पासपोर्ट नागरिकता का अंतिम प्रमाण नहीं: विदेश मंत्रालय ने पासपोर्ट अधिनियम 1967 और बॉम्बे HC फैसले का दिया हवाला
सारांश
मुख्य बातें
विदेश मंत्रालय ने 25 जून 2026 को स्पष्ट किया कि भारतीय पासपोर्ट को भारतीय कानून में कभी भी नागरिकता का अंतिम और निर्विवाद प्रमाण नहीं माना गया है। मंत्रालय के अनुसार यह कोई नई नीतिगत घोषणा नहीं, बल्कि पासपोर्ट अधिनियम, 1967 के लागू होने के समय से चली आ रही स्थापित कानूनी स्थिति है।
विवाद की पृष्ठभूमि
यह विवाद बुधवार, 24 जून को पासपोर्ट सेवा दिवस के एक कार्यक्रम में विदेश मंत्रालय के एक वरिष्ठ अधिकारी की टिप्पणी के बाद उठा, जिन्होंने कहा था कि पासपोर्ट को मुख्यतः एक यात्रा दस्तावेज के रूप में देखा जाना चाहिए। इस बयान के बाद विपक्षी नेताओं, वकीलों और सामाजिक टिप्पणीकारों ने सवाल उठाए कि जब सरकार स्वयं जाँच-पड़ताल के बाद पासपोर्ट जारी करती है, तो वह नागरिकता का प्रमाण कैसे नहीं हो सकता।
विवाद गहराने पर मंत्रालय ने गुरुवार को औपचारिक स्पष्टीकरण जारी किया। मंत्रालय ने कहा, 'यह फैसला कल नहीं लिया गया कि पासपोर्ट नागरिकता का प्रमाण नहीं है। यह पिछले 12 वर्षों में भी तय नहीं हुआ। पासपोर्ट कभी भी नागरिकता का अंतिम प्रमाण नहीं रहा है।'
कानूनी आधार: पासपोर्ट अधिनियम और न्यायिक फैसले
पासपोर्ट अधिनियम, 1967 की धारा 20 केंद्र सरकार को सार्वजनिक हित में किसी गैर-नागरिक को भी पासपोर्ट या यात्रा दस्तावेज जारी करने का अधिकार देती है। मंत्रालय ने स्पष्ट किया कि हालाँकि सामान्य परिस्थितियों में पासपोर्ट केवल भारतीय नागरिकों को जारी किया जाता है, लेकिन कुछ विशेष परिस्थितियों में यह प्रावधान अपवाद की अनुमति देता है।
मंत्रालय ने बॉम्बे उच्च न्यायालय के 2013 के फैसले का भी संदर्भ दिया, जिसमें अदालत ने कहा था कि केवल पासपोर्ट का होना स्वतः भारतीय नागरिकता साबित नहीं करता। अदालत के अनुसार नागरिकता का निर्धारण संसद द्वारा पारित नागरिकता अधिनियम, 1955 के प्रावधानों के अनुसार ही किया जाएगा।
सर्वोच्च न्यायालय भी विभिन्न मामलों में पहचान संबंधी दस्तावेजों और नागरिकता के कानूनी प्रमाण के बीच स्पष्ट अंतर रेखा खींच चुका है। शीर्ष अदालत ने माना है कि आधार कार्ड जैसे दस्तावेज पहचान स्थापित कर सकते हैं, किंतु वे अपने आप में नागरिकता का निर्धारण नहीं करते।
नागरिकता साबित करने के लिए क्या चाहिए
कई न्यायिक फैसलों के अनुसार यदि किसी व्यक्ति की नागरिकता पर विवाद उत्पन्न होता है, तो उसे जन्म प्रमाणपत्र, पारिवारिक रिकॉर्ड, वंश संबंधी दस्तावेज या प्राकृतिककरण प्रमाणपत्र जैसे साक्ष्यों के आधार पर अपनी नागरिकता सिद्ध करनी होगी। मंत्रालय ने यह भी कहा कि पासपोर्ट, आधार और जन्म प्रमाणपत्र महत्वपूर्ण साक्ष्य हो सकते हैं, परंतु इन्हें नागरिकता का निर्विवाद प्रमाण नहीं माना जा सकता।
राजनीतिक प्रतिक्रिया
वरिष्ठ अधिवक्ता और राज्यसभा सदस्य कपिल सिब्बल ने सवाल उठाया कि यदि पासपोर्ट नागरिकता का प्रमाण नहीं है, तो आम नागरिक किस दस्तावेज पर भरोसा करे। प्रसिद्ध गीतकार और लेखक जावेद अख्तर ने भी सरकार के रुख पर आपत्ति जताते हुए कहा कि पासपोर्ट जारी करने से पूर्व संबंधित व्यक्ति की राष्ट्रीयता की विधिवत जाँच की जाती है, इसलिए इसे यात्रा दस्तावेज मात्र कहना भ्रामक है।
विदेश मंत्रालय ने इन आपत्तियों के जवाब में दोहराया कि नागरिकता संबंधी किसी भी विवाद का निपटारा नागरिकता अधिनियम के तहत होगा, न कि केवल पासपोर्ट के आधार पर।
आगे क्या
इस विवाद ने पहचान पत्र, यात्रा दस्तावेज और नागरिकता के कानूनी प्रमाण के बीच के अंतर पर एक व्यापक सार्वजनिक बहस को जन्म दे दिया है। गौरतलब है कि यह बहस ऐसे समय में उठी है जब राष्ट्रीय नागरिक रजिस्टर (NRC) और नागरिकता से जुड़े मुद्दे राष्ट्रीय विमर्श में पहले से ही संवेदनशील बने हुए हैं। विशेषज्ञों का मानना है कि सरकार को नागरिकता के वैध प्रमाण के रूप में स्वीकृत दस्तावेजों की एक स्पष्ट और सुलभ सूची सार्वजनिक करनी चाहिए ताकि आम नागरिकों में भ्रम की स्थिति न बने।