तसलीमा नसरीन के मदरसा बयान पर सियासी संग्राम: BJP नेताओं का समर्थन, मुस्लिम धर्मगुरुओं ने माँगी कानूनी कार्रवाई
सारांश
मुख्य बातें
बांग्लादेश से निर्वासित लेखिका तसलीमा नसरीन द्वारा मदरसा शिक्षा और जिहाद को लेकर दिए गए विवादास्पद बयान ने 3 अगस्त 2026 को देशभर में तीखी राजनीतिक बहस छेड़ दी है। जहाँ भारतीय जनता पार्टी (BJP) के नेताओं ने इसे उनकी व्यक्तिगत अभिव्यक्ति बताते हुए मदरसा सुधार की वकालत की, वहीं ऑल इंडिया मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड सहित मुस्लिम धर्मगुरुओं ने इसे तथ्यहीन और समाज में भ्रम फैलाने वाला बताते हुए कानूनी कार्रवाई की माँग उठाई है।
तसलीमा नसरीन का विवादास्पद बयान
तसलीमा नसरीन ने कथित तौर पर मदरसा शिक्षा को अनावश्यक बताते हुए दावा किया कि इससे केवल जिहादी मानसिकता को बढ़ावा मिलता है। उन्होंने मदरसों को बंद करने की पैरोकारी की। गौरतलब है कि तसलीमा दशकों से धार्मिक रूढ़िवाद के विरुद्ध लेखन के कारण विवादों में रही हैं और फिलहाल भारत में निवासरत हैं।
BJP नेताओं की प्रतिक्रिया
उत्तर प्रदेश सरकार में मंत्री दयाशंकर सिंह ने कहा कि यह पूरी तरह तसलीमा की निजी राय है। उन्होंने कहा, 'तसलीमा एक लेखिका हैं और समय-समय पर विभिन्न मुद्दों पर अपनी राय व्यक्त करती रहती हैं, उनके विचारों को उसी संदर्भ में देखा जाना चाहिए।'
BJP विधायक नंदकिशोर गुर्जर ने कहा कि उत्तर प्रदेश, उत्तराखंड और असम जैसे BJP-शासित राज्यों में मदरसा सुधार पर लगातार कार्रवाई हो रही है। उन्होंने माँग की कि मदरसों को नियमित विद्यालयों में परिवर्तित किया जाए, जहाँ उत्तर प्रदेश बोर्ड या केंद्रीय माध्यमिक शिक्षा बोर्ड (CBSE) के पाठ्यक्रम के अनुसार आधुनिक और तकनीकी शिक्षा दी जाए।
BJP सांसद योगेंद्र चंदोलिया ने दावा किया कि 2014 के बाद देश में बदलाव की लहर आई है और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में ईमानदार शासन स्थापित हुआ है। उन्होंने आरोप लगाया कि मदरसों से आतंकवादी निकलते हैं और इसलिए उन्हें पूर्णतः बंद किया जाना चाहिए — हालाँकि उन्होंने इस दावे के समर्थन में कोई आधिकारिक आँकड़ा प्रस्तुत नहीं किया।
BJP सांसद समिक भट्टाचार्य ने इसे तसलीमा की व्यक्तिगत राय बताते हुए एक ऐतिहासिक सन्दर्भ जोड़ा। उन्होंने कहा कि पश्चिम बंगाल के पूर्व मुख्यमंत्री बुद्धदेव भट्टाचार्य ने भी इसी तरह के विचार व्यक्त किए थे, लेकिन तत्कालीन माकपा नेतृत्व ने उन्हें नजरअंदाज किया। उन्होंने यह भी कहा कि तसलीमा नसरीन के चर्चित उपन्यास 'लज्जा' पर प्रतिबंध लगाने की कोशिश बुद्धदेव भट्टाचार्य ने ही की थी। भट्टाचार्य ने यह भी कहा कि मोदी सरकार के कारण ही तसलीमा आज भारत में रह पा रही हैं।
मुस्लिम धर्मगुरुओं का विरोध
ऑल इंडिया मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड के सदस्य मौलाना खालिद रशीद फरंगी महली ने तसलीमा के बयान पर कड़ी आपत्ति जताई। उन्होंने कहा, 'किसी दूसरे देश से आकर भारत के मदरसों पर इतने गंभीर आरोप लगाना बेहद दुखद है। जिसने भी इस तरह के बयान दिए हैं, उसके खिलाफ कानून के तहत सख्त कार्रवाई होनी चाहिए।' उन्होंने स्पष्ट किया कि देश के मदरसों में कुरान और हदीस की शिक्षा दी जाती है, जिनका मूल संदेश इंसानियत, शांति और नैतिक मूल्यों पर आधारित है। उनके अनुसार, मदरसों पर लगाए जा रहे ये आरोप तथ्यहीन हैं और समाज में गलत संदेश फैलाते हैं।
व्यापक संदर्भ और विवाद की पृष्ठभूमि
यह विवाद ऐसे समय में उभरा है जब मदरसा शिक्षा को लेकर देश में पहले से ही नीतिगत बहस जारी है। उत्तर प्रदेश सहित कई राज्यों में मदरसा सर्वेक्षण और पाठ्यक्रम सुधार को लेकर सरकारी कदम उठाए जा चुके हैं। आलोचकों का कहना है कि इस तरह के बयान शिक्षा-सुधार की बहस को सांप्रदायिक रंग दे सकते हैं।
आगे क्या होगा
मुस्लिम धर्मगुरुओं द्वारा कानूनी कार्रवाई की माँग के बाद अब यह देखना होगा कि संबंधित अधिकारी इस पर क्या रुख अपनाते हैं। राजनीतिक प्रतिक्रियाओं का यह सिलसिला मदरसा सुधार की राष्ट्रीय बहस को और गहरा कर सकता है।