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एफसीआरए संशोधन नियम 2026 वापस लो: जॉन ब्रिटास ने गृह मंत्री अमित शाह को लिखा विस्तृत पत्र

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एफसीआरए संशोधन नियम 2026 वापस लो: जॉन ब्रिटास ने गृह मंत्री अमित शाह को लिखा विस्तृत पत्र

सारांश

राज्यसभा सांसद डॉ. जॉन ब्रिटास ने गृह मंत्री अमित शाह को पत्र लिखकर एफसीआरए संशोधन नियम 2026 को तत्काल वापस लेने की माँग की है। उनका कहना है कि ये नियम नागरिक समाज की स्वायत्तता को कुचलते हैं और संविधान के कई मौलिक अधिकारों से सीधे टकराते हैं।

मुख्य बातें

जॉन ब्रिटास ने 25 जून 2026 को गृह मंत्री अमित शाह को पत्र लिखकर एफसीआरए संशोधन नियम 2026 वापस लेने की माँग की।
नियमों को एफसीआरए, 2010 लागू होने के बाद से स्वैच्छिक संगठनों पर सबसे व्यापक सरकारी हस्तक्षेप बताया गया।
' धर्मांतरण प्रचार ' शब्द की अस्पष्ट परिभाषा को लेकर आपत्ति; अनुच्छेद 25 के तहत धार्मिक स्वतंत्रता पर खतरे की चेतावनी।
नियमों में वेबसाइट, सोशल मीडिया और संस्थागत संचार की अनिवार्य जानकारी को व्यापक निगरानी तंत्र करार दिया।
संविधान के अनुच्छेद 14, 19(1)(c), 25, 26, 29 और 30 से जुड़े संवैधानिक सवाल उठाए गए।
केंद्र सरकार से नियम वापस लेने और व्यापक परामर्श प्रक्रिया शुरू करने का आग्रह।

राज्यसभा सांसद डॉ. जॉन ब्रिटास ने 25 जून 2026 को केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह को पत्र लिखकर विदेशी अंशदान (विनियमन) संशोधन नियम, 2026 को तत्काल वापस लेने की माँग की है। उन्होंने इन नियमों को एफसीआरए, 2010 के लागू होने के बाद से देश के स्वैच्छिक और सामाजिक संगठनों के कामकाज में सबसे व्यापक सरकारी हस्तक्षेप बताया है।

नियमों की प्रकृति पर आपत्ति

डॉ. ब्रिटास ने अपने विस्तृत पत्र में स्पष्ट किया कि ये संशोधन केवल विदेशी चंदे की निगरानी तक सीमित नहीं हैं, बल्कि स्वैच्छिक संगठनों के समग्र कामकाज को नियंत्रित करने का प्रयास करते हैं। उनके अनुसार, ये नियम एफसीआरए की मूल संरचना को बदल देते हैं और सरकार को व्यापक विवेकाधिकार, व्यक्तिगत जवाबदेही का विस्तार, संगठनों की कार्यगत स्वतंत्रता पर प्रतिबंध तथा कड़ी अनुपालन एवं निगरानी व्यवस्था स्थापित करने का अधिकार देते हैं।

सांसद ने तर्क दिया कि इस तरह के प्रावधान नागरिक समाज की स्वायत्तता के लिए गंभीर खतरा पैदा करते हैं और सरकार की जवाबदेही पर नज़र रखने वाले संगठनों को कमज़ोर कर सकते हैं।

'धर्मांतरण प्रचार' शब्द पर संवैधानिक सवाल

पत्र में डॉ. ब्रिटास ने नियमों में शामिल 'धर्मांतरण प्रचार' पद पर कड़ी आपत्ति दर्ज कराई है। उनका कहना है कि इस शब्द की कोई स्पष्ट कानूनी परिभाषा नहीं दी गई है, जिससे इसकी व्याख्या पूरी तरह सरकारी अधिकारियों के विवेक पर निर्भर हो जाएगी।

उन्होंने आशंका जताई कि इससे मनमाने या चुनिंदा तरीके से कार्रवाई का खतरा बढ़ेगा और यह प्रावधान संविधान के अनुच्छेद 25 के तहत प्राप्त धार्मिक स्वतंत्रता के मौलिक अधिकार को प्रत्यक्ष रूप से प्रभावित कर सकता है।

निगरानी तंत्र पर चिंता

डॉ. ब्रिटास ने नए नियमों में प्रकाशनों, लेखों, आधिकारिक वेबसाइटों, सोशल मीडिया खातों और संस्थागत संचार से जुड़ी व्यापक जानकारी देने की अनिवार्यता को लेकर भी गहरी चिंता व्यक्त की। उनके अनुसार, यह व्यवस्था वित्तीय जवाबदेही की सीमा से आगे जाकर एक व्यापक निगरानी तंत्र का रूप ले सकती है।

गौरतलब है कि यह ऐसे समय में आया है जब देश में नागरिक समाज संगठनों पर एफसीआरए के तहत कार्रवाइयाँ पहले से ही विवादास्पद रही हैं और कई प्रमुख संस्थाओं के पंजीकरण रद्द किए जा चुके हैं।

संवैधानिक अधिकारों से टकराव का आरोप

पत्र में स्पष्ट रूप से कहा गया है कि ये संशोधन संविधान के अनुच्छेद 14 (समानता का अधिकार), अनुच्छेद 19(1)(c) (संगठन बनाने का अधिकार), अनुच्छेद 25 और 26 (धार्मिक स्वतंत्रता), तथा अनुच्छेद 29 और 30 (अल्पसंख्यक अधिकार) के तहत प्रदत्त मौलिक अधिकारों से जुड़े गंभीर संवैधानिक प्रश्न खड़े करते हैं।

माँग और आगे का रास्ता

डॉ. ब्रिटास ने इन संशोधनों को नागरिक समाज पर बढ़ते सरकारी नियंत्रण की व्यापक प्रवृत्ति का हिस्सा बताते हुए केंद्र सरकार से नियमों को तुरंत वापस लेने की माँग की है। साथ ही उन्होंने सभी हितधारकों — विशेषकर स्वैच्छिक संगठनों और नागरिक समाज — के साथ व्यापक परामर्श प्रक्रिया शुरू करने का आग्रह किया है। अब यह देखना होगा कि गृह मंत्रालय इस पत्र पर क्या रुख अपनाता है।

संपादकीय दृष्टिकोण

जो न्यायिक समीक्षा के लिए भी चुनौतीपूर्ण है। यह ऐसे समय में आया है जब पिछले कुछ वर्षों में एफसीआरए के तहत सैकड़ों संगठनों के पंजीकरण रद्द हो चुके हैं और नागरिक समाज पहले से ही दबाव में है। मुख्यधारा की कवरेज अक्सर इस बात को नज़रअंदाज़ करती है कि सोशल मीडिया और संस्थागत संचार पर निगरानी की अनिवार्यता वित्तीय पारदर्शिता से कहीं आगे जाती है। बिना स्पष्ट परिभाषाओं और स्वतंत्र अपील तंत्र के, ये नियम चुनिंदा प्रवर्तन का जोखिम उठाते हैं।
RashtraPress
10 अगस्त 2026

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

एफसीआरए संशोधन नियम 2026 क्या हैं और इन पर विवाद क्यों है?
विदेशी अंशदान (विनियमन) संशोधन नियम, 2026 केंद्र सरकार द्वारा एफसीआरए, 2010 के तहत लाए गए नए प्रावधान हैं जो स्वैच्छिक और सामाजिक संगठनों पर व्यापक अनुपालन, निगरानी और जवाबदेही की शर्तें लगाते हैं। आलोचकों का कहना है कि ये नियम विदेशी चंदे की निगरानी की सीमा से आगे जाकर नागरिक समाज की स्वायत्तता को कमज़ोर करते हैं।
डॉ. जॉन ब्रिटास ने 'धर्मांतरण प्रचार' शब्द पर आपत्ति क्यों जताई?
डॉ. ब्रिटास के अनुसार, नियमों में शामिल 'धर्मांतरण प्रचार' पद की कोई स्पष्ट कानूनी परिभाषा नहीं दी गई है, जिससे इसकी व्याख्या सरकारी अधिकारियों के विवेक पर छोड़ दी गई है। उनका कहना है कि यह संविधान के अनुच्छेद 25 के तहत धार्मिक स्वतंत्रता के मौलिक अधिकार को प्रभावित कर सकता है।
इन नियमों से किन संवैधानिक अधिकारों पर असर पड़ सकता है?
पत्र के अनुसार, ये संशोधन संविधान के अनुच्छेद 14 (समानता), 19(1)(c) (संगठन बनाने का अधिकार), 25 और 26 (धार्मिक स्वतंत्रता), तथा 29 और 30 (अल्पसंख्यक अधिकार) के तहत प्रदत्त मौलिक अधिकारों से जुड़े गंभीर संवैधानिक प्रश्न खड़े करते हैं।
नए एफसीआरए नियमों में सोशल मीडिया और वेबसाइट से जुड़े प्रावधान क्या हैं?
नए नियमों में संगठनों को अपने प्रकाशनों, लेखों, आधिकारिक वेबसाइटों, सोशल मीडिया खातों और संस्थागत संचार की व्यापक जानकारी देना अनिवार्य किया गया है। डॉ. ब्रिटास ने इसे वित्तीय जवाबदेही से परे एक व्यापक निगरानी तंत्र करार दिया है।
डॉ. ब्रिटास ने केंद्र सरकार से क्या माँग की है?
उन्होंने केंद्र सरकार से एफसीआरए संशोधन नियम 2026 को तुरंत वापस लेने और सभी हितधारकों — विशेषकर स्वैच्छिक संगठनों व नागरिक समाज — के साथ व्यापक परामर्श प्रक्रिया शुरू करने का आग्रह किया है।
राष्ट्र प्रेस
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