24 जुलाई 2026
LIVE
Get it on Google Play Download on the App Store

पासपोर्ट नागरिकता विवाद: जॉन ब्रिटास ने केंद्र सरकार के 'विरोधाभासी रुख' पर उठाए सवाल

शेयर करें:
ऑडियो वॉइस लोड हो रही है…
पासपोर्ट नागरिकता विवाद: जॉन ब्रिटास ने केंद्र सरकार के 'विरोधाभासी रुख' पर उठाए सवाल

सारांश

राज्यसभा सदस्य डॉ. जॉन ब्रिटास ने सरकार को उसी के संसदीय जवाब से घेरा — अगर 'नेशनलिटी' शब्द केवल ICAO मानकों के लिए बदला गया और कानूनी स्थिति अपरिवर्तित रही, तो पश्चिम बंगाल SIR के आधार पर एक वरिष्ठ पत्रकार का पासपोर्ट नवीनीकरण रोकना पासपोर्ट अधिनियम, 1967 का उल्लंघन है।

मुख्य बातें

जॉन ब्रिटास (राज्यसभा सदस्य) ने 24 जुलाई को केंद्र सरकार पर पासपोर्ट-नागरिकता मुद्दे पर विरोधाभासी रुख अपनाने का आरोप लगाया।
सरकार ने संसद में माना कि पासपोर्ट पर 'सिटीजन ऑफ इंडिया' से 'नेशनलिटी' शब्द में बदलाव केवल ICAO मानकों के अनुरूप था, कानूनी स्थिति अपरिवर्तित रही।
सरकार ने यह भी स्वीकार किया कि पासपोर्ट पासपोर्ट अधिनियम, 1967 के तहत जारी और नवीनीकृत होते हैं, न कि मतदाता सूची संशोधन के आधार पर।
वरिष्ठ पत्रकार और 'द टेलीग्राफ' के पूर्व संपादक राजगोपाल रामदास का पासपोर्ट नवीनीकरण पश्चिम बंगाल SIR के दौरान मतदाता सूची से नाम हटाए जाने के आधार पर प्रारंभिक तौर पर रोका गया था।
ब्रिटास ने सरकार से माँग की कि सभी पासपोर्ट कार्यालयों में पासपोर्ट अधिनियम की प्रधानता सुनिश्चित की जाए।

राज्यसभा सदस्य डॉ. जॉन ब्रिटास ने 24 जुलाई को आरोप लगाया कि भारतीय पासपोर्ट और नागरिकता के प्रश्न पर केंद्र सरकार का रुख परस्पर विरोधाभासी है। उनके अनुसार, संसद में दिए गए सरकारी जवाब से यह स्पष्ट होता है कि पासपोर्ट की कानूनी हैसियत में कोई बदलाव नहीं आया — केवल अंतरराष्ट्रीय मानकों के अनुरूप शब्दावली बदली गई है।

संसद में सरकार का जवाब और विवाद का केंद्र

डॉ. ब्रिटास ने राज्यसभा में 'भारतीय पासपोर्ट द्वारा नागरिकता की मान्यता' से जुड़े प्रश्न के उत्तर का हवाला दिया। उन्होंने बताया कि सरकार ने स्वीकार किया कि पुराने भारतीय पासपोर्ट पर 'सिटीजन ऑफ इंडिया' (भारत का नागरिक) स्पष्ट रूप से अंकित होता था। सरकार ने यह भी माना कि आईसीएओ (ICAO) के मशीन-पठनीय पासपोर्ट मानकों को अपनाने के बाद अंतरराष्ट्रीय प्रारूप के अनुरूप 'नेशनलिटी' शब्द का उपयोग शुरू किया गया।

ब्रिटास का तर्क है कि यह जवाब स्वयं स्वीकार करता है कि बदलाव केवल शाब्दिक था, न कि कानूनी। ऐसे में यह कहना कि भारतीय पासपोर्ट नागरिकता का प्रमाण नहीं है, सरकार के अपने ही स्पष्टीकरण से मेल नहीं खाता।

पासपोर्ट अधिनियम और मतदाता सूची का टकराव

डॉ. ब्रिटास ने सरकार से यह भी पूछा था कि क्या मतदाता सूची से नाम हटाए जाने या किसी अन्य प्रशासनिक कार्रवाई के आधार पर किसी मौजूदा पासपोर्ट धारक की नागरिकता पर सवाल उठाया जा सकता है अथवा उसका पासपोर्ट नवीनीकरण रोका जा सकता है। सरकार ने उत्तर दिया कि पासपोर्ट पासपोर्ट अधिनियम, 1967 और उसके तहत बनाए गए नियमों के अनुसार ही जारी और नवीनीकृत किए जाते हैं।

ब्रिटास के अनुसार, इसका स्पष्ट कानूनी अर्थ है कि पासपोर्ट प्रशासन केवल पासपोर्ट अधिनियम, 1967 के प्रावधानों से संचालित होता है — न कि मतदाता सूची संशोधन या किसी अन्य प्रशासनिक प्रक्रिया से।

राजगोपाल रामदास का मामला: आरोप और संदर्भ

डॉ. ब्रिटास ने एक ठोस उदाहरण का हवाला दिया। उनके अनुसार, पश्चिम बंगाल में स्पेशल इंटेंसिव रिवीजन (SIR) के दौरान मतदाता सूची से नाम हटाए जाने के आधार पर वरिष्ठ पत्रकार और 'द टेलीग्राफ' के पूर्व संपादक राजगोपाल रामदास का पासपोर्ट नवीनीकरण प्रारंभिक तौर पर रोक दिया गया था। ब्रिटास का कहना है कि यह कार्रवाई सरकार के संसद में दिए गए जवाब के सीधे विपरीत है।

गौरतलब है कि यह ऐसे समय में सामने आया है जब SIR प्रक्रिया को लेकर पहले से ही विपक्षी दलों और नागरिक समाज में व्यापक बहस चल रही है।

ब्रिटास की माँगें

डॉ. ब्रिटास ने केंद्र सरकार से तीन स्पष्ट जवाब माँगे हैं। पहला — मतदाता सूची से जुड़े एक प्रशासनिक अभ्यास को पासपोर्ट अधिनियम से ऊपर किस आधार पर माना गया। दूसरा — यह निर्णय किस अधिकार के तहत लिया गया। तीसरा — यह सुनिश्चित किया जाए कि भविष्य में कोई भी नागरिक इस प्रकार पासपोर्ट सेवाओं से वंचित न हो।

उन्होंने कहा कि संसद में दिए गए सरकारी जवाब का पालन केवल संसद की दीवारों तक सीमित नहीं रहना चाहिए, बल्कि देश के सभी पासपोर्ट कार्यालयों में समान रूप से सुनिश्चित किया जाना चाहिए। यह मामला नागरिकता के अधिकार और प्रशासनिक पारदर्शिता की व्यापक बहस से जुड़ा है, जो आने वाले समय में और तेज़ होने की संभावना है।

संपादकीय दृष्टिकोण

वह महज़ एक सांसद की आलोचना नहीं — यह सरकार को उसी के संसदीय रिकॉर्ड से कठघरे में खड़ा करने की कोशिश है। विरोधाभास वास्तविक है: यदि 'नेशनलिटी' शब्द केवल तकनीकी अनुकूलन था और कानूनी स्थिति अपरिवर्तित रही, तो SIR जैसी प्रशासनिक प्रक्रिया को पासपोर्ट अधिनियम, 1967 पर वरीयता देना न केवल असंगत है, बल्कि संभावित रूप से नागरिकों के मौलिक अधिकारों पर भी असर डालता है। राजगोपाल रामदास का मामला एक अपवाद हो सकता है, लेकिन यह एक खतरनाक मिसाल भी बनाता है — जहाँ मतदाता सूची की प्रशासनिक गलती किसी नागरिक की पासपोर्ट सेवाओं तक पहुँच को बाधित कर सकती है। सरकार को स्पष्ट करना होगा कि किस कानूनी आधार पर ऐसे निर्णय लिए जाते हैं।
RashtraPress
24 जुलाई 2026

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

डॉ. जॉन ब्रिटास ने केंद्र सरकार पर क्या आरोप लगाया है?
डॉ. जॉन ब्रिटास ने आरोप लगाया है कि केंद्र सरकार पासपोर्ट और नागरिकता के मुद्दे पर विरोधाभासी रुख अपना रही है। एक ओर संसद में सरकार ने माना कि पासपोर्ट की कानूनी हैसियत नहीं बदली, दूसरी ओर व्यवहार में मतदाता सूची से नाम हटाए जाने के आधार पर पासपोर्ट नवीनीकरण रोका जा रहा है।
भारतीय पासपोर्ट पर 'सिटीजन ऑफ इंडिया' से 'नेशनलिटी' शब्द क्यों बदला गया?
सरकार ने संसद में बताया कि यह बदलाव ICAO (अंतरराष्ट्रीय नागरिक उड्डयन संगठन) के मशीन-पठनीय पासपोर्ट मानकों को अपनाने के कारण किया गया। सरकार के अनुसार, यह केवल अंतरराष्ट्रीय प्रारूप के अनुरूप शाब्दिक बदलाव था और पासपोर्ट की कानूनी स्थिति में कोई परिवर्तन नहीं हुआ।
राजगोपाल रामदास का पासपोर्ट नवीनीकरण क्यों रोका गया था?
वरिष्ठ पत्रकार और 'द टेलीग्राफ' के पूर्व संपादक राजगोपाल रामदास का पासपोर्ट नवीनीकरण पश्चिम बंगाल में स्पेशल इंटेंसिव रिवीजन (SIR) के दौरान मतदाता सूची से उनका नाम हटाए जाने के आधार पर प्रारंभिक तौर पर रोका गया था। डॉ. ब्रिटास का कहना है कि यह कार्रवाई सरकार के संसदीय जवाब के विपरीत है।
पासपोर्ट अधिनियम, 1967 के अनुसार पासपोर्ट नवीनीकरण कैसे होता है?
पासपोर्ट अधिनियम, 1967 के तहत पासपोर्ट जारी करना और नवीनीकरण केवल उसी अधिनियम के प्रावधानों से संचालित होता है। सरकार ने संसद में स्पष्ट किया है कि मतदाता सूची संशोधन या अन्य प्रशासनिक कार्रवाई पासपोर्ट प्रक्रिया को प्रभावित नहीं कर सकती।
डॉ. ब्रिटास ने सरकार से क्या माँगें रखी हैं?
डॉ. ब्रिटास ने तीन माँगें रखी हैं: पहली — स्पष्ट किया जाए कि किस कानूनी आधार पर SIR प्रक्रिया को पासपोर्ट अधिनियम से ऊपर माना गया; दूसरी — यह बताया जाए कि यह निर्णय किस अधिकार के तहत लिया गया; तीसरी — सभी पासपोर्ट कार्यालयों में यह सुनिश्चित किया जाए कि कोई भी नागरिक इस प्रकार पासपोर्ट सेवाओं से वंचित न हो।
राष्ट्र प्रेस
सिलसिला

जुड़े बिंदु

इस ख़बर के पीछे की कड़ियाँ — सबसे नई पहले।

8 बिंदु
  1. नवीनतम 1 सप्ताह पहले
  2. 3 सप्ताह पहले
  3. 4 सप्ताह पहले
  4. 4 सप्ताह पहले
  5. 4 सप्ताह पहले
  6. 4 सप्ताह पहले
  7. 4 सप्ताह पहले
  8. 4 सप्ताह पहले