एफसीआरए संशोधन बिल 2026 पर भारत का जवाब: कानूनी NGO बंद नहीं होंगे, पारदर्शिता बढ़ेगी
सारांश
मुख्य बातें
अमेरिका में भारत के राजदूत विनय मोहन क्वात्रा ने 10 अगस्त 2026 को प्रस्तावित फॉरेन कंट्रीब्यूशन (रेगुलेशन) अमेंडमेंट बिल 2026 (एफसीआरए) को लेकर फैल रही गलतफहमियों को सार्वजनिक रूप से खारिज किया। उन्होंने स्पष्ट किया कि यह विधेयक विदेशी फंडिंग की निगरानी को सुदृढ़ करने के लिए है, न कि कानून का पालन करने वाले नागरिक संगठनों के कामकाज पर रोक लगाने के लिए।
राजदूत का स्पष्टीकरण
राजदूत क्वात्रा ने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म एक्स पर पोस्ट करते हुए कहा, 'मीडिया और सिविल सोसायटी में एफसीआरए संशोधन विधेयक 2026 को लेकर कई तरह की गलतफहमियाँ हैं।' उन्होंने इस धारणा को निराधार बताया कि भारत कोई ऐसा नया कानून ला रहा है जिसका उद्देश्य नागरिक संगठनों को मिलने वाली विदेशी सहायता रोकना है।
क्वात्रा ने तर्क दिया कि सार्वजनिक और राजनीतिक क्षेत्रों में विदेशी धन के प्रवाह को नियंत्रित करना किसी भी देश का संप्रभु अधिकार है और यह राष्ट्रीय सुरक्षा से जुड़ी चिंताओं के आधार पर किया जाता है। उन्होंने कहा कि दुनिया के कई लोकतांत्रिक देशों में इस तरह का नियमन आधुनिक शासन व्यवस्था का सामान्य हिस्सा है।
एफसीआरए का ऐतिहासिक संदर्भ
राजदूत ने बताया कि भारत ने पहला एफसीआरए कानून 1976 में लागू किया था। इसके बाद 2010 में इसे अधिक आधुनिक रूप दिया गया और 2016, 2018 तथा 2020 में इसमें और सुधार किए गए। उन्होंने कहा कि '2026 का विधेयक और उससे जुड़े नियम उसी दिशा में अगला कदम हैं — इसका उद्देश्य ज़्यादा पारदर्शिता, बेहतर प्रशासन और स्पष्ट नियम सुनिश्चित करना है।'
यह ऐसे समय में आया है जब अंतरराष्ट्रीय स्तर पर विदेशी फंडिंग को लेकर कई लोकतांत्रिक देश अपने कानूनों को कड़ा कर रहे हैं। गौरतलब है कि भारत में इस कानून की हर संशोधन यात्रा पर वैश्विक मानवाधिकार संगठनों की नज़र रही है।
NGO और विदेशी फंडिंग की वास्तविक स्थिति
क्वात्रा ने आँकड़ों के साथ स्पष्ट किया कि पंजीकृत संगठनों को मिलने वाला विदेशी योगदान 2010-11 में लगभग 1.2 अरब डॉलर था, जो बढ़कर 2024-25 में 2.67 अरब डॉलर हो गया। उन्होंने बताया कि भारत में 30 लाख से अधिक NGO हैं, लेकिन इनमें से केवल 14,450 संगठनों के पास एफसीआरए पंजीकरण है — यानी अधिकांश नागरिक संगठन इस कानून के दायरे में ही नहीं आते।
राजदूत ने कहा, 'एफसीआरए किसी को भी विदेशी दान, शोध अनुदान या मानवीय सहायता लेने से नहीं रोकता। यह केवल तीन बातें कहता है — पंजीकरण कराइए, तय प्रक्रिया के अनुसार पैसा प्राप्त कीजिए और बताइए कि उस पैसे का इस्तेमाल कैसे किया गया।'
संपत्ति जब्ती और धार्मिक संस्थाओं की सुरक्षा
उन चिंताओं का भी जवाब दिया गया जिनमें कहा गया था कि संशोधन के कारण NGO, धार्मिक संस्थाओं, पूजा स्थलों, अस्पतालों और स्कूलों की संपत्तियाँ जब्त की जा सकती हैं। क्वात्रा ने स्पष्ट किया कि जब किसी संस्था का पंजीकरण रद्द होता है या वह स्वयं पंजीकरण छोड़ देती है, तो विदेशी चंदे से बनाई गई संपत्तियाँ और बची हुई राशि राज्य सरकार द्वारा नामित प्राधिकरण के पास जाती हैं — और यह व्यवस्था 2010 से लागू है।
उन्होंने बताया कि 2026 का विधेयक केवल इतना नया जोड़ता है कि इन संपत्तियों की सुरक्षा के लिए एक निर्धारित प्राधिकरण होगा और संगठन के लिए वापसी का रास्ता भी रहेगा। यदि कोई संगठन दोबारा पंजीकरण बहाल करा लेता है, तो उसकी सभी संपत्तियाँ और बची हुई राशि पूरी तरह उसे लौटा दी जाएंगी। पूजा स्थलों से जुड़ी संपत्तियाँ उसी धर्म के किसी अन्य एफसीआरए-पंजीकृत संगठन को सौंपी जाएंगी ताकि धार्मिक गतिविधियाँ बाधित न हों।
धर्म-तटस्थता का दावा
क्वात्रा ने इस आरोप को सिरे से खारिज किया कि यह कानून किसी खास धर्म या समुदाय को निशाना बनाता है। उन्होंने कहा, 'इससे ज़्यादा गलत बात और कुछ नहीं हो सकती। यह कानून धर्म, समुदाय या विचारधारा की परवाह किए बिना सभी संगठनों पर समान रूप से लागू होता है।' सभी धर्मों के संगठनों द्वारा चलाए जाने वाले कल्याण कार्य, धार्मिक शिक्षा, पूजा स्थलों का रखरखाव और चैरिटी से जुड़े काम विदेशी फंडिंग पाने के लिए पहले की तरह पात्र बने रहेंगे।
अब यह देखना होगा कि संसद में इस विधेयक पर बहस के दौरान विपक्ष और नागरिक समाज की ओर से उठाई जाने वाली आपत्तियों का सरकार किस तरह सामना करती है।