फॉर्म-6 में गैरकानूनी बदलाव पर जॉन ब्रिटास ने मुख्य चुनाव आयुक्त को लिखा पत्र, वापसी की माँग
सारांश
मुख्य बातें
राज्यसभा सांसद डॉ. जॉन ब्रिटास ने 13 जुलाई 2026 को मुख्य चुनाव आयुक्त को पत्र लिखकर मतदाता पंजीकरण के लिए उपयोग किए जाने वाले ऑनलाइन फॉर्म-6 में जोड़ी गई नई अनिवार्य घोषणा की वैधता पर गंभीर सवाल उठाए हैं। उनका आरोप है कि चुनाव आयोग ने बिना किसी कानूनी संशोधन या राजपत्र अधिसूचना के यह बदलाव लागू किया है, जो पंजीकरण नियम, 1960 का उल्लंघन है।
क्या है नई अनिवार्य शर्त
ईसीआईनेट पोर्टल के माध्यम से मतदाता पंजीकरण करने वाले आवेदकों से अब यह घोषित करना अनिवार्य कर दिया गया है कि वे स्वयं, उनके माता-पिता अथवा दादा-दादी पिछली विशेष गहन पुनरीक्षण में मतदाता सूची में शामिल थे या नहीं। इसके साथ ही पुराने चुनावी रिकॉर्ड से संबंधित जानकारी भी अनिवार्य रूप से माँगी जा रही है।
डॉ. ब्रिटास का कहना है कि यह बदलाव किसी प्रशासनिक निर्देश या सॉफ्टवेयर अपडेट के ज़रिए नहीं किया जा सकता। उन्होंने स्पष्ट कहा, 'पोर्टल राजपत्र नहीं होता और सॉफ्टवेयर कोड कानून नहीं होता।'
कानूनी प्रक्रिया की अनदेखी का आरोप
सांसद ने तर्क दिया कि वैधानिक फॉर्म-6 में किसी भी बदलाव के लिए पंजीकरण नियम, 1960 में विधिवत संशोधन और कानून मंत्रालय की ओर से राजपत्र अधिसूचना जारी होना आवश्यक है। उनके अनुसार, यदि इस प्रकार के बदलावों को अनुमति दी गई, तो भविष्य में मतदाता पंजीकरण से जुड़े किसी भी कानूनी प्रावधान को संसदीय निगरानी के बिना बदला जा सकता है — जो लोकतांत्रिक प्रक्रिया के लिए एक खतरनाक मिसाल होगी।
किन नागरिकों पर पड़ेगा असर
डॉ. ब्रिटास ने बताया कि यह नई अनिवार्य शर्त विशेष रूप से पहली बार मतदान करने वाले युवाओं, प्रवासियों, गोद लिए गए बच्चों, अनाथों और उन नागरिकों के लिए बाधा बन सकती है, जिनके पास माता-पिता या दादा-दादी के पुराने चुनावी रिकॉर्ड उपलब्ध नहीं हैं। यह ऐसे समय में आया है जब देशभर में मतदाता सूची की शुद्धता को लेकर पहले से ही बहस जारी है।
संवैधानिक अधिकार पर खतरे की चेतावनी
सांसद ने यह भी रेखांकित किया कि संविधान में प्रदत्त सार्वभौमिक वयस्क मताधिकार को ऐसी तकनीकी बाधाओं के कारण प्रभावित नहीं किया जाना चाहिए, जिनका कोई वैधानिक आधार नहीं है। उनका कहना है कि किसी भी पात्र नागरिक का नाम मतदाता सूची में दर्ज होने की प्रक्रिया ऐसी शर्तों से नहीं रोकी जानी चाहिए जो कानून की कसौटी पर खरी नहीं उतरतीं।
माँग और आगे की राह
डॉ. ब्रिटास ने चुनाव आयोग से माँग की है कि ऑनलाइन फॉर्म-6 में जोड़ी गई इस अनिवार्य घोषणा को तुरंत वापस लिया जाए। चुनाव आयोग की ओर से अभी तक इस पत्र पर कोई आधिकारिक प्रतिक्रिया सामने नहीं आई है। यह मामला अब संसदीय बहस और न्यायिक समीक्षा की दिशा में जा सकता है।