ओवैसी का MEA पर पलटवार: पासपोर्ट को नागरिकता से अलग करना अनुचित, सरकार तय नहीं कर सकती कौन भारतीय है
सारांश
मुख्य बातें
ऑल इंडिया मजलिस-ए-इत्तेहादुल मुस्लिमीन (AIMIM) के प्रमुख असदुद्दीन ओवैसी ने 25 जून 2026 को भारतीय विदेश मंत्रालय (MEA) के उस बयान पर कड़ी आपत्ति जताई, जिसमें पासपोर्ट को महज एक यात्रा दस्तावेज बताया गया था और नागरिकता के प्रमाण के रूप में इसकी मान्यता को नकारा गया था। ओवैसी ने स्पष्ट शब्दों में कहा कि सरकार यह अधिकार नहीं रख सकती कि वह अपनी मर्जी से किसी को भी भारत का नागरिक मानने से इनकार कर दे।
पासपोर्ट और नागरिकता का कानूनी संबंध
ओवैसी ने सवाल उठाया कि भारतीय पासपोर्ट आखिर किसे जारी किया जाता है? उन्होंने कहा कि यह दस्तावेज केवल और केवल भारतीय नागरिकों को ही दिया जाता है — किसी विदेशी नागरिक को नहीं। पासपोर्ट जारी करने से पूर्व विस्तृत पुलिस सत्यापन और सभी आवश्यक जाँचें की जाती हैं। ऐसे में इसे नागरिकता से पूरी तरह काट देना तर्कसंगत नहीं है।
उन्होंने पासपोर्ट अधिनियम की विभिन्न धाराओं का हवाला देते हुए कहा कि इस कानून में स्पष्ट प्रावधान है कि बिना नागरिकता के किसी व्यक्ति को पासपोर्ट नहीं दिया जा सकता — सिवाय उन विशेष परिस्थितियों के जिनमें केंद्र सरकार की अनुमति अनिवार्य होती है।
आम नागरिकों पर संभावित असर
ओवैसी ने चेताया कि यदि नागरिकता प्रमाण पत्र को ही नागरिकता का एकमात्र वैध प्रमाण माना जाने लगा, तो देश की बड़ी आबादी मुश्किल में पड़ सकती है। उनके अनुसार, भारत में अधिकतर लोग जन्म प्रमाण पत्र, आधार कार्ड, वोटर आईडी और पासपोर्ट जैसे दस्तावेजों के आधार पर अपनी पहचान साबित करते हैं — अलग से नागरिकता प्रमाण पत्र बहुत कम लोगों के पास होता है।
उन्होंने कहा कि देश में कई पीढ़ियों से रह रहे लोगों के पास स्वतंत्र नागरिकता दस्तावेज नहीं हैं। इन सभी प्रचलित दस्तावेजों को अमान्य करना आम जनता के लिए गंभीर कानूनी जटिलताएँ खड़ी कर सकता है।
सरकार पर सीधा आरोप
ओवैसी ने आरोप लगाया कि सरकार की मंशा यह है कि वह किसी को भी उठाकर कह सके — 'यह भारत का नागरिक नहीं है।' उन्होंने कहा, 'हम तय करेंगे कि कौन भारत का नागरिक है और कौन नहीं — यह सही नहीं है।' उनके अनुसार, सरकार बेवजह पासपोर्ट को लेकर आम लोगों के लिए परेशानी खड़ी कर रही है।
मुजफ्फरनगर बंधुआ मजदूरी मामले पर प्रतिक्रिया
इसी दौरान ओवैसी ने उत्तर प्रदेश के मुजफ्फरनगर में सामने आए कथित बंधुआ मजदूरी के मामले की भी कड़ी निंदा की। उन्होंने इसे 'अत्यंत निंदनीय और अमानवीय' बताते हुए कहा कि किसी गरीब व्यक्ति को बंधक बनाना, जबरन काम कराना, भूखा रखना और शारीरिक रूप से प्रताड़ित करना गंभीर अपराध है। उन्होंने व्यंग्यात्मक लहजे में कहा कि जब राज्य सरकार को किसी की शादी में क्या पक रहा है इसकी खबर रहती है, तो ऐसे संगीन सामाजिक अपराधों की जानकारी प्रशासन को क्यों नहीं होती।
उन्होंने आरोप लगाया कि सरकार की नजर केवल एक ही समुदाय पर टिकी रहती है, जबकि अन्य गंभीर सामाजिक अपराधों की अनदेखी की जाती है। राम मंदिर में चढ़ावे की चोरी और गरीबों से बंधुआ मजदूरी जैसी घटनाओं पर भी प्रशासन की निष्क्रियता पर उन्होंने सवाल उठाए।
ओवैसी के इस बयान ने पासपोर्ट-नागरिकता विवाद को एक बार फिर राजनीतिक केंद्र में ला दिया है, और आने वाले दिनों में इस पर संसदीय और कानूनी बहस तेज होने की संभावना है।