सुप्रीम कोर्ट ने चार भारतीय मिशनों में पासपोर्ट-वीजा आउटसोर्सिंग टेंडर रद्द करने का हाईकोर्ट फैसला बरकरार रखा
सारांश
मुख्य बातें
सर्वोच्च न्यायालय ने 20 जुलाई 2026 को दिल्ली हाईकोर्ट के उस आदेश में हस्तक्षेप करने से इनकार कर दिया, जिसमें अबूधाबी, कुवैत, सिंगापुर और कैनबरा (ऑस्ट्रेलिया) स्थित भारतीय मिशनों में कॉन्सुलर, पासपोर्ट और वीजा (सीपीवी) सेवाओं की आउटसोर्सिंग के लिए जारी टेंडर की तकनीकी मूल्यांकन प्रक्रिया को रद्द किया गया था। साथ ही, शीर्ष अदालत ने विदेश मंत्रालय को तीन महीने के भीतर नई टेंडर प्रक्रिया पूरी करने का निर्देश दिया।
सुप्रीम कोर्ट की बेंच और फैसला
भारत के मुख्य न्यायाधीश (सीजेआई) सूर्यकांत तथा जस्टिस जॉयमाल्य बागची और जस्टिस वी. मोहना की खंडपीठ ने केंद्र सरकार की स्पेशल लीव पिटिशन (एसएलपी) को खारिज कर दिया। केंद्र की ओर से सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने दलील दी कि दिल्ली हाईकोर्ट ने टेंडर प्रक्रिया रद्द करने में भूल की और तर्क दिया कि मूल्यांकन मानदंड प्रत्येक बोलीदाता की व्यक्तिगत क्षमता के आधार पर लागू किए गए थे। उन्होंने अतिरिक्त कारणों के साथ हाईकोर्ट में पुनः जाने की अनुमति भी माँगी, किंतु सुप्रीम कोर्ट ने यह याचिका अस्वीकार कर दी।
अंतरिम व्यवस्था के निर्देश
विदेशों में भारतीय नागरिकों की पासपोर्ट, वीजा और कांसुलर सेवाएँ बाधित न हों, इसे ध्यान में रखते हुए सुप्रीम कोर्ट ने हाईकोर्ट के निर्देशों में आंशिक संशोधन किया। सीजेआई सूर्यकांत की अध्यक्षता वाली पीठ ने स्पष्ट किया कि यदि मौजूदा सेवा प्रदाताओं का कार्य संतोषजनक रहा है, तो विदेश मंत्रालय उनके साथ काम जारी रख सकता है — अथवा अंतरिम अवधि के लिए किसी अन्य एजेंसी को, जिसमें मौजूदा एल-1 बोलीदाता भी शामिल हैं, नियुक्त कर सकता है। अदालत ने यह भी स्पष्ट किया कि यह व्यवस्था पूर्णतः अस्थायी होगी, इससे किसी भी पक्ष को कोई विशेष अधिकार या दावा नहीं मिलेगा और यह नई 'रिक्वेस्ट फॉर प्रपोजल' (आरएफपी) प्रक्रिया के परिणाम पर निर्भर रहेगी।
दिल्ली हाईकोर्ट का मूल फैसला
15 जुलाई को जस्टिस अनिल क्षेत्रपाल और जस्टिस शैल जैन की डिवीजन बेंच ने चारों भारतीय मिशनों में सीपीवी सेवाओं की आउटसोर्सिंग की तकनीकी मूल्यांकन प्रक्रिया को रद्द करते हुए माना था कि बोलीदाताओं का मूल्यांकन संविधान के अनुच्छेद 14 का उल्लंघन करते हुए 'मनमानेपन, अतार्किकता और पारदर्शिता की कमी' से प्रभावित था। यह फैसला ई ट्रैव टेक लिमिटेड और वेरासिस लिमिटेड की याचिकाओं पर आया था, जिन्हें तकनीकी बोली के चरण में ही अयोग्य घोषित कर दिया गया था। हाईकोर्ट ने सफल निजी बोलीदाताओं को दिए गए अनुबंध भी रद्द करते हुए विदेश मंत्रालय को नए आरएफपी जारी करने का निर्देश दिया था।
न्यायिक समीक्षा का दायरा
गौरतलब है कि हाईकोर्ट ने अपने फैसले में यह भी रेखांकित किया था कि अदालतें सामान्यतः विशेषज्ञ निकायों के तकनीकी मूल्यांकन में हस्तक्षेप नहीं करतीं, परंतु जब निर्णय प्रक्रिया मनमानी, अपारदर्शी और संवैधानिक निष्पक्षता की कसौटी पर खरी न उतरे, तो न्यायिक समीक्षा अनिवार्य हो जाती है। यह ऐसे समय में आया है जब सरकारी टेंडर प्रक्रियाओं में पारदर्शिता को लेकर अदालतों की सक्रियता बढ़ रही है।
आगे क्या होगा
विदेश मंत्रालय को अब तीन महीने के भीतर नई टेंडर प्रक्रिया पूरी करनी होगी। अंतरिम अवधि में मौजूदा सेवा प्रदाता काम जारी रख सकते हैं, लेकिन यह व्यवस्था नई आरएफपी के नतीजे पर निर्भर रहेगी और इससे किसी भी पक्ष के अधिकारों पर कोई स्थायी प्रभाव नहीं पड़ेगा।