20 अगस्त 2026
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भारत का $2 ट्रिलियन निर्यात लक्ष्य 2031: वाणिज्य मंत्रालय ने कहा — सिर्फ सुधार नहीं, संरचनात्मक क्रांति ज़रूरी

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भारत का $2 ट्रिलियन निर्यात लक्ष्य 2031: वाणिज्य मंत्रालय ने कहा — सिर्फ सुधार नहीं, संरचनात्मक क्रांति ज़रूरी

सारांश

वाणिज्य मंत्रालय के वरिष्ठ अधिकारी ने साफ़ कहा — $863 अरब से $2 ट्रिलियन का सफर सिर्फ रफ्तार बढ़ाने से नहीं होगा। भारत को 'चीन प्लस वन' की भूमिका से आगे बढ़कर वैश्विक विनिर्माण का अगला बड़ा इंजन बनना होगा — और इसके लिए चाहिए संरचनात्मक क्रांति, न कि महज नीतिगत बदलाव।

मुख्य बातें

वाणिज्य मंत्रालय के अतिरिक्त सचिव यशवीर सिंह ने 20 अगस्त को सीआईआई मैन्युफैक्चरिंग कॉन्क्लेव में वित्त वर्ष 2030-31 तक $2 ट्रिलियन निर्यात लक्ष्य के लिए व्यापक संरचनात्मक बदलाव की ज़रूरत बताई।
भारत का कुल निर्यात 2025-26 में रिकॉर्ड $863 अरब रहा, जो 2014-15 के $468 अरब से काफी अधिक है — लेकिन लक्ष्य तक पहुँचने के लिए यह गति दोगुनी करनी होगी।
सिंह ने कहा कि भारत को 'चीन प्लस वन' से आगे बढ़कर एक विश्वसनीय वैश्विक विनिर्माण साझेदार के रूप में स्थापित होना होगा।
वैश्विक विनिर्माण मूल्यवर्धन में चीन की हिस्सेदारी 1990 के 3% से बढ़कर 2024 में 28% हो गई है।
WTO के 14वें मंत्रिस्तरीय सम्मेलन में मतभेद और अपीलीय निकाय की निष्क्रियता को बहुपक्षीय व्यापार व्यवस्था के संकट के प्रमाण के रूप में उद्धृत किया गया।

वाणिज्य मंत्रालय के अतिरिक्त सचिव यशवीर सिंह ने 20 अगस्त को स्पष्ट किया कि भारत को वित्त वर्ष 2030-31 तक $2 ट्रिलियन के कुल निर्यात लक्ष्य तक पहुँचने के लिए केवल क्रमिक नीतिगत सुधार पर्याप्त नहीं होंगे — विनिर्माण, आपूर्ति शृंखला और निर्यात पारिस्थितिकी तंत्र में व्यापक संरचनात्मक बदलाव अनिवार्य हैं। नई दिल्ली में सीआईआई मैन्युफैक्चरिंग कॉन्क्लेव को संबोधित करते हुए उन्होंने यह भी कहा कि वर्तमान निर्यात गति को दोगुने से अधिक करना होगा।

मौजूदा स्थिति और लक्ष्य का अंतर

यशवीर सिंह ने बताया कि भारत का कुल निर्यात वित्त वर्ष 2025-26 में रिकॉर्ड $863 अरब तक पहुँचा, जबकि वर्ष 2014-15 में यह $468 अरब था। यह वृद्धि उल्लेखनीय है, परंतु $2 ट्रिलियन के लक्ष्य तक पहुँचने के लिए इस रफ्तार को कहीं अधिक तेज़ करना होगा।

उन्होंने कहा, "2030 तक $2 ट्रिलियन के कुल निर्यात का लक्ष्य हासिल करने के लिए हमें अपनी मौजूदा प्रगति से कहीं अधिक तेज़ी लानी होगी। यह केवल क्रमिक सुधारों से संभव नहीं होगा, बल्कि इसके लिए संरचनात्मक परिवर्तन आवश्यक हैं।"

भारत को 'चीन प्लस वन' से आगे जाना होगा

सिंह ने वैश्विक स्तर पर चर्चित 'चीन प्लस वन' रणनीति पर टिप्पणी करते हुए कहा कि भारत को इसे केवल चीन पर निर्भरता घटाने के नज़रिए से नहीं देखना चाहिए। इसके बजाय, भारत को एक विश्वसनीय, पारदर्शी और मज़बूत विनिर्माण साझेदार के रूप में स्थापित होना होगा, जो वैश्विक कंपनियों को भरोसेमंद आपूर्ति शृंखला दे सके।

उन्होंने कहा, "हमें केवल 'चीन प्लस वन' नहीं बनना है। हमें भारत बनना है — एक विश्वसनीय भागीदार, एक मज़बूत निर्माता और वैश्विक विकास का अगला बड़ा इंजन।"

बदलती वैश्विक व्यापार व्यवस्था और भू-राजनीतिक दबाव

सिंह ने रेखांकित किया कि वैश्विक व्यापार व्यवस्था इस समय बड़े उथल-पुथल से गुज़र रही है। व्यापार अब केवल आर्थिक गतिविधि नहीं रहा — कई देश इसे भू-राजनीतिक रणनीति के उपकरण के रूप में इस्तेमाल कर रहे हैं। उन्होंने विश्व व्यापार संगठन (WTO) के 14वें मंत्रिस्तरीय सम्मेलन में उभरे मतभेदों और उसके अपीलीय निकाय की दीर्घकालिक निष्क्रियता का हवाला दिया।

उन्होंने कहा, "महत्वपूर्ण खनिजों के निर्यात प्रतिबंधों का रणनीतिक हथियार के रूप में उपयोग किया जा रहा है। प्रौद्योगिकी तक पहुँच को सीमित करने के लिए कृत्रिम बाधाएँ खड़ी की जा रही हैं। व्यापार अब केवल आर्थिक साधन नहीं रहा, बल्कि भू-राजनीतिक नीति का एक महत्वपूर्ण माध्यम बन गया है।"

चीन का विनिर्माण वर्चस्व और भारत के लिए अवसर

सिंह ने बताया कि वैश्विक विनिर्माण मूल्यवर्धन में चीन की हिस्सेदारी 1990 में लगभग 3% थी, जो 2024 तक बढ़कर करीब 28% हो गई है। दुर्लभ मृदा तत्वों, ग्रेफाइट और मैग्नीशियम जैसे महत्वपूर्ण खनिजों के प्रसंस्करण में भी चीन का प्रभुत्व आर्थिक सुरक्षा के लिए गंभीर चिंता का विषय बन चुका है। यह एकाग्रता वैश्विक आपूर्ति शृंखलाओं को कमज़ोर बनाती है और भारत के लिए एक रणनीतिक अवसर उत्पन्न करती है।

आगे की राह

विशेषज्ञों के अनुसार, $2 ट्रिलियन के लक्ष्य को हासिल करने के लिए भारत को उत्पादन लागत, रसद दक्षता, व्यापार सुगमता और कुशल श्रमशक्ति — इन सभी मोर्चों पर एक साथ काम करना होगा। यह ऐसे समय में आया है जब वैश्विक कंपनियाँ आपूर्ति शृंखला विविधीकरण को प्राथमिकता दे रही हैं, जो भारत के लिए एक दुर्लभ रणनीतिक खिड़की है।

संपादकीय दृष्टिकोण

नीतिगत इच्छाशक्ति और क्रियान्वयन क्षमता का है। 'चीन प्लस वन' की चर्चा वर्षों से है, लेकिन वैश्विक कंपनियाँ अभी भी भारत को उतनी तेज़ी से नहीं अपना रहीं जितनी उम्मीद थी — कारण हैं रसद लागत, नियामकीय जटिलता और कुशल श्रमशक्ति की कमी। यशवीर सिंह का 'संरचनात्मक परिवर्तन' वाला बयान सही दिशा में है, लेकिन असली सवाल यह है कि इस बार ठोस मापन ढाँचा होगा या नहीं। WTO की निष्क्रियता और भू-राजनीतिक व्यापार हथियारीकरण भारत के लिए अवसर भी हैं और चेतावनी भी — खिड़की खुली है, पर ज़्यादा देर नहीं टिकेगी।
RashtraPress
20 अगस्त 2026

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

भारत का $2 ट्रिलियन निर्यात लक्ष्य क्या है और यह कब तक हासिल करना है?
भारत ने वित्त वर्ष 2030-31 तक कुल $2 ट्रिलियन (लगभग ₹166 लाख करोड़) निर्यात का लक्ष्य रखा है। वर्तमान में 2025-26 में निर्यात $863 अरब के रिकॉर्ड स्तर पर है, लेकिन लक्ष्य तक पहुँचने के लिए मौजूदा गति को दोगुने से अधिक करना होगा।
वाणिज्य मंत्रालय के अनुसार इस लक्ष्य को पाने के लिए क्या करना होगा?
अतिरिक्त सचिव यशवीर सिंह के अनुसार, केवल छोटे-मोटे सुधारों से यह लक्ष्य हासिल नहीं होगा। उत्पादन, आपूर्ति शृंखला और निर्यात क्षमता में व्यापक संरचनात्मक परिवर्तन अनिवार्य हैं।
'चीन प्लस वन' रणनीति में भारत की भूमिका क्या होनी चाहिए?
यशवीर सिंह ने कहा कि भारत को 'चीन प्लस वन' विकल्प बनने तक सीमित नहीं रहना चाहिए। भारत को एक विश्वसनीय, पारदर्शी और मज़बूत वैश्विक विनिर्माण साझेदार के रूप में स्वतंत्र पहचान बनानी होगी।
वैश्विक व्यापार व्यवस्था में किस तरह के बदलाव हो रहे हैं जो भारत को प्रभावित करते हैं?
WTO के 14वें मंत्रिस्तरीय सम्मेलन में मतभेद, अपीलीय निकाय की निष्क्रियता, पारस्परिक शुल्क, एकतरफा प्रतिबंध और महत्वपूर्ण खनिजों के निर्यात पर रणनीतिक प्रतिबंध — ये सभी पारंपरिक व्यापार ढाँचे को कमज़ोर कर रहे हैं। व्यापार अब भू-राजनीतिक नीति का एक प्रमुख हथियार बन गया है।
वैश्विक विनिर्माण में चीन का वर्चस्व भारत के लिए क्यों महत्वपूर्ण है?
वैश्विक विनिर्माण मूल्यवर्धन में चीन की हिस्सेदारी 1990 के 3% से बढ़कर 2024 में 28% हो गई है। दुर्लभ मृदा तत्वों और महत्वपूर्ण खनिजों में चीन का प्रभुत्व आपूर्ति शृंखला की कमज़ोरी उजागर करता है, जो भारत के लिए एक रणनीतिक अवसर है।
राष्ट्र प्रेस
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