मानसून से भारत की बिजली मांग घटकर 241 गीगावाट, 21 मई के रिकॉर्ड 270.8 GW से काफी नीचे
सारांश
मुख्य बातें
ग्रिड कंट्रोलर ऑफ इंडिया के आँकड़ों के अनुसार, मानसून की दस्तक के साथ भारत की उच्चतम बिजली माँग 16 जून को घटकर 241 गीगावाट रह गई — जो 21 मई को दर्ज किए गए ऑल-टाइम हाई 270.8 गीगावाट और 9 जून की 259 गीगावाट की माँग से उल्लेखनीय रूप से कम है। देश के विभिन्न हिस्सों में बारिश के कारण एयर-कंडीशनर और अन्य कूलिंग उपकरणों का उपयोग घटना इस राहत की प्रमुख वजह बताई जा रही है।
मांग में गिरावट की वजह
भारत में बिजली की माँग आमतौर पर मई-जून में अपने चरम पर होती है, जब भीषण गर्मी के चलते घरों और व्यावसायिक प्रतिष्ठानों में कूलिंग उपकरणों की खपत बढ़ जाती है। मानसून के आगमन से तापमान में गिरावट आती है, जिससे एसी और कूलर की ज़रूरत कम हो जाती है और ग्रिड पर दबाव घटता है। इस वर्ष भी यही पैटर्न दोहराया गया है।
ऊर्जा मिश्रण की स्थिति
ग्रिड कंट्रोलर ऑफ इंडिया के डेटा के मुताबिक, भारत के ऊर्जा मिश्रण में कोयले से उत्पन्न बिजली की हिस्सेदारी 68% बनी हुई है, जबकि सोलर और हाइड्रो की भागीदारी क्रमशः 19% और 7% दर्ज की गई। नवीकरणीय ऊर्जा की बढ़ती क्षमता के बावजूद कोयला अभी भी ग्रिड की रीढ़ बना हुआ है।
बिजली बाज़ार पर असर
इंडियन एनर्जी एक्सचेंज (IEX) के आँकड़ों के अनुसार, जून के मध्य में औसत स्पॉट पावर की कीमत ₹3.6 प्रति किलोवाट-घंटा रही, जो एक वर्ष पहले की तुलना में 18% कम है। 16 जून को रियल-टाइम मार्केट में कीमतें ₹4.5 प्रति किलोवाट-घंटा थीं, जबकि 21 मई को रिकॉर्ड माँग के समय ये ₹6.5 प्रति किलोवाट-घंटा तक पहुँच गई थीं। यह गिरावट उद्योग और बड़े उपभोक्ताओं के लिए राहत की खबर है।
वैश्विक परिदृश्य: डेटा सेंटर से बढ़ती माँग
जहाँ भारत में मौसमी राहत मिली है, वहीं वैश्विक स्तर पर बिजली की खपत में तेज़ी का रुझान जारी है। व्यापार और प्रौद्योगिकी अनुसंधान कंपनी गार्टनर, इंक. की रिपोर्ट के अनुसार, डेटा सेंटर्स के लिए वैश्विक बिजली माँग 2026 में 26.4% बढ़ने का अनुमान है — 2025 के 447 टेरावाट-घंटे से बढ़कर 565 टेरावाट-घंटे तक पहुँचने की संभावना है। इस वृद्धि का मुख्य कारण कंप्यूट-केंद्रित आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) वर्कलोड है, जो बिजली की माँग को नए उच्चतम स्तरों तक धकेल रहा है।
आगे की राह
मानसून की प्रगति के साथ अगले कुछ हफ्तों में बिजली माँग और बाज़ार कीमतों में नरमी बने रहने की संभावना है। हालाँकि, AI और डेटा सेंटर्स की बढ़ती माँग दीर्घकालिक ऊर्जा नियोजन के लिए एक नई चुनौती के रूप में उभर रही है, जिस पर नीति-निर्माताओं और ग्रिड प्रबंधकों की नज़र रहेगी।