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पासपोर्ट नागरिकता का प्रमाण नहीं, सिर्फ यात्रा दस्तावेज है: पूर्व राजदूत दीपक वोहरा

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पासपोर्ट नागरिकता का प्रमाण नहीं, सिर्फ यात्रा दस्तावेज है: पूर्व राजदूत दीपक वोहरा

सारांश

पूर्व राजदूत दीपक वोहरा ने 53 वर्षों के राजनयिक अनुभव के आधार पर साफ कहा — पासपोर्ट यात्रा की अनुमति देता है, नागरिकता नहीं। सोवियत संघ से लेकर अफ्रीकी देशों तक के उदाहरणों से उन्होंने उस राजनीतिक बहस को निराधार बताया जो दोनों को एक मानती है।

मुख्य बातें

पूर्व राजदूत दीपक वोहरा ने कहा कि पासपोर्ट मूल रूप से एक यात्रा दस्तावेज है, नागरिकता का प्रमाण नहीं।
नागरिकता एक कानूनी दर्जा है जो जन्म, माता-पिता की नागरिकता या नेचुरलाइजेशन से मिलता है; राष्ट्रीयता जातीय या क्षेत्रीय पहचान से जुड़ी है।
आधुनिक पासपोर्ट प्रणाली 1919 में लीग ऑफ नेशंस द्वारा औपचारिक रूप से स्थापित हुई।
वोहरा के अनुसार, विशेष परिस्थितियों में सरकारें अस्थायी पासपोर्ट जारी कर सकती हैं जो नागरिकता नहीं बदलते।
वोहरा तीन अफ्रीकी देशों के विशेष सलाहकार हैं और उनके पास एक अफ्रीकी देश का राजनयिक पासपोर्ट है, जबकि उनकी नागरिकता भारतीय बनी हुई है।
उन्होंने लोगों से अंतरराष्ट्रीय कानून और संयुक्त राष्ट्र के दस्तावेजों का अध्ययन करने का आग्रह किया।

पूर्व राजदूत दीपक वोहरा ने 25 जून 2025 को नई दिल्ली में पासपोर्ट और नागरिकता के बीच के अंतर को स्पष्ट करते हुए कहा कि पासपोर्ट मूल रूप से एक यात्रा दस्तावेज है और इसे नागरिकता का प्रमाण नहीं माना जाना चाहिए। 53 वर्षों के राजनयिक अनुभव वाले वोहरा ने इस विषय पर चल रही राजनीतिक बहस को अनावश्यक बताते हुए अंतरराष्ट्रीय कानून के आधार पर दोनों अवधारणाओं को अलग-अलग समझाया।

नागरिकता और राष्ट्रीयता: दो अलग अवधारणाएँ

वोहरा के अनुसार, नागरिकता एक कानूनी दर्जा है जो जन्म, माता-पिता की नागरिकता या प्राकृतिककरण (नेचुरलाइजेशन) के आधार पर प्राप्त होता है। इसके विपरीत, राष्ट्रीयता का संबंध व्यक्ति की जातीय, सांस्कृतिक या क्षेत्रीय पहचान से हो सकता है — जिसे लोग अक्सर एक ही मान लेते हैं।

उन्होंने अपनी सोवियत संघ में पहली पोस्टिंग का उदाहरण देते हुए बताया कि वहाँ जब उनसे राष्ट्रीयता पूछी गई और उन्होंने 'भारतीय' कहा, तो सोवियत अधिकारियों ने स्पष्ट किया कि वे दरअसल 'एथिनिसिटी' — यानी भारत के किस प्रांत या क्षेत्र से ताल्लुक रखते हैं — जानना चाहते थे। यह अनुभव दर्शाता है कि राष्ट्रीयता और नागरिकता की परिभाषाएँ देश-दर-देश भिन्न हो सकती हैं।

पासपोर्ट का इतिहास और उद्देश्य

वोहरा ने बताया कि पासपोर्ट की अवधारणा प्राचीन काल से चली आ रही है, जब राजा अपने दूतों को सुरक्षित यात्रा के लिए पत्र देते थे। आधुनिक पासपोर्ट प्रणाली को 1919 में प्रथम विश्व युद्ध के बाद लीग ऑफ नेशंस ने औपचारिक रूप दिया। उन्होंने यह भी बताया कि 'पासपोर्ट' मूलतः एक फ्रांसीसी शब्द है जिसका अर्थ है 'बंदरगाह पार करना।'

वोहरा ने कहा, 'यह किसी व्यक्ति को अपने देश से बाहर यात्रा करने और दूसरे देश में प्रवेश करने की अनुमति देता है। इसलिए यह मूल रूप से यात्रा से संबंधित दस्तावेज है। हालाँकि कुछ मामलों में इसमें नागरिकता या राष्ट्रीयता का उल्लेख हो सकता है, लेकिन इसका मतलब यह नहीं कि पासपोर्ट ही नागरिकता का प्रमाण है।'

विशेष और अस्थायी पासपोर्ट के उदाहरण

अपने 53 वर्षों के विदेश सेवा अनुभव का हवाला देते हुए वोहरा ने बताया कि विशेष परिस्थितियों में सरकारें अस्थायी पासपोर्ट भी जारी कर सकती हैं। उन्होंने कहा, 'हमने कुछ विशेष मामलों में कुछ लोगों को अस्थायी रूप से भारतीय पासपोर्ट जारी किए थे। उनमें एक बहुत प्रसिद्ध व्यक्ति भी था। उस समय प्रधानमंत्री ने निर्णय लिया था कि उन्हें पासपोर्ट दिया जाए। वह गए, अपना काम पूरा किया और बाद में लौटकर पासपोर्ट वापस कर दिया।'

वोहरा ने यह भी बताया कि वे तीन अफ्रीकी देशों के विशेष सलाहकार हैं। उनमें से एक देश ने उन्हें राजनयिक पासपोर्ट जारी किया। जब उन्होंने उस देश के प्रधानमंत्री से भारतीय नागरिक होने का हवाला देते हुए आपत्ति जताई, तो प्रधानमंत्री ने पासपोर्ट खोलकर दिखाया जिसमें नागरिकता के सामने 'भारतीय' लिखा था। प्रधानमंत्री ने स्पष्ट किया, 'जो दस्तावेज मैं आपको दे रहा हूँ, वह सिर्फ मेरे देश में आने-जाने के लिए है — यह एक तरह के वीज़ा जैसा है।' यह उदाहरण इस तथ्य को रेखांकित करता है कि पासपोर्ट जारी करने वाला देश और नागरिकता का देश हमेशा एक ही नहीं होता।

बहु-नागरिकता परिवारों की वास्तविकता

वोहरा ने अपनी पोतियों का उदाहरण देते हुए बताया कि उनका जन्म अमेरिका में हुआ, इसलिए वे अमेरिकी नागरिक हैं। उनके पिता ब्रिटिश नागरिक हैं और उनकी माँ भारतीय हैं। ऐसे परिवारों में विभिन्न देशों से जुड़े अधिकार और दस्तावेज हो सकते हैं, लेकिन नागरिकता और राष्ट्रीयता के प्रश्न को कानूनी और व्यावहारिक रूप से अलग-अलग समझना आवश्यक है।

राजनीतिक विवाद पर वोहरा की चेतावनी

वोहरा ने कहा कि पासपोर्ट और नागरिकता को लेकर अनावश्यक राजनीतिक विवाद खड़ा किया जा रहा है। उन्होंने लोगों से आग्रह किया कि इस विषय पर राय बनाने से पहले अंतरराष्ट्रीय कानून, संयुक्त राष्ट्र के दस्तावेजों तथा कांसुलर और राजनयिक संबंधों से जुड़े अंतरराष्ट्रीय समझौतों का अध्ययन करें। उन्होंने दोहराया कि पासपोर्ट एक यात्रा दस्तावेज है, जबकि नागरिकता व्यक्ति की कानूनी पहचान और उसके अधिकारों तथा दायित्वों से जुड़ा विषय है — दोनों को एक-दूसरे का पर्याय नहीं माना जाना चाहिए।

संपादकीय दृष्टिकोण

बल्कि यह अंतरराष्ट्रीय व्यवहार की बुनियादी समझ की कमी को भी दर्शाता है। जो राजनीतिक बहस इस विषय पर चल रही है, वह अक्सर वियना कन्वेंशन और संयुक्त राष्ट्र के स्थापित ढाँचों की अनदेखी कर भावनात्मक आधार पर खड़ी की जाती है। मुख्यधारा की कवरेज इस तथ्य को नज़रअंदाज़ करती है कि अस्थायी और राजनयिक पासपोर्ट की व्यवस्था पहले से मौजूद है — और यह नागरिकता को छुए बिना काम करती है।
RashtraPress
11 अगस्त 2026

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

पासपोर्ट और नागरिकता में क्या फर्क है?
पासपोर्ट एक यात्रा दस्तावेज है जो किसी व्यक्ति को विदेश में प्रवेश करने की अनुमति देता है, जबकि नागरिकता एक कानूनी दर्जा है जो जन्म, माता-पिता की नागरिकता या नेचुरलाइजेशन से मिलता है। पूर्व राजदूत दीपक वोहरा के अनुसार, दोनों को एक-दूसरे का पर्याय नहीं माना जाना चाहिए।
क्या किसी दूसरे देश का पासपोर्ट होने से नागरिकता बदल जाती है?
नहीं। दीपक वोहरा ने अपना उदाहरण देते हुए बताया कि एक अफ्रीकी देश ने उन्हें राजनयिक पासपोर्ट जारी किया, लेकिन उसमें नागरिकता के सामने 'भारतीय' ही लिखा था। वह पासपोर्ट केवल उस देश में आने-जाने की सुविधा के लिए था — नागरिकता बदलने के लिए नहीं।
आधुनिक पासपोर्ट प्रणाली कब शुरू हुई?
आधुनिक पासपोर्ट प्रणाली को 1919 में प्रथम विश्व युद्ध के बाद लीग ऑफ नेशंस ने औपचारिक रूप दिया। इससे पहले प्राचीन काल में राजा अपने दूतों को सुरक्षित यात्रा के लिए पत्र दिया करते थे।
राष्ट्रीयता और नागरिकता में क्या अंतर है?
वोहरा के अनुसार, राष्ट्रीयता का संबंध व्यक्ति की जातीय, सांस्कृतिक या क्षेत्रीय पहचान से है, जबकि नागरिकता एक कानूनी अवधारणा है जो अधिकारों और दायित्वों से जुड़ी है। सोवियत संघ में उनके अनुभव के अनुसार, वहाँ 'राष्ट्रीयता' का अर्थ एथिनिसिटी था — न कि नागरिकता।
पासपोर्ट और नागरिकता की बहस को समझने के लिए क्या पढ़ना चाहिए?
दीपक वोहरा ने सुझाव दिया कि इस विषय पर राय बनाने से पहले अंतरराष्ट्रीय कानून, संयुक्त राष्ट्र के दस्तावेज और कांसुलर व राजनयिक संबंधों से जुड़े अंतरराष्ट्रीय समझौतों का अध्ययन करना चाहिए। भावनात्मक या राजनीतिक आधार पर इस विषय पर टिप्पणी करना भ्रामक हो सकता है।
राष्ट्र प्रेस
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