'वंदे मातरम' बिल पर उज्जैन के संतों की मुहर, अपमान को राष्ट्रद्रोह जैसा अपराध मानने की माँग
सारांश
मुख्य बातें
उज्जैन के प्रमुख संतों ने संसद के आगामी सत्र में प्रस्तावित 'वंदे मातरम' विधेयक का खुलकर स्वागत किया है और राष्ट्रीय प्रतीकों के अपमान को राष्ट्रद्रोह के समकक्ष गंभीर अपराध घोषित करने की माँग की है। दादूराम आश्रम के महामंडलेश्वर ज्ञान दास महाराज और जूना अखाड़े के महामंडलेश्वर शैलेशानंद गिरी महाराज ने 17 जुलाई को यह बात कही। दोनों संतों ने दोषियों के विरुद्ध कठोर दंड और चरम मामलों में नागरिकता रद्द करने तक के प्रावधान की वकालत की।
संतों ने क्या कहा
महामंडलेश्वर ज्ञान दास महाराज ने कहा कि 20 जुलाई से शुरू होने वाले विधानसभा सत्र में सरकार जो कड़ा विधेयक लाने जा रही है, वह 'स्वागत योग्य कदम' है। उन्होंने कहा, 'अधिकांश लोग राष्ट्रगान और राष्ट्रीय गीत का सम्मान करते हैं, लेकिन कुछ लोग जानबूझकर उनका अपमान करते हैं, जो राष्ट्रहित के खिलाफ है।' उन्होंने जोड़ा कि राष्ट्र के सम्मान की रक्षा के लिए कठोर कानून की आवश्यकता लंबे समय से महसूस की जा रही थी और यह कानून पूरे देश में लागू होना चाहिए।
ऐतिहासिक संदर्भ और कानूनी पृष्ठभूमि
महामंडलेश्वर शैलेशानंद गिरी महाराज ने याद दिलाया कि वर्ष 1971 में राष्ट्रीय सम्मान के संरक्षण के लिए कानून बनाया गया था, जिसमें राष्ट्रीय ध्वज के अपमान को दंडनीय अपराध घोषित किया गया था। उन्होंने कहा कि उस समय भी कई लोगों ने सुझाव दिया था कि 'वंदे मातरम' को भी इसी दायरे में शामिल किया जाए। वर्तमान में राष्ट्रीय ध्वज के अपमान पर तीन वर्ष तक की सजा, जुर्माना या दोनों का प्रावधान है, लेकिन उनका कहना है कि बदलते समय में इन दंडों को और कठोर बनाना ज़रूरी है।
राष्ट्रीय प्रतीकों के प्रति बढ़ती अनुशासनहीनता पर चिंता
शैलेशानंद गिरी महाराज ने कहा कि दुनिया के लगभग सभी देशों ने अपने राष्ट्रीय प्रतीकों की रक्षा के लिए सख्त कानून बनाए हैं और भारत में भी इसे सर्वोच्च प्राथमिकता मिलनी चाहिए। उन्होंने कहा कि 'कुछ अलगाववादी और फिरकापरस्त तत्वों के बीच राष्ट्रीय प्रतीकों के प्रति अनुशासनहीनता बढ़ती दिखाई देती है, जिसे गंभीरता से लिया जाना चाहिए।' उनके अनुसार, राष्ट्रीय ध्वज, राष्ट्रगान या राष्ट्रीय गीत के अपमान को राष्ट्रद्रोह के समान अपराध माना जाए।
'वंदे मातरम' का ऐतिहासिक महत्व
संतों ने इस बात पर भी ज़ोर दिया कि 'वंदे मातरम' भारत के स्वतंत्रता संग्राम की प्रेरणा का गीत रहा है और भारत माता के प्रति श्रद्धा एवं राष्ट्रभक्ति का प्रतीक है। गौरतलब है कि यह गीत बंकिमचंद्र चट्टोपाध्याय द्वारा रचित उपन्यास 'आनंदमठ' से लिया गया है और स्वतंत्रता आंदोलन के दौरान जन-जागरण का माध्यम बना था। यह ऐसे समय में आया है जब राष्ट्रीय प्रतीकों के प्रति सम्मान को लेकर सार्वजनिक बहस तेज़ हो रही है।
आगे की राह
संतों की माँग है कि प्रस्तावित विधेयक में राष्ट्रीय प्रतीकों के अपमान पर कड़ी कानूनी कार्रवाई के साथ-साथ नागरिकता रद्द करने जैसे प्रावधान भी शामिल किए जाएँ। 20 जुलाई से शुरू होने वाले सत्र में इस विधेयक पर होने वाली चर्चा और सरकार का रुख स्पष्ट होगा। धार्मिक और सामाजिक संगठनों की यह सक्रिय भागीदारी विधेयक को जन-समर्थन की दृष्टि से महत्वपूर्ण संकेत देती है।