले में अदालत ने जाँच की गुणवत्ता पर भी कड़ी नाराजगी व्यक्त की। अदालत ने कहा कि तत्कालीन विवेचक निरीक्षक विजय नारायण प्रसाद ने जाँच के दौरान आवश्यक कानूनी प्रक्रियाओं का पालन नहीं किया, जिससे पूरी जाँच की निष्पक्षता और विश्वसनीयता प्रभावित हुई। अदालत ने इसे घोर लापरवाही मानते हुए उनके विरुद्ध विभागीय कार्रवाई की संस्तुति की है।
पुलिस जाँच पर उठे सवाल
यह फैसला ऐसे समय में आया है जब उत्तर प्रदेश में बाल अपराध मामलों में जाँच की गुणवत्ता पहले से ही बहस का विषय रही है। गौरतलब है कि इस मामले में रविचंद्र चार साल तक जेल में रहे और अब अदालत ने ही जाँच को दोषपूर्ण करार दिया है — यह स्थिति पुलिस विवेचना की कार्यशैली पर गंभीर प्रश्नचिह्न खड़े करती है। आलोचकों का कहना है कि त्रुटिपूर्ण जाँच न केवल न्याय की राह में बाधा बनती है, बल्कि निर्दोष व्यक्तियों को वर्षों की कैद भी दिला सकती है।
आगे की स्थिति
अदालत की संस्तुति के बाद अब निरीक्षक विजय नारायण प्रसाद के विरुद्ध विभागीय कार्रवाई की प्रक्रिया शुरू होने की संभावना है। वहीं, अरुण उर्फ डग्गू के परिजनों के लिए न्याय का प्रश्न अभी भी अनुत्तरित है — असली दोषी कौन है, यह अब भी जाँच का विषय बना हुआ है।