केंद्र ने न्यू मैंगलोर पोर्ट पर बर्थ संख्या 9 के पुनर्विकास को स्वीकृति दी
सारांश
Key Takeaways
- न्यू मैंगलोर पोर्ट पर बर्थ संख्या 9 का पुनर्विकास
- 438.29 करोड़ रुपए की लागत
- 10.90 मिलियन टन प्रति वर्ष की क्षमता
- बड़े जहाजों के लिए गहराई बढ़ाना
- समुद्री लॉजिस्टिक्स में सुधार
नई दिल्ली, 30 मार्च (राष्ट्र प्रेस)। केंद्र सरकार ने न्यू मैंगलोर पोर्ट अथॉरिटी (एनएमपीए) के प्रस्ताव को स्वीकृति प्रदान की है, जिसके अंतर्गत न्यू मैंगलोर पोर्ट पर बर्थ संख्या 9 का पुनर्विकास किया जाएगा। यह कार्य पब्लिक-प्राइवेट पार्टनरशिप (पीपीपी) मॉडल के तहत डीबीएफओटी आधार पर संपन्न होगा। सोमवार को इसकी जानकारी साझा की गई।
पत्तन, पोत परिवहन और जलमार्ग मंत्रालय के अनुसार, इस परियोजना को 25 मार्च 2026 को मंजूरी दी गई। यह कदम भारत के पोर्ट इंफ्रास्ट्रक्चर को सुदृढ़ करने और समुद्री लॉजिस्टिक्स में सुधार की दिशा में एक महत्वपूर्ण प्रयास माना जा रहा है।
इस परियोजना की कुल लागत लगभग 438.29 करोड़ रुपए होगी और इसे एक निजी कंपनी द्वारा विकसित किया जाएगा, जिसे ओपन टेंडर प्रक्रिया से चयनित किया जाएगा।
इस परियोजना की अनुमानित क्षमता 10.90 मिलियन टन प्रति वर्ष (एमटीपीए) होगी। इसके अलावा, इसे संचालित करने वाली कंपनी पहले पांच वर्षों में कम से कम 7.63 एमटीपीए कार्गो हैंडल करने की जिम्मेदारी लेगी। निर्माण कार्य को पूरा होने में लगभग 2 वर्ष लगेंगे, जबकि परियोजना की कुल अवधि 30 वर्ष होगी।
इस योजना के अंतर्गत पुराने ढांचे को हटाकर बर्थ संख्या 9 को पूरी तरह से आधुनिक बनाया जाएगा। यहाँ पर कच्चा तेल, पेट्रोलियम उत्पाद (पीओएल) और एलपीजी जैसे तरल बल्क कार्गो का संचालन किया जाएगा।
मंत्रालय के अनुसार, इस आधुनिकीकरण के तहत बर्थ की गहराई (ड्राफ्ट) को मौजूदा 10.5 मीटर से बढ़ाकर 14 मीटर किया जाएगा और भविष्य में इसे 19.8 मीटर तक बढ़ाने की योजना भी बनाई गई है। इससे पोर्ट पर 2 लाख डीडब्ल्यूटी तक के बड़े जहाज आसानी से आ-जा सकेंगे, जिनमें वेरी लार्ज गैस कैरियर्स (वीएलजीसी) भी शामिल हैं।
पत्तन, पोत परिवहन और जलमार्ग मंत्री सर्बानंद सोणोवाल ने कहा कि यह परियोजना प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में देश के समुद्री इंफ्रास्ट्रक्चर को तेजी से आधुनिक बनाने का एक उदाहरण है।
उन्होंने कहा कि इस परियोजना के जरिए पुराने इंफ्रास्ट्रक्चर को हटाकर आधुनिक सुविधाएं विकसित की जाएंगी, जिससे पोर्ट की क्षमता में वृद्धि होगी और भारत वैश्विक समुद्री व्यापार में अपनी स्थिति मजबूत कर सकेगा।
करीब 50 साल पुराने ढांचे की जगह नई आधुनिक संरचनाएं बनाई जाएंगी, जिनकी उम्र भी लगभग 50 साल होगी। इससे लंबे समय तक स्थिर और टिकाऊ संचालन सुनिश्चित किया जा सकेगा।
नई क्षमता के साथ यह पोर्ट क्षेत्र में बढ़ती ऊर्जा जरूरतों को पूरा करने में सक्षम होगा। बड़े जहाजों की आवाजाही से लॉजिस्टिक्स लागत कम होगी और पोर्ट की प्रतिस्पर्धात्मक क्षमता भी बढ़ेगी।