विजयवाड़ा: यूनियन बैंक के साथ ₹24.81 करोड़ की कथित धोखाधड़ी, सीबीआई ने कंपनी व 4 डायरेक्टरों पर केस दर्ज किया
सारांश
मुख्य बातें
केंद्रीय जाँच ब्यूरो (सीबीआई) की विशाखापत्तनम इकाई ने यूनियन बैंक ऑफ इंडिया के साथ कथित तौर पर ₹24.81 करोड़ की धोखाधड़ी के मामले में विजयवाड़ा की एक निजी कंपनी, उसके चार डायरेक्टरों और अज्ञात सरकारी कर्मचारियों सहित अन्य व्यक्तियों के विरुद्ध प्राथमिकी (एफआईआर) दर्ज की है। यह मामला फर्जी वित्तीय दस्तावेजों के आधार पर बैंक ऋण हासिल करने और स्टॉक को बढ़ा-चढ़ाकर दिखाने से जुड़ा है।
मुख्य घटनाक्रम
यह एफआईआर 18 अगस्त 2025 को सीबीआई एसीबी विशाखापत्तनम में दर्ज की गई। शिकायत यूनियन बैंक ऑफ इंडिया के जोनल ऑफिस, विजयवाड़ा के असिस्टेंट जनरल मैनेजर चिनारी श्रीकांत पात्रो ने लिखित रूप में दी थी।
एफआईआर में पहला आरोपी मेसर्स ओमकारा विजयलक्ष्मी स्ट्रिप्स प्राइवेट लिमिटेड को बनाया गया है। कंपनी के डायरेक्टर — कोटा भानु प्रसाद, कोटा श्रावणी, कोटा पृथ्वी वेंकट तेजा और कोटा राहुल साई बालाजी — क्रमशः दूसरे से पाँचवें नंबर के आरोपी हैं। इसके अलावा अज्ञात सरकारी कर्मचारियों और निजी व्यक्तियों को भी आरोपी बनाया गया है।
धोखाधड़ी का तरीका
2017 में स्थापित यह कंपनी इलेक्ट्रॉनिक रेजिस्टेंस वेल्डेड (ईआरडब्ल्यू) गैल्वेनाइज्ड पाइप और अन्य स्टील उत्पादों के निर्माण में संलग्न थी। एफआईआर के अनुसार, 2024 में कंपनी के डायरेक्टरों ने अज्ञात सरकारी कर्मचारियों और निजी व्यक्तियों के साथ मिलकर आपराधिक षड्यंत्र रचा।
आरोप है कि उन्होंने गलत वित्तीय विवरण और जाली दस्तावेज प्रस्तुत कर करूर वैश्य बैंक से अपना ऋण यूनियन बैंक ऑफ इंडिया की सूर्यरावपेटा शाखा, विजयवाड़ा में स्थानांतरित करवाया। इन दस्तावेजों के आधार पर बैंक ने 22 फरवरी 2024 को ₹24.98 करोड़ की फंड-बेस्ड और नॉन-फंड-बेस्ड क्रेडिट सुविधाएँ स्वीकृत कर दीं।
एफआईआर के अनुसार, उधारकर्ताओं ने प्राथमिक सुरक्षा के रूप में स्टॉक, बुक डेट्स और प्लांट व मशीनरी, तथा संपार्श्विक (कोलैटरल) सुरक्षा के रूप में अचल संपत्तियाँ गिरवी रखी थीं।
स्टॉक में भारी गड़बड़ी उजागर
17 मई 2025 को ₹24 करोड़ की वर्किंग कैपिटल लिमिट नवीनीकृत की गई। इसके बाद यूनिट के निरीक्षण में घोषित स्टॉक और वास्तविक स्टॉक के बीच बड़ा अंतर सामने आया। उधारकर्ता ने ₹23.85 करोड़ के स्टॉक का दावा किया था, जबकि वास्तविक स्टॉक का मूल्य मात्र ₹25 लाख के आसपास पाया गया और बिक्री या टर्नओवर का कोई प्रमाण नहीं मिला।
गौरतलब है कि 28 मई 2025 के स्टॉक स्टेटमेंट में ₹23.86 करोड़ का स्टॉक दर्शाया गया था, लेकिन 27 जून 2025 को ऑडिट के दौरान वास्तविक स्टॉक पुनः मात्र ₹25 लाख के आसपास मिला। इसके अलावा, उधारकर्ता ने बुक डेट्स के लिए आवश्यक दस्तावेज और देनदारों की आयु-वार जानकारी भी उपलब्ध नहीं कराई।
अन्य वित्तीय अनियमितताएँ
एफआईआर में यह भी उल्लेख किया गया है कि कंपनी ने टाटा कैपिटल फाइनेंशियल सर्विसेज से प्राप्त ₹2.10 करोड़ के चैनल फाइनेंस की जानकारी बैंक को नहीं दी, जो 'ड्रॉइंग पावर' निर्धारण के लिए अनिवार्य थी।
ऋण स्वीकृति के छह महीने के भीतर ही कंपनी के दो डायरेक्टरों ने अनुमति लिए बिना इस्तीफा दे दिया और बाद में मेसर्स नेरो स्टील्स प्राइवेट लिमिटेड नामक एक नई कंपनी शुरू की, जिस पर केनरा बैंक का ₹6.01 करोड़ का प्रभार (चार्ज) था।
आंतरिक जाँच में यह भी पता चला कि बिक्री आय के अनुपात के बिना ही करूर वैश्य बैंक को बड़ी राशि भेजी गई। एफआईआर में करंट अकाउंट के माध्यम से संदिग्ध लेनदेन, बिना अनुमति डायरेक्टरों और वैधानिक ऑडिटर को बदलने तथा बैंक को सूचित किए बिना यूनिट से स्टॉक हटाने का भी उल्लेख है।
एफआईआर के अनुसार, मारुति ट्रेडर्स के नाम पर बड़े भुगतान किए गए और कुल ₹67.54 करोड़ के क्रेडिट में से ₹32.19 करोड़ का क्रेडिट श्री दुर्गा भवानी स्टील्स के नाम पर दर्ज था। ये दोनों फर्म 2024 में ही गठित की गई थीं और बैंक की जाँच की तिथि तक निष्क्रिय थीं। एफआईआर में प्रथम दृष्टया संकेत दिया गया है कि इन कंपनियों का उपयोग धन की हेराफेरी और कंपनी की साख बढ़ाने के लिए टर्नओवर को कृत्रिम रूप से फुलाने में किया गया।
एनपीए और आगे की कार्रवाई
ब्याज भुगतान न होने के कारण इस ऋण खाते को 23 जून 2025 को अनर्जक आस्ति (एनपीए) घोषित कर दिया गया। उस समय ब्याज सहित लगभग ₹26.05 करोड़ बकाया था। एफआईआर में बैंक को हुए कथित नुकसान की राशि ₹24,81,47,000 दर्ज की गई है, और आरोपियों को इतना ही अनुचित लाभ मिलने का आरोप है।
यह मामला बैंकिंग धोखाधड़ी की उस बड़ी प्रवृत्ति का हिस्सा है जिसमें छोटे और मध्यम उद्यमों के नाम पर ऋण लेकर उसे अन्य माध्यमों से हस्तांतरित कर दिया जाता है। सीबीआई की आगे की जाँच से यह स्पष्ट होगा कि अज्ञात सरकारी कर्मचारियों की इसमें क्या भूमिका रही।