केरल: आदिवासी ज्ञान अब वन संरक्षण नीति का हिस्सा, थेक्कडी में वन मंत्री का ऐलान
सारांश
मुख्य बातें
केरल के वन एवं वन्यजीव मंत्री शिबू बेबी जॉन ने 11 अगस्त को थेक्कडी में मन्नन और पलियान आदिवासी बस्तियों के निवासियों से सीधी बातचीत करते हुए घोषणा की कि राज्य सरकार आदिवासी समुदायों के पारंपरिक वन-ज्ञान को संरक्षण नीति और इको-टूरिज्म पहलों में औपचारिक रूप से शामिल करेगी। यह पहल वन विभाग के 'ओरुणारवु' आउटरीच कार्यक्रम के तहत की गई, जो मानव-वन्यजीव टकराव की बढ़ती चुनौती से निपटने की व्यापक रणनीति का हिस्सा है।
पारंपरिक ज्ञान का दस्तावेज़ीकरण और संरक्षण
मंत्री जॉन ने स्पष्ट किया कि पीढ़ियों से जंगलों के साथ जीवन बिताने वाले आदिवासी समुदायों के पास जो वन-ज्ञान है, वह धीरे-धीरे लुप्त होता जा रहा है। उन्होंने कहा, "आदिवासी समुदायों से बेहतर जंगल को कोई नहीं जानता। उनके ज्ञान का इस्तेमाल इंसान और वन्यजीवों के बीच टकराव को कम करने और जंगल के संरक्षण के लिए किया जाएगा।" इस ज्ञान को व्यवस्थित रूप से दर्ज करने और संरक्षण कार्यों में उपयोग करने की योजना बनाई गई है।
इको-टूरिज्म और रोज़गार की नई राह
राज्य सरकार कुमिली में इको-टूरिज्म विकास के लिए केंद्र सरकार को ₹50 करोड़ का प्रस्ताव भेजेगी, जिसमें लंबे समय से रुके टाइगर म्यूजियम को पुनः चालू करने के लिए ₹20 करोड़ भी शामिल हैं। इन परियोजनाओं को इस तरह तैयार किया जाएगा कि पर्यटन से होने वाली आय का बड़ा हिस्सा सीधे आदिवासी परिवारों तक पहुँचे। आदिवासी युवाओं को वन-संबंधी गतिविधियों और इको-टूरिज्म परियोजनाओं में रोज़गार देने की भी व्यवस्था होगी।
वन्यजीव बोर्ड में पहली बार आदिवासी प्रतिनिधित्व
संरक्षण नीति में आदिवासी भागीदारी की दिशा में एक ऐतिहासिक कदम उठाते हुए, मुख्यमंत्री की अध्यक्षता वाले राज्य वन्यजीव बोर्ड में पहली बार आदिवासी प्रतिनिधियों को स्थान दिया गया है। मन्नन समुदाय के रमन राजा मन्नन और निलंबूर के चोलनाइकन समुदाय के विनोद को बोर्ड में शामिल किया गया है। यह कदम नीति-निर्माण में जमीनी आवाज़ों को जगह देने की दिशा में महत्वपूर्ण माना जा रहा है।
थेक्कडी मॉडल: ज़मीनी नतीजे
थेक्कडी में इको-डेवलपमेंट कमेटियों (EDC) का अनुभव पहले से ही एक कारगर मॉडल पेश करता है। विभिन्न EDC के माध्यम से लगभग 200 लोगों को अस्थायी रोज़गार मिला है और 43 लोगों को वॉचर के रूप में स्थायी नियुक्ति दी गई है। समुदाय के प्रतिनिधियों के अनुसार, जहाँ EDC सक्रिय हैं वहाँ मानव-वन्यजीव टकराव में कमी आई है और बिचौलियों द्वारा शोषण भी काफी हद तक घटा है।
प्रभावित समुदाय और उनकी ऐतिहासिक पृष्ठभूमि
इन बस्तियों में मन्नन समुदाय के 357 परिवारों के 1,266 लोग और पलियान समुदाय के 164 परिवारों के 450 लोग निवास करते हैं। गौरतलब है कि मन्नन समुदाय को 1930 और 1940 के दशक में पेरियार टाइगर रिज़र्व के भीतरी क्षेत्रों से विस्थापित किया गया था। पलियान समुदाय, जिसकी तमिल सांस्कृतिक जड़ें गहरी हैं, परंपरागत रूप से शहद संग्रह, मत्स्य पालन और काली मिर्च की खेती पर निर्भर रहा है। सरकार अब उनकी इसी गहरी वन-समझ को संरक्षण के औज़ार और आजीविका के स्रोत में बदलना चाहती है।
बुनियादी सुविधाएँ और अधिकार-आधारित दृष्टिकोण
मंत्री ने यह भी बताया कि सरकारी अधिकारी विभिन्न आदिवासी बस्तियों का दौरा कर पेयजल की कमी, खराब सड़कें और स्ट्रीट लाइटिंग की अनुपस्थिति जैसी बुनियादी समस्याओं को चिह्नित कर उनका समाधान करेंगे। जहाँ बाँस की कमी के कारण पारंपरिक राफ्ट बनाना मुश्किल हो गया है, वहाँ मछुआरों की EDC को फाइबर नावें देने पर भी विचार किया जाएगा। जॉन ने स्पष्ट किया, "उनकी माँगें दान नहीं हैं; ये उनके अधिकार हैं।" यह बयान आदिवासी कल्याण को परोपकार की बजाय संवैधानिक अधिकार के रूप में देखने की सोच का संकेत है। आने वाले समय में यह मॉडल केरल की वन नीति की दिशा तय कर सकता है।