तमिलनाडु विधानसभा में विजय का 'फिल्मी अंदाज': DMK ने बताया सदन की गरिमा के खिलाफ
सारांश
मुख्य बातें
तमिलनाडु विधानसभा में 24 जून 2026 को उस समय विवाद खड़ा हो गया जब एक्टर से मुख्यमंत्री बने सी. जोसेफ विजय ने सदन में 'शॉर्ट स्टोरी' सुनाने और पंच-डायलॉग शैली में बयानबाजी करने के बाद नाटकीय ढंग से हाथ काटने का इशारा किया — एक भाव-भंगिमा जो उनके परदे के किरदारों की स्पष्ट याद दिलाती है। विपक्षी दल द्रविड़ मुनेत्र कषगम (DMK) ने इसे विधानसभा की गरिमा के विरुद्ध करार दिया और आरोप लगाया कि मुख्यमंत्री सदन को 'स्क्रिप्टेड परफॉर्मेंस' का मंच बना रहे हैं।
मुख्य घटनाक्रम
विधानसभा सत्र के दौरान मुख्यमंत्री विजय ने स्पीकर जेसीडी प्रभाकर से अनुमति लेकर सदन को संबोधित किया। उनके भाषण का लहजा और अंदाज — छोटी कहानी सुनाना, पंच-डायलॉग देना और अंत में हाथ काटने का नाटकीय इशारा — विधायी परंपराओं से भिन्न था और इसी ने विवाद को जन्म दिया।
DMK नेताओं ने तर्क दिया कि विधानसभा नीति-निर्माण और जवाबदेही का मंच है, न कि सिनेमाई प्रदर्शन का। उनके अनुसार, शासन से जुड़े ठोस मुद्दों पर बहस के बजाय इस तरह का 'स्क्रिप्टेड' व्यवहार सदन की मर्यादा को ठेस पहुँचाता है।
DMK की प्रतिक्रिया
पूर्व मुख्यमंत्री और DMK नेता एमके स्टालिन ने विजय की इस शैली की सबसे मुखर आलोचना की। उन्होंने कहा कि मुख्यमंत्री कामकाजी मुद्दों पर ध्यान देने के बजाय 'स्क्रिप्टेड एक्टिंग' कर रहे हैं। पूर्व उपमुख्यमंत्री और स्टालिन के पुत्र उदयनिधि स्टालिन ने भी इस आलोचना में अपनी आवाज़ मिलाई और आरोप लगाया कि विजय ने सदन को 'फिल्म सेट' में तब्दील कर दिया है।
DMK ने स्पष्ट किया कि उनका विरोध विजय की फिल्मी पृष्ठभूमि से नहीं, बल्कि विधायी कार्यवाही में उस पहचान को आगे बढ़ाने से है।
तमिलनाडु की राजनीति में फिल्मी परंपरा
तमिलनाडु में अभिनेताओं के राजनीति में आने और अपनी ऑन-स्क्रीन छवि को राजनीतिक पूँजी में बदलने का एक सुदीर्घ इतिहास रहा है। एमजी रामचंद्रन (MGR) और जे. जयललिता से लेकर विजयकांत तक, फिल्मी पहचान और राजनीतिक करिश्मे के बीच की रेखा प्रायः धुंधली रही है।
यह ऐसे समय में आया है जब विजय की पार्टी तमिलगा वेट्री कड़गम (TVK) राज्य की सत्ता पर काबिज़ है और उनकी सरकार को विपक्ष की कड़ी निगरानी का सामना करना पड़ रहा है। गौरतलब है कि भारतीय विधानसभाओं में ऐसे प्रसंग पहले भी आए हैं — कर्नाटक में विधायकों द्वारा बहस के दौरान गाने गाने और सांकेतिक हरकतें करने की घटनाएँ दर्ज हैं, जबकि शिवसेना के विधायकों ने खास वेशभूषा में नाटकीय विरोध प्रदर्शन किए थे।
व्यापक संदर्भ
विशेषज्ञों का कहना है कि अधिकांश अभिनेता-सांसद और अभिनेता-विधायक, संसद और विधानसभाओं में, अपने परदे के किरदारों की तुलना में कहीं अधिक संयमित रहे हैं। इस दृष्टि से विजय का यह प्रसंग अपवाद के रूप में उभरता है।
यह विवाद उस बड़े सवाल को फिर से उठाता है कि क्या लोकप्रिय संस्कृति से आए नेताओं को विधायी मंच पर अपनी मनोरंजन-जगत की पहचान से पूरी तरह अलग होना चाहिए। आने वाले सत्रों में यह बहस और तीखी हो सकती है।