10 अगस्त 2026
LIVE
Get it on Google Play Download on the App Store

पासपोर्ट नागरिकता का अप्रत्यक्ष प्रमाण: सुप्रीम कोर्ट के वकील विराग गुप्ता का विश्लेषण

शेयर करें:
ऑडियो वॉइस लोड हो रही है…
पासपोर्ट नागरिकता का अप्रत्यक्ष प्रमाण: सुप्रीम कोर्ट के वकील विराग गुप्ता का विश्लेषण

सारांश

विदेश मंत्रालय के पासपोर्ट-नागरिकता विवाद पर सर्वोच्च न्यायालय के वरिष्ठ अधिवक्ता विराग गुप्ता का स्पष्ट विश्लेषण — MEA तकनीकी रूप से सही है, लेकिन पासपोर्ट अधिनियम 1967 की अनिवार्य शर्तें इसे नागरिकता का अप्रत्यक्ष प्रमाण बनाती हैं। भारत में पृथक नागरिकता कार्ड न होने के कारण यह बहस और भी जटिल है।

मुख्य बातें

विदेश मंत्रालय (MEA) ने कहा कि पासपोर्ट केवल एक यात्रा दस्तावेज है और नागरिकता का प्रमाण नहीं।
सर्वोच्च न्यायालय के वरिष्ठ अधिवक्ता विराग गुप्ता ने कहा कि MEA तकनीकी रूप से सही है, परंतु पासपोर्ट अप्रत्यक्ष रूप से नागरिकता से जुड़ा है।
पासपोर्ट अधिनियम 1967 की धारा 12 के तहत धोखाधड़ी से पासपोर्ट लेने पर दंड का प्रावधान है; धारा 20 में विशेष परिस्थितियों में गैर-नागरिकों को भी पासपोर्ट देने की व्यवस्था है।
भारत में कोई पृथक नागरिकता कार्ड प्रणाली नहीं है; नागरिकता का अंतिम निर्धारण केंद्र सरकार के पास है।
विराग गुप्ता ने चेतावनी दी कि 90-95 प्रतिशत लोगों को नागरिकता साबित करने पर मजबूर करने से देश में अराजकता का खतरा है।
विशेषज्ञ ने सरकार से माँग की कि नागरिकता प्रमाण और पहचान दस्तावेजों के बीच स्पष्ट सीमा रेखा तय की जाए।

भारतीय विदेश मंत्रालय (MEA) के उस बयान के बाद कि पासपोर्ट केवल एक यात्रा दस्तावेज है और इसे नागरिकता का प्रमाण नहीं माना जा सकता, देशभर में एक नई संवैधानिक बहस छिड़ गई है। सर्वोच्च न्यायालय के वरिष्ठ अधिवक्ता विराग गुप्ता ने 25 जून 2026 को कहा कि तकनीकी दृष्टि से मंत्रालय का रुख सही है, परंतु व्यावहारिक ढाँचे को देखते हुए पासपोर्ट को नागरिकता का अप्रत्यक्ष प्रमाण भी माना जा सकता है।

मंत्रालय का रुख और कानूनी आधार

पासपोर्ट अधिनियम 1967 के तहत पासपोर्ट को विदेश यात्रा के लिए जारी एक यात्रा दस्तावेज के रूप में परिभाषित किया गया है। विराग गुप्ता के अनुसार, कानून की भाषा में यह दस्तावेज नागरिकता का प्रत्यक्ष प्रमाण नहीं है — और इस अर्थ में MEA का बयान तकनीकी रूप से सटीक है।

हालाँकि, पासपोर्ट अधिनियम की धारा 12 में यह प्रावधान है कि यदि कोई व्यक्ति गलत जानकारी देकर या धोखाधड़ी से पासपोर्ट प्राप्त करता है, तो उसके विरुद्ध कानूनी कार्रवाई और दंड का प्रावधान है। वहीं धारा 20 में यह भी व्यवस्था है कि विशेष परिस्थितियों में केंद्र सरकार की अनुमति से गैर-नागरिकों को भी पासपोर्ट जारी किया जा सकता है।

व्यावहारिक ढाँचा: नागरिकता से अप्रत्यक्ष संबंध

विराग गुप्ता ने कहा कि पासपोर्ट की अनिवार्य शर्तों को देखा जाए तो यह सामान्यतः केवल भारतीय नागरिकों को ही जारी किया जाता है और इसे प्राप्त करने के लिए कई स्तरों पर सत्यापन की प्रक्रिया से गुजरना पड़ता है। इस आधार पर उनका मानना है कि यह दस्तावेज अप्रत्यक्ष रूप से नागरिकता से जुड़ा हुआ है।

उन्होंने यह भी कहा कि भारत में विदेशों की तरह कोई पृथक नागरिकता कार्ड प्रणाली नहीं है, जिसके कारण पासपोर्ट और मतदाता सूची जैसे दस्तावेजों को कई बार नागरिकता के महत्त्वपूर्ण संकेतक के रूप में देखा जाता है। संविधान के अनुच्छेद 326 के अनुसार मतदान का अधिकार केवल भारतीय नागरिकों को है, इसलिए मतदाता सूची में नाम होना भी नागरिकता का एक संकेत माना जाता है।

संविधान और नागरिकता निर्धारण

विराग गुप्ता ने स्पष्ट किया कि संविधान के भाग-2 में नागरिकता से संबंधित स्पष्ट प्रावधान मौजूद हैं और नागरिकता का अंतिम निर्धारण केंद्र सरकार के स्तर पर होता है। पासपोर्ट, आधार कार्ड, राशन कार्ड और ड्राइविंग लाइसेंस जैसे दस्तावेज पहचान और पते के प्रमाण के रूप में तो कार्य करते हैं, परंतु नागरिकता के औपचारिक निर्धारण का अधिकार केंद्र सरकार के पास ही सुरक्षित है।

गौरतलब है कि हाल के वर्षों में मतदाता सूची के सत्यापन और जनगणना जैसे अभियानों के दौरान नागरिकता से जुड़े मुद्दों पर बहसें तेज हुई हैं। उनके अनुसार देश में नागरिकता से जुड़े डेटा को लेकर एकीकृत और स्पष्ट प्रणाली अभी तक विकसित नहीं हो सकी है।

विशेषज्ञ का सुझाव और चेतावनी

विराग गुप्ता ने सरकार को सुझाव दिया कि यह स्पष्ट किया जाना चाहिए कि किन दस्तावेजों को नागरिकता के प्रमाण के रूप में स्वीकार किया जा सकता है और किन्हें केवल पहचान दस्तावेज माना जाए। उन्होंने कहा, 'अगर 90-95 प्रतिशत लोगों को केवल नागरिकता साबित करने में लगा दिया जाए, तो न सिर्फ पासपोर्ट की संवैधानिक स्थिति कमज़ोर होगी, बल्कि देश में अराजकता बढ़ने का खतरा भी है।'

उन्होंने यह भी रेखांकित किया कि नागरिकता प्रमाण को लेकर बार-बार सवाल उठाने से प्रशासनिक संसाधनों पर अतिरिक्त बोझ पड़ेगा। उनके अनुसार केवल संदिग्ध मामलों की ही जाँच होनी चाहिए, न कि पूरी जनसंख्या को संदेह के दायरे में लाया जाए। यह बहस आने वाले समय में नागरिकता नीति और दस्तावेज़ीकरण प्रणाली को नई दिशा दे सकती है।

संपादकीय दृष्टिकोण

लेकिन यह उस व्यावहारिक वास्तविकता को नज़रअंदाज़ करता है जिसमें भारत के करोड़ों नागरिकों के पास नागरिकता साबित करने का कोई एकल, सार्वभौमिक दस्तावेज नहीं है। जब देश में कोई नागरिकता कार्ड ही नहीं है, तो पासपोर्ट और मतदाता सूची को अप्रत्यक्ष प्रमाण मानने से इनकार करना प्रशासनिक रूप से खतरनाक हो सकता है। यह बहस असल में एक बड़े नीतिगत शून्य को उजागर करती है — नागरिकता डेटा का कोई एकीकृत और सत्यापन-योग्य ढाँचा आज तक नहीं बना। जब तक सरकार यह स्पष्ट नहीं करती कि कौन-से दस्तावेज नागरिकता के प्रमाण हैं, तब तक ऐसी बहसें प्रशासनिक संसाधनों को बर्बाद करती रहेंगी और आम नागरिक को अनिश्चितता में रखेंगी।
RashtraPress
10 अगस्त 2026

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

विदेश मंत्रालय ने पासपोर्ट को नागरिकता का प्रमाण क्यों नहीं माना?
विदेश मंत्रालय ने पासपोर्ट अधिनियम 1967 के आधार पर कहा कि पासपोर्ट केवल एक यात्रा दस्तावेज है, न कि नागरिकता का औपचारिक प्रमाण। कानूनी दृष्टि से यह बयान सटीक है क्योंकि नागरिकता का निर्धारण केंद्र सरकार के स्तर पर अलग प्रक्रिया से होता है।
सुप्रीम कोर्ट के वकील विराग गुप्ता का क्या कहना है?
विराग गुप्ता ने कहा कि MEA तकनीकी रूप से सही है, लेकिन व्यावहारिक ढाँचे में पासपोर्ट नागरिकता का अप्रत्यक्ष प्रमाण है क्योंकि यह सामान्यतः केवल भारतीय नागरिकों को ही जारी किया जाता है और इसे पाने के लिए कई स्तरों पर सत्यापन होता है।
पासपोर्ट अधिनियम 1967 की धारा 12 और धारा 20 क्या कहती हैं?
धारा 12 के तहत गलत जानकारी देकर या धोखाधड़ी से पासपोर्ट प्राप्त करने पर कानूनी कार्रवाई और दंड का प्रावधान है। धारा 20 में यह व्यवस्था है कि विशेष परिस्थितियों में केंद्र सरकार की अनुमति से गैर-नागरिकों को भी पासपोर्ट जारी किया जा सकता है।
भारत में नागरिकता का प्रमाण कौन-से दस्तावेज देते हैं?
भारत में विदेशों की तरह कोई पृथक नागरिकता कार्ड प्रणाली नहीं है। पासपोर्ट, मतदाता सूची, आधार कार्ड, राशन कार्ड और ड्राइविंग लाइसेंस पहचान और पते के प्रमाण के रूप में काम करते हैं, लेकिन नागरिकता के अंतिम निर्धारण का अधिकार केंद्र सरकार के पास है।
विराग गुप्ता ने नागरिकता प्रमाण को लेकर क्या चेतावनी दी?
उन्होंने कहा कि यदि 90-95 प्रतिशत लोगों को नागरिकता साबित करने पर मजबूर किया जाए तो देश में अराजकता का खतरा है और प्रशासनिक संसाधनों पर अतिरिक्त बोझ पड़ेगा। उन्होंने सुझाया कि केवल संदिग्ध मामलों की ही जाँच होनी चाहिए।
राष्ट्र प्रेस
सिलसिला

जुड़े बिंदु

इस ख़बर के पीछे की कड़ियाँ — सबसे नई पहले।

8 बिंदु
  1. नवीनतम 2 सप्ताह पहले
  2. 1 महीना पहले
  3. 1 महीना पहले
  4. 1 महीना पहले
  5. 1 महीना पहले
  6. 1 महीना पहले
  7. 1 महीना पहले
  8. 1 महीना पहले