उमर खालिद की अंतरिम जमानत याचिका खारिज, चिदंबरम बोले — 'प्रक्रिया ही सजा बन जाती है'

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उमर खालिद की अंतरिम जमानत याचिका खारिज, चिदंबरम बोले — 'प्रक्रिया ही सजा बन जाती है'

सारांश

कड़कड़डूमा कोर्ट ने उमर खालिद को माँ की सर्जरी के लिए भी 15 दिन की अंतरिम जमानत देने से इनकार कर दिया। पूर्व वित्त मंत्री चिदंबरम ने एक्स पर न्यायमूर्ति कृष्ण अय्यर के सिद्धांत का हवाला देते हुए ट्रायल कोर्ट की कार्यशैली पर सवाल उठाए और कहा — 'प्रक्रिया ही सजा बन जाती है।'

मुख्य बातें

कड़कड़डूमा कोर्ट ने 20 मई 2025 को उमर खालिद की 15 दिनों की अंतरिम जमानत याचिका खारिज की।
खालिद ने दिवंगत मामा के चेहलुम और बीमार माँ की सर्जरी की देखभाल के लिए राहत माँगी थी।
पूर्व वित्त मंत्री पी.
चिदंबरम ने एक्स पर ट्रायल कोर्ट की आलोचना करते हुए कहा — 'प्रक्रिया ही सजा बन जाती है।' बचाव पक्ष ने सह-आरोपियों तस्लीम अहमद, शिफा उर रहमान और अथर खान को मिली अंतरिम जमानत का हवाला दिया।
विशेष लोक अभियोजक ने कहा कि इस बार दिए गए कारण पर्याप्त नहीं हैं।
खालिद सितंबर 2020 से UAPA के तहत न्यायिक हिरासत में हैं।

नई दिल्ली की कड़कड़डूमा कोर्ट ने 20 मई 2025 को 2020 दिल्ली दंगा साजिश मामले में न्यायिक हिरासत में बंद आरोपी उमर खालिद की 15 दिनों की अंतरिम जमानत याचिका खारिज कर दी। खालिद ने अपने दिवंगत मामा के चेहलुम में शामिल होने और बीमार माँ की शल्य-चिकित्सा से पहले व बाद में देखभाल के लिए यह राहत माँगी थी। इस फैसले पर कांग्रेस नेता और पूर्व वित्त मंत्री पी. चिदंबरम ने तीखी प्रतिक्रिया दी है।

चिदंबरम की प्रतिक्रिया

चिदंबरम ने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म एक्स (पूर्व में ट्विटर) पर लिखा कि उमर खालिद को एक बार फिर जमानत देने से इनकार कर दिया गया — यहाँ तक कि अपनी माँ की निर्धारित मेडिकल प्रक्रिया में सहायता के लिए 15 दिनों की अंतरिम जमानत भी नहीं मिली।

उन्होंने न्यायमूर्ति कृष्ण अय्यर के उस सिद्धांत का उल्लेख किया जो 1977 में स्थापित हुआ था, और कहा कि शायद अब वह केवल कानून की किताबों में ही मिलता है — वास्तविक मामलों और वास्तविक आरोपियों पर लागू नहीं होता। उनके अनुसार ट्रायल कोर्ट यह सोचकर चलती हैं कि 'हम पुलिस की बात मानकर आरोपी को जेल भेज देंगे और आरोपी उच्च न्यायालय तथा सर्वोच्च न्यायालय से जमानत हासिल कर ले।'

चिदंबरम ने इसे 'अपने कर्तव्य से पीछे हटना' करार देते हुए कहा कि यदि ट्रायल कोर्ट अपना काम सही ढंग से करें तो उच्च न्यायालयों और सर्वोच्च न्यायालय पर बोझ काफी कम हो जाएगा। उन्होंने जोड़ा कि हज़ारों अंडरट्रायल कैदी बिना आरोप तय हुए, बिना मुकदमा चले और बिना सजा पाए जेलों में सड़ रहे हैं। उन्होंने अपनी बात इस वाक्य पर समाप्त की — 'प्रक्रिया ही सजा बन जाती है।'

उमर खालिद की दलीलें

खालिद ने अदालत को बताया कि उनके परिवार में 71 वर्षीय पिता, माँ और पाँच बहनें हैं। उनके पिता माँ की देखभाल करने की स्थिति में नहीं हैं और चार बहनें विवाहित होकर अलग-अलग स्थानों पर रहती हैं। परिवार के सबसे बड़े और इकलौते बेटे होने के नाते वे ही माँ की सर्जरी से पहले और बाद में देखभाल कर सकते हैं।

बचाव पक्ष ने यह भी तर्क दिया कि खालिद को पूर्व में कई बार अंतरिम जमानत मिल चुकी है और हर बार उन्होंने अदालत की सभी शर्तों का पालन करते हुए समय पर आत्मसमर्पण किया। साथ ही बचाव पक्ष ने सह-आरोपी तस्लीम अहमद, शिफा उर रहमान और अथर खान को पारिवारिक बीमारी के आधार पर मिली अंतरिम जमानत का हवाला देते हुए समानता के सिद्धांत पर राहत माँगी।

अभियोजन पक्ष का रुख

विशेष लोक अभियोजक ने जमानत याचिका का विरोध किया। उनका कहना था कि आरोपी अदालत की नरमी का गलत फायदा उठा रहा है और इस बार दिए गए कारण पर्याप्त नहीं हैं। अभियोजन ने स्पष्ट किया कि पूर्व में जो आधार उचित माने गए थे, वे इस याचिका पर लागू नहीं होते।

मामले की पृष्ठभूमि

उमर खालिद 2020 दिल्ली दंगा साजिश मामले में सितंबर 2020 से न्यायिक हिरासत में हैं। यह मामला गैरकानूनी गतिविधि (रोकथाम) अधिनियम (UAPA) के तहत दर्ज है, जिसके चलते जमानत की प्रक्रिया सामान्य मामलों की तुलना में काफी कठिन हो जाती है। गौरतलब है कि यह ऐसे समय में आया है जब देश में अंडरट्रायल कैदियों की संख्या और न्यायिक विलंब को लेकर व्यापक बहस जारी है।

आगे क्या होगा

बचाव पक्ष अब दिल्ली उच्च न्यायालय का दरवाज़ा खटखटा सकता है। उमर खालिद की नियमित जमानत याचिका पर सुनवाई अलग से जारी है। इस फैसले ने एक बार फिर UAPA के तहत जमानत के मानदंडों और अंडरट्रायल कैदियों के अधिकारों पर राष्ट्रीय बहस को हवा दी है।

संपादकीय दृष्टिकोण

बल्कि UAPA जैसे कठोर कानूनों के तहत न्यायिक प्रक्रिया की धीमी गति का प्रतीक बन चुका है — जहाँ सुनवाई वर्षों तक खिंचती है और ज़मानत अपवाद बन जाती है। चिदंबरम का न्यायमूर्ति कृष्ण अय्यर के सिद्धांत का संदर्भ सटीक है, लेकिन यह भी उतना ही सच है कि UAPA की धारा 43D(5) ट्रायल कोर्ट के हाथ काफी हद तक बाँध देती है। असली सवाल यह है कि जब मामले वर्षों तक अनिर्णीत रहते हैं, तो क्या कानून की मंशा न्याय है या नियंत्रण — और इस पर संसद और न्यायपालिका दोनों को जवाब देना होगा।
RashtraPress
21 मई 2026

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

उमर खालिद की अंतरिम जमानत याचिका क्यों खारिज हुई?
कड़कड़डूमा कोर्ट ने 20 मई 2025 को यह याचिका खारिज करते हुए कहा कि इस बार दिए गए कारण पर्याप्त नहीं हैं। विशेष लोक अभियोजक ने तर्क दिया कि आरोपी अदालत की नरमी का गलत फायदा उठा रहा है।
उमर खालिद किस मामले में जेल में हैं?
उमर खालिद सितंबर 2020 से 2020 दिल्ली दंगा साजिश मामले में UAPA (गैरकानूनी गतिविधि रोकथाम अधिनियम) के तहत न्यायिक हिरासत में हैं। यह मामला फरवरी 2020 में हुए उत्तर-पूर्वी दिल्ली दंगों से जुड़ा है।
चिदंबरम ने 'प्रक्रिया ही सजा बन जाती है' क्यों कहा?
पूर्व वित्त मंत्री पी. चिदंबरम ने एक्स पर लिखा कि ट्रायल कोर्ट पुलिस की बात मानकर आरोपी को जेल भेज देती हैं और उच्च अदालतों पर बोझ डाल देती हैं। उनका कहना था कि इससे हज़ारों अंडरट्रायल कैदी बिना मुकदमा चले जेलों में रहते हैं — यही स्थिति 'प्रक्रिया को सजा' बना देती है।
बचाव पक्ष ने समानता के आधार पर क्या तर्क दिया?
बचाव पक्ष ने तर्क दिया कि सह-आरोपी तस्लीम अहमद, शिफा उर रहमान और अथर खान को पारिवारिक बीमारी के आधार पर अंतरिम जमानत मिल चुकी है। इसलिए समानता के सिद्धांत पर उमर खालिद को भी यही राहत मिलनी चाहिए।
अब उमर खालिद के पास क्या कानूनी विकल्प हैं?
ट्रायल कोर्ट द्वारा याचिका खारिज होने के बाद बचाव पक्ष दिल्ली उच्च न्यायालय का रुख कर सकता है। उनकी नियमित जमानत याचिका पर सुनवाई अलग से जारी है।
राष्ट्र प्रेस
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