दक्षिण कोरिया: बैलट पेपर की कमी पर सोल में लगातार 17वें दिन विरोध, 34,000 प्रदर्शनकारी सड़कों पर
सारांश
मुख्य बातें
दक्षिण कोरिया की राजधानी सोल में 3 जून 2026 को हुए स्थानीय चुनावों में कथित अनियमितताओं को लेकर जन-आंदोलन 21 जून को अपने 17वें दिन में प्रवेश कर गया। 26 मतदान केंद्रों पर बैलट पेपर की कमी के आरोपों के बाद भड़के इस विरोध में दोपहर तक करीब 34,000 लोग शामिल हो चुके थे, जिनमें 20 और 30 वर्ष के युवाओं की संख्या सबसे अधिक बताई गई।
प्रदर्शन का केंद्र और मांगें
प्रदर्शनकारी दक्षिणी सोल के सोंगपा जिले में स्थित एसके ओलंपिक हैंडबॉल जिम्नेजियम के बाहर एकत्रित हो रहे हैं — यह वही स्थान है जहाँ चुनावों की मतगणना की गई थी। प्रदर्शनकारी 'चुनाव धोखाधड़ी' के आरोप लगाते हुए पुनर्मतदान की माँग पर अड़े हैं। आंदोलन 5 जून को शुरू हुआ था, जब बैलट पेपर की कमी के कारण मतदान अस्थायी रूप से बाधित हो गया था।
राष्ट्रीय निर्वाचन आयोग का रुख
राष्ट्रीय निर्वाचन आयोग (NEC) ने बैलट पेपर की कमी के लिए औपचारिक रूप से माफी माँगी है, लेकिन स्पष्ट किया है कि यह स्थिति चुनाव कानून के तहत पुनर्मतदान का आधार नहीं बनती। इस बीच पुलिस और अभियोजकों की एक संयुक्त टीम पूरे मामले की जाँच कर रही है। सरकार ने प्रदर्शनकारियों से शांतिपूर्ण विरोध की अपील करते हुए चेतावनी दी है कि हिंसा या अवैध गतिविधियों को बर्दाश्त नहीं किया जाएगा।
संसदीय जाँच की तैयारी
दक्षिण कोरिया की नेशनल असेंबली ने भी इस विवाद को गंभीरता से लेते हुए जाँच प्रक्रिया शुरू कर दी है। सत्तारूढ़ डेमोक्रेटिक पार्टी (DP) और मुख्य विपक्षी पीपुल पावर पार्टी (PPP) दोनों ने संसदीय जाँच की माँग की है और एक विशेष समिति गठित करने की तैयारी चल रही है। हालाँकि दोनों दलों के बीच जाँच के दायरे और समिति में सीटों के बँटवारे को लेकर मतभेद बने हुए हैं।
विशेष जाँच पर राजनीतिक मतभेद
विपक्षी PPP ने अलग से विशेष अभियोजक जाँच की माँग रखी है, जबकि सत्तारूढ़ DP का कहना है कि इस पर निर्णय संसदीय जाँच के बाद लिया जाना चाहिए। संसद के अध्यक्ष चो जियोंग सिक ने संकेत दिया है कि आने वाले सप्ताह में जाँच प्रस्ताव को आगे बढ़ाया जा सकता है। राष्ट्रपति कार्यालय ने भी कहा है कि यदि दोनों पक्ष सहमत होते हैं तो विशेष जाँच की संभावना पर विचार किया जा सकता है।
आगे क्या होगा
यह आंदोलन ऐसे समय में तेज हुआ है जब दक्षिण कोरिया पहले से ही राजनीतिक उथल-पुथल के दौर से गुज़र रहा है। गौरतलब है कि चुनावी प्रक्रिया में पारदर्शिता को लेकर नागरिकों का यह आक्रोश लोकतांत्रिक संस्थाओं पर बढ़ते अविश्वास का संकेत देता है। संसदीय समिति के गठन और जाँच के दायरे पर आने वाले दिनों में होने वाले फैसले इस आंदोलन की दिशा तय करेंगे।