शिबू सोरेन की पुण्यतिथि पर धनबाद में श्रद्धांजलि, पाठ्यक्रम में संघर्ष शामिल करने की मांग
सारांश
मुख्य बातें
झारखंड आंदोलन के महानायक और झारखंड मुक्ति मोर्चा (झामुमो) के संस्थापक दिशोम गुरु शिबू सोरेन की पहली पुण्यतिथि पर मंगलवार, 4 अगस्त को धनबाद के रणधीर वर्मा चौक पर झारखंड आंदोलनकारी संघर्ष मोर्चा के बैनर तले एक भावभीनी श्रद्धांजलि सभा का आयोजन किया गया। इस अवसर पर वक्ताओं ने गुरुजी के जीवन-संघर्ष को स्कूली पाठ्यक्रम में शामिल करने की जोरदार मांग उठाई।
श्रद्धांजलि सभा का आयोजन
सभा में निरसा के सीपीआई एमएल विधायक अरूप चटर्जी और सिंदरी के विधायक चंद्रदेव महतो सहित विभिन्न सामाजिक एवं राजनीतिक संगठनों के प्रतिनिधियों ने गुरुजी के चित्र पर पुष्पांजलि अर्पित की। वक्ताओं ने शिबू सोरेन के नेतृत्व में चले झारखंड आंदोलन और राज्य निर्माण में उनके ऐतिहासिक योगदान को रेखांकित करते हुए कहा कि उनका संघर्ष आने वाली पीढ़ियों के लिए प्रेरणा का अक्षय स्रोत है।
पाठ्यक्रम में शामिल करने की मांग
आंदोलनकारियों ने सरकार से आग्रह किया कि शिबू सोरेन के जीवन, झारखंड आंदोलन और राज्य निर्माण में उनकी भूमिका को झारखंड के स्कूली पाठ्यक्रम में सम्मिलित किया जाए, ताकि नई पीढ़ी अपने इतिहास और जनसंघर्षों से परिचित हो सके। उनका कहना था कि गुरुजी के विचारों को केवल स्मृति समारोहों तक सीमित रखना उनके बलिदान के साथ न्याय नहीं होगा।
विधायक अरूप चटर्जी का बयान
निरसा विधायक अरूप चटर्जी ने कहा कि दिशोम गुरु ने जिस झारखंड का सपना देखा था, वह आज भी पूरी तरह साकार नहीं हो सका है। उन्होंने कहा कि राज्य गठन का मूल उद्देश्य स्थानीय युवाओं को सम्मानजनक रोजगार और अधिकार दिलाना था, लेकिन आज भी बड़ी संख्या में युवा बेरोजगारी का सामना कर रहे हैं। चटर्जी ने आरोप लगाया कि झारखंड लोक सेवा आयोग की भर्ती प्रक्रियाओं के माध्यम से बाहरी लोगों को नौकरियाँ मिल रही हैं, जो राज्य आंदोलन की मूल भावना के विपरीत है।
जल, जंगल, जमीन की रक्षा का संकल्प
चटर्जी ने कहा कि गुरुजी ने जल, जंगल, जमीन और झारखंडी अस्मिता की रक्षा के लिए आजीवन संघर्ष किया। उनके विचारों को सरकारी नीतियों और शिक्षा व्यवस्था में भी स्थान मिलना चाहिए। सभा में उपस्थित अन्य वक्ताओं ने भी गुरुजी के बताए रास्ते पर चलने का संकल्प दोहराया और झारखंड आंदोलन के इतिहास को संरक्षित करने की आवश्यकता पर बल दिया।
आगे क्या
यह मांग ऐसे समय में उठाई गई है जब झारखंड में स्थानीय रोजगार और आदिवासी अधिकारों का मुद्दा राजनीतिक रूप से संवेदनशील बना हुआ है। गौरतलब है कि राज्य गठन को 25 वर्ष पूरे होने वाले हैं और इस पृष्ठभूमि में पाठ्यक्रम सुधार की माँग व्यापक विमर्श को जन्म दे सकती है।