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सांसद जॉन ब्रिटास का जयशंकर को पत्र: SIR प्रक्रिया से पासपोर्ट नवीनीकरण रोकना असंवैधानिक

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सांसद जॉन ब्रिटास का जयशंकर को पत्र: SIR प्रक्रिया से पासपोर्ट नवीनीकरण रोकना असंवैधानिक

सारांश

राज्यसभा सांसद डॉ. जॉन ब्रिटास ने विदेश मंत्री जयशंकर को पत्र लिखकर एक अहम संवैधानिक सवाल उठाया है — क्या पश्चिम बंगाल की SIR प्रक्रिया में मतदाता सूची से नाम हटना, पासपोर्ट रिन्यूअल रोकने का आधार बन सकता है? पत्रकार राजगोपाल रामदास का मामला अब पासपोर्ट अधिनियम और संविधान के अनुच्छेद 21 की व्याख्या की कसौटी बन गया है।

मुख्य बातें

जॉन ब्रिटास ने विदेश मंत्री डॉ.
जयशंकर को पत्र लिखकर वरिष्ठ पत्रकार राजगोपाल रामदास के पासपोर्ट नवीनीकरण मामले में हस्तक्षेप की माँग की।
पश्चिम बंगाल की SIR (स्पेशल इंटेंसिव रिवीजन) प्रक्रिया के तहत मतदाता सूची से नाम हटने को पासपोर्ट रोकने का आधार बनाया गया, जिसे ब्रिटास ने कानूनी रूप से अमान्य बताया।
राजगोपाल रामदास को 2005 में पासपोर्ट मिला था और 2015 में उसका नवीनीकरण भी हुआ था; अब नवीनीकरण से इनकार किया गया।
सांसद ने पासपोर्ट अधिनियम, 1967 और संविधान के अनुच्छेद 21 तथा सर्वोच्च न्यायालय के सतवंत सिंह साहनी व मेनका गांधी फैसलों का हवाला दिया।
विदेश मंत्रालय से माँग की गई है कि SIR-संबंधी कार्यवाही को पासपोर्ट रिन्यूअल रोकने का स्वतः आधार न माना जाए।

राज्यसभा सदस्य डॉ. जॉन ब्रिटास ने विदेश मंत्री डॉ. एस. जयशंकर को एक विस्तृत ज्ञापन भेजकर वरिष्ठ पत्रकार राजगोपाल रामदास के पासपोर्ट नवीनीकरण से इनकार के मामले में तत्काल व्यक्तिगत हस्तक्षेप की माँग की है। उनका स्पष्ट तर्क है कि पश्चिम बंगाल में जारी स्पेशल इंटेंसिव रिवीजन (SIR) प्रक्रिया के तहत मतदाता सूची से नाम हटना, पासपोर्ट रिन्यूअल अवरुद्ध करने का स्वतः वैध आधार नहीं बन सकता। यह मामला संविधान के अनुच्छेद 21 के तहत विदेश यात्रा के मौलिक अधिकार और पासपोर्ट अधिनियम, 1967 की सीमाओं से जुड़े गंभीर कानूनी प्रश्न उठाता है।

मामले की पृष्ठभूमि

ज्ञापन के अनुसार, राजगोपाल रामदास को वर्ष 2005 में भारतीय पासपोर्ट जारी किया गया था और सभी निर्धारित कानूनी प्रक्रियाओं के बाद वर्ष 2015 में उसका नवीनीकरण भी सफलतापूर्वक किया गया था। डॉ. ब्रिटास ने प्रश्न उठाया कि केवल मतदाता सूची से नाम हटने के आधार पर पासपोर्ट रिन्यूअल से इनकार करना, मंत्रालय के अपने पूर्व निर्णयों पर ही अप्रत्यक्ष रूप से प्रश्नचिह्न नहीं लगाता? गौरतलब है कि संबंधित मामला अभी कानूनी चुनौती के अधीन है, जिससे यह विवाद और अधिक संवेदनशील हो जाता है।

कानूनी आधार पर उठाए गए सवाल

डॉ. ब्रिटास ने अपने पत्र में रेखांकित किया कि संसद ने मतदाता सूची से नाम हटने को पासपोर्ट अधिनियम, 1967 के तहत किसी नागरिक की अयोग्यता के रूप में कभी मान्यता नहीं दी है। उन्होंने यह भी पूछा कि क्या एक वैधानिक प्राधिकरण किसी अन्य कानून के तहत कार्यरत प्राधिकरण के निर्णय को आधार बनाकर अपने अधिकार क्षेत्र में फैसला ले सकता है। उनका तर्क है कि अलग-अलग कानूनी व्यवस्थाओं के तहत काम करने वाली संस्थाओं की प्रक्रियाएँ और अधिकार एक-दूसरे का विकल्प नहीं हो सकते।

सर्वोच्च न्यायालय के ऐतिहासिक निर्णयों का हवाला

सांसद ने सर्वोच्च न्यायालय के सतवंत सिंह साहनी और मेनका गांधी मामलों के ऐतिहासिक फैसलों का उल्लेख करते हुए कहा कि पासपोर्ट जारी करने या रोकने की शक्ति का प्रयोग केवल पासपोर्ट अधिनियम, 1967 के प्रावधानों के अंतर्गत ही किया जा सकता है। इसके अतिरिक्त, ऐसे सभी निर्णय संविधान में निहित निष्पक्षता, तर्कसंगतता और उचित प्रक्रिया के सिद्धांतों के अनुरूप होने चाहिए।

विदेश मंत्रालय से माँगे गए स्पष्ट दिशा-निर्देश

डॉ. ब्रिटास ने विदेश मंत्रालय से आग्रह किया है कि वह स्पष्ट दिशा-निर्देश जारी करे, जिनमें यह स्थापित किया जाए कि SIR प्रक्रिया के तहत मतदाता सूची से नाम हटना या उससे संबंधित कार्यवाही लंबित होना, अपने आप में पासपोर्ट नवीनीकरण रोकने का कानूनी आधार नहीं है। उन्होंने यह भी माँग की कि मामले की समीक्षा पासपोर्ट अधिनियम, 1967 के प्रावधानों के अनुसार की जाए और किसी अन्य कानूनी व्यवस्था के तहत दर्ज प्रशासनिक निष्कर्षों को स्वतंत्र कानूनी जाँच का विकल्प न बनाया जाए। उन्होंने कहा कि यह प्रश्न भारत सरकार द्वारा जारी आधिकारिक दस्तावेजों की विश्वसनीयता और नागरिकों के संस्थागत भरोसे से सीधे जुड़ा है। आने वाले दिनों में विदेश मंत्रालय की प्रतिक्रिया यह तय करेगी कि SIR जैसी चुनावी प्रक्रियाएँ नागरिकों के पासपोर्ट अधिकारों को किस हद तक प्रभावित कर सकती हैं।

संपादकीय दृष्टिकोण

और यदि उनके परिणाम पासपोर्ट जैसे संवैधानिक अधिकारों को प्रभावित करने लगें, तो यह न्यायिक समीक्षा का स्पष्ट विषय बनता है। विदेश मंत्रालय की चुप्पी या अस्पष्ट प्रतिक्रिया इस नज़ीर को और मज़बूत करेगी। असली सवाल यह है कि क्या मंत्रालय स्पष्ट नीतिगत दिशा-निर्देश जारी करने का साहस दिखाएगा, या इस मामले को व्यक्तिगत शिकायत के रूप में दबा देगा।
RashtraPress
29 जून 2026

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

डॉ. जॉन ब्रिटास ने विदेश मंत्री को पत्र क्यों लिखा?
डॉ. जॉन ब्रिटास ने विदेश मंत्री डॉ. एस. जयशंकर को पत्र लिखकर वरिष्ठ पत्रकार राजगोपाल रामदास के पासपोर्ट नवीनीकरण से इनकार के मामले में हस्तक्षेप की माँग की। उनका तर्क है कि पश्चिम बंगाल की SIR प्रक्रिया में मतदाता सूची से नाम हटना, पासपोर्ट अधिनियम, 1967 के तहत पासपोर्ट रोकने का वैध आधार नहीं है।
SIR प्रक्रिया क्या है और इसका पासपोर्ट से क्या संबंध है?
SIR यानी स्पेशल इंटेंसिव रिवीजन, एक चुनावी प्रक्रिया है जिसके तहत मतदाता सूची की गहन समीक्षा की जाती है और कुछ नाम हटाए जा सकते हैं। इस मामले में आरोप है कि SIR के तहत मतदाता सूची से नाम हटने को पासपोर्ट नवीनीकरण अस्वीकार करने का आधार बनाया गया, जिसे सांसद ब्रिटास कानूनी रूप से अमान्य मानते हैं।
राजगोपाल रामदास कौन हैं और उनके पासपोर्ट का मामला क्या है?
राजगोपाल रामदास एक वरिष्ठ पत्रकार हैं, जिन्हें 2005 में भारतीय पासपोर्ट जारी किया गया था और 2015 में उसका नवीनीकरण भी हुआ था। अब उनके पासपोर्ट के नवीनीकरण से इनकार किया गया है, कथित तौर पर SIR प्रक्रिया के तहत मतदाता सूची से नाम हटने के आधार पर।
पासपोर्ट अधिनियम, 1967 और अनुच्छेद 21 इस मामले में कैसे प्रासंगिक हैं?
पासपोर्ट अधिनियम, 1967 पासपोर्ट जारी करने या रोकने के आधार निर्धारित करता है, और संविधान का अनुच्छेद 21 विदेश यात्रा को जीवन और स्वतंत्रता के अधिकार का हिस्सा मानता है। सर्वोच्च न्यायालय के सतवंत सिंह साहनी और मेनका गांधी मामलों में यह स्थापित हो चुका है कि पासपोर्ट केवल अधिनियम के प्रावधानों और उचित प्रक्रिया के आधार पर ही रोका जा सकता है।
इस मामले में विदेश मंत्रालय से क्या माँगा गया है?
डॉ. ब्रिटास ने विदेश मंत्रालय से स्पष्ट दिशा-निर्देश जारी करने की माँग की है कि SIR प्रक्रिया के तहत मतदाता सूची से नाम हटना या संबंधित कार्यवाही लंबित होना, पासपोर्ट नवीनीकरण रोकने का स्वतः कानूनी आधार नहीं माना जाए। साथ ही, मामले की समीक्षा केवल पासपोर्ट अधिनियम, 1967 के प्रावधानों के अनुसार करने का आग्रह किया गया है।
राष्ट्र प्रेस
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