17 जुलाई 2026
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'वंदे मातरम' बिल पर उज्जैन के संतों की मुहर, अपमान को राष्ट्रद्रोह जैसा अपराध मानने की माँग

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'वंदे मातरम' बिल पर उज्जैन के संतों की मुहर, अपमान को राष्ट्रद्रोह जैसा अपराध मानने की माँग

सारांश

'वंदे मातरम' विधेयक को उज्जैन के प्रमुख संतों का समर्थन मिला है। महामंडलेश्वर ज्ञान दास और शैलेशानंद गिरी ने राष्ट्रीय प्रतीकों के अपमान को राष्ट्रद्रोह के बराबर मानने और नागरिकता रद्द करने तक की माँग की। 20 जुलाई से शुरू सत्र में विधेयक पेश होने की संभावना है।

मुख्य बातें

उज्जैन के संतों ने संसद के आगामी सत्र में प्रस्तावित 'वंदे मातरम' विधेयक का स्वागत किया।
दादूराम आश्रम के महामंडलेश्वर ज्ञान दास महाराज और जूना अखाड़े के शैलेशानंद गिरी महाराज ने राष्ट्रीय प्रतीकों के अपमान को राष्ट्रद्रोह समान अपराध मानने की माँग की।
वर्तमान में राष्ट्रीय ध्वज अपमान पर तीन वर्ष तक की सजा का प्रावधान है; संतों ने इसे और कठोर बनाने की वकालत की।
संतों ने चरम मामलों में दोषियों की नागरिकता रद्द करने जैसे कड़े कदमों की माँग की।
विधेयक पर चर्चा 20 जुलाई से शुरू होने वाले विधानसभा सत्र में अपेक्षित है।
वर्ष 1971 के राष्ट्रीय सम्मान संरक्षण कानून में 'वंदे मातरम' को शामिल न किए जाने की कमी को अब दूर करने की बात कही गई।

उज्जैन के प्रमुख संतों ने संसद के आगामी सत्र में प्रस्तावित 'वंदे मातरम' विधेयक का खुलकर स्वागत किया है और राष्ट्रीय प्रतीकों के अपमान को राष्ट्रद्रोह के समकक्ष गंभीर अपराध घोषित करने की माँग की है। दादूराम आश्रम के महामंडलेश्वर ज्ञान दास महाराज और जूना अखाड़े के महामंडलेश्वर शैलेशानंद गिरी महाराज ने 17 जुलाई को यह बात कही। दोनों संतों ने दोषियों के विरुद्ध कठोर दंड और चरम मामलों में नागरिकता रद्द करने तक के प्रावधान की वकालत की।

संतों ने क्या कहा

महामंडलेश्वर ज्ञान दास महाराज ने कहा कि 20 जुलाई से शुरू होने वाले विधानसभा सत्र में सरकार जो कड़ा विधेयक लाने जा रही है, वह 'स्वागत योग्य कदम' है। उन्होंने कहा, 'अधिकांश लोग राष्ट्रगान और राष्ट्रीय गीत का सम्मान करते हैं, लेकिन कुछ लोग जानबूझकर उनका अपमान करते हैं, जो राष्ट्रहित के खिलाफ है।' उन्होंने जोड़ा कि राष्ट्र के सम्मान की रक्षा के लिए कठोर कानून की आवश्यकता लंबे समय से महसूस की जा रही थी और यह कानून पूरे देश में लागू होना चाहिए।

ऐतिहासिक संदर्भ और कानूनी पृष्ठभूमि

महामंडलेश्वर शैलेशानंद गिरी महाराज ने याद दिलाया कि वर्ष 1971 में राष्ट्रीय सम्मान के संरक्षण के लिए कानून बनाया गया था, जिसमें राष्ट्रीय ध्वज के अपमान को दंडनीय अपराध घोषित किया गया था। उन्होंने कहा कि उस समय भी कई लोगों ने सुझाव दिया था कि 'वंदे मातरम' को भी इसी दायरे में शामिल किया जाए। वर्तमान में राष्ट्रीय ध्वज के अपमान पर तीन वर्ष तक की सजा, जुर्माना या दोनों का प्रावधान है, लेकिन उनका कहना है कि बदलते समय में इन दंडों को और कठोर बनाना ज़रूरी है।

राष्ट्रीय प्रतीकों के प्रति बढ़ती अनुशासनहीनता पर चिंता

शैलेशानंद गिरी महाराज ने कहा कि दुनिया के लगभग सभी देशों ने अपने राष्ट्रीय प्रतीकों की रक्षा के लिए सख्त कानून बनाए हैं और भारत में भी इसे सर्वोच्च प्राथमिकता मिलनी चाहिए। उन्होंने कहा कि 'कुछ अलगाववादी और फिरकापरस्त तत्वों के बीच राष्ट्रीय प्रतीकों के प्रति अनुशासनहीनता बढ़ती दिखाई देती है, जिसे गंभीरता से लिया जाना चाहिए।' उनके अनुसार, राष्ट्रीय ध्वज, राष्ट्रगान या राष्ट्रीय गीत के अपमान को राष्ट्रद्रोह के समान अपराध माना जाए।

'वंदे मातरम' का ऐतिहासिक महत्व

संतों ने इस बात पर भी ज़ोर दिया कि 'वंदे मातरम' भारत के स्वतंत्रता संग्राम की प्रेरणा का गीत रहा है और भारत माता के प्रति श्रद्धा एवं राष्ट्रभक्ति का प्रतीक है। गौरतलब है कि यह गीत बंकिमचंद्र चट्टोपाध्याय द्वारा रचित उपन्यास 'आनंदमठ' से लिया गया है और स्वतंत्रता आंदोलन के दौरान जन-जागरण का माध्यम बना था। यह ऐसे समय में आया है जब राष्ट्रीय प्रतीकों के प्रति सम्मान को लेकर सार्वजनिक बहस तेज़ हो रही है।

आगे की राह

संतों की माँग है कि प्रस्तावित विधेयक में राष्ट्रीय प्रतीकों के अपमान पर कड़ी कानूनी कार्रवाई के साथ-साथ नागरिकता रद्द करने जैसे प्रावधान भी शामिल किए जाएँ। 20 जुलाई से शुरू होने वाले सत्र में इस विधेयक पर होने वाली चर्चा और सरकार का रुख स्पष्ट होगा। धार्मिक और सामाजिक संगठनों की यह सक्रिय भागीदारी विधेयक को जन-समर्थन की दृष्टि से महत्वपूर्ण संकेत देती है।

संपादकीय दृष्टिकोण

लेकिन असली सवाल यह है कि 'अपमान' की कानूनी परिभाषा कितनी स्पष्ट और न्यायसंगत होगी — क्योंकि अस्पष्ट परिभाषाएँ अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता पर अंकुश का जोखिम उठाती हैं। नागरिकता रद्द करने जैसी माँगें संवैधानिक जटिलताएँ खड़ी करती हैं, जिन पर विधि विशेषज्ञों में पहले से मतभेद है। 1971 के कानून में ध्वज-अपमान की धाराएँ दशकों से मौजूद हैं, फिर भी उनका प्रभावी क्रियान्वयन सवालों के घेरे में रहा है — नया विधेयक इस खामी को कैसे दूर करेगा, यह देखना होगा।
RashtraPress
17 जुलाई 2026

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

'वंदे मातरम' विधेयक क्या है?
यह संसद के आगामी सत्र में प्रस्तावित एक विधेयक है जिसका उद्देश्य 'वंदे मातरम' सहित राष्ट्रीय प्रतीकों के अपमान पर कड़े कानूनी प्रावधान लागू करना है। इसे 20 जुलाई से शुरू होने वाले विधानसभा सत्र में पेश किए जाने की संभावना है।
उज्जैन के संतों ने इस विधेयक पर क्या कहा?
दादूराम आश्रम के महामंडलेश्वर ज्ञान दास महाराज और जूना अखाड़े के महामंडलेश्वर शैलेशानंद गिरी महाराज ने विधेयक का स्वागत किया और राष्ट्रीय प्रतीकों के अपमान को राष्ट्रद्रोह के समान गंभीर अपराध मानने की माँग की। उन्होंने चरम मामलों में नागरिकता रद्द करने का भी सुझाव दिया।
वर्तमान में राष्ट्रीय प्रतीकों के अपमान पर क्या सजा है?
वर्ष 1971 के राष्ट्रीय सम्मान संरक्षण कानून के तहत राष्ट्रीय ध्वज के अपमान पर तीन वर्ष तक की सजा, जुर्माना या दोनों का प्रावधान है। संतों का कहना है कि बदलते समय में यह दंड और कठोर होना चाहिए।
'वंदे मातरम' को 1971 के कानून में क्यों शामिल नहीं किया गया था?
महामंडलेश्वर शैलेशानंद गिरी महाराज के अनुसार, 1971 में कानून बनाते समय कई लोगों ने 'वंदे मातरम' को भी शामिल करने का सुझाव दिया था, लेकिन तब ऐसा नहीं हुआ। अब प्रस्तावित विधेयक इसी कमी को दूर करने की दिशा में एक कदम माना जा रहा है।
यह विधेयक किसे प्रभावित करेगा?
यह विधेयक उन सभी नागरिकों पर लागू होगा जो राष्ट्रीय ध्वज, राष्ट्रगान या 'वंदे मातरम' का जानबूझकर अपमान करते पाए जाएँ। संतों ने विशेष रूप से अलगाववादी और फिरकापरस्त तत्वों के संदर्भ में इस कानून की आवश्यकता बताई है।
राष्ट्र प्रेस
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