सुप्रीम कोर्ट ने सुभाष चंद्र कपूर को जर्मनी भेजने के मद्रास हाईकोर्ट के आदेश पर लगाई रोक
सारांश
मुख्य बातें
सर्वोच्च न्यायालय ने 27 अक्टूबर 2026 को मूर्ति तस्करी के आरोपी सुभाष चंद्र कपूर को जर्मनी वापस भेजने के मद्रास उच्च न्यायालय के आदेश पर अंतरिम रोक लगा दी। मद्रास हाईकोर्ट ने 8 सितंबर को केंद्र सरकार को निर्देश दिया था कि वह कपूर को तिरुचिरापल्ली की केंद्रीय जेल से अपनी हिरासत में लेकर दो सप्ताह के भीतर जर्मनी भेजने की प्रक्रिया पूरी करे।
मामले की पृष्ठभूमि
कपूर पर तमिलनाडु के कई मंदिरों से प्राचीन मूर्तियों की कथित चोरी और तस्करी से जुड़े अनेक आपराधिक मामले लंबित हैं। याचिका के अनुसार, कपूर को पहले अक्टूबर 2011 में जर्मनी में गिरफ्तार किया गया था। भारत के अनुरोध पर प्रत्यर्पण प्रक्रिया पूरी करने के बाद उसे 13 जुलाई 2012 को भारत लाया गया था।
यह प्रत्यर्पण तमिलनाडु के उदयारपालयम पुलिस स्टेशन में दर्ज एक मामले के आधार पर हुआ था, जो एक मंदिर से 18 प्राचीन पंचलोहा और पत्थर की मूर्तियों की कथित चोरी से संबंधित था।
सुप्रीम कोर्ट में याचिका
मंदिरों की ओर से पेश वकील एस. विजय नारायण ने मद्रास हाईकोर्ट के फैसले को सर्वोच्च न्यायालय में चुनौती दी। उनका तर्क था कि जर्मनी वापस भेजने का आदेश देते समय कई महत्वपूर्ण पहलुओं पर पर्याप्त विचार नहीं किया गया — जिनमें तमिलनाडु में लंबित अन्य आपराधिक मामले, लापता केस डायरियों की जांच और अमेरिका के प्रत्यर्पण अनुरोध शामिल हैं।
विशिष्टता के सिद्धांत पर कानूनी सवाल
याचिका में प्रत्यर्पण कानून के तहत लागू होने वाले 'रूल ऑफ स्पेशियलिटी' (विशिष्टता के सिद्धांत) की व्याख्या से जुड़ा एक महत्वपूर्ण कानूनी प्रश्न भी उठाया गया है। इस सिद्धांत के अनुसार, प्रत्यर्पित व्यक्ति पर कथित तौर पर केवल उन्हीं अपराधों के लिए मुकदमा चलाया जा सकता है जिनके लिए उसे प्रत्यर्पित किया गया था।
हालांकि, याचिकाकर्ता का तर्क है कि भारत आने के बाद देश के भीतर कथित तौर पर किए गए अलग-अलग अपराधों की जांच और अभियोजन के लिए जर्मनी की नई अनुमति आवश्यक नहीं होनी चाहिए। यह व्याख्या का प्रश्न भविष्य में भारत में प्रत्यर्पण मामलों की दिशा तय कर सकता है।
जांच में सामने आए आरोप
याचिकाकर्ता के अनुसार, भारत लाए जाने के बाद तमिलनाडु पुलिस और आइडल विंग सीआईडी की जांच में कपूर की कथित भूमिका कई अन्य मंदिरों से मूर्तियों की चोरी के मामलों में भी सामने आई। जांच में प्राचीन मूर्तियों की कथित चोरी, उन्हें विदेश भेजने और कथित तौर पर फर्जी दस्तावेज तैयार करने वाले नेटवर्क की पड़ताल शामिल रही।
आगे क्या होगा
सर्वोच्च न्यायालय की यह अंतरिम रोक अगली सुनवाई तक प्रभावी रहेगी। गौरतलब है कि यह मामला केवल एक व्यक्ति के प्रत्यर्पण तक सीमित नहीं है — यह भारत के मंदिर विरासत संरक्षण प्रयासों और अंतरराष्ट्रीय प्रत्यर्पण कानून की सीमाओं, दोनों से जुड़े व्यापक प्रश्न उठाता है। न्यायालय के अंतिम फैसले का असर भविष्य के ऐसे मामलों पर भी पड़ सकता है जिनमें अमेरिका समेत अन्य देश भी पक्षकार हों।