जेफरीज रिपोर्ट: एसआईपी निवेश और एफआईआई बिकवाली से कमजोर हो रहा है भारतीय रुपया
सारांश
मुख्य बातें
ग्लोबल ब्रोकरेज फर्म जेफरीज ने अपनी ताज़ा रिपोर्ट में कहा है कि भारतीय रुपए पर बढ़ते दबाव की असली वजह कच्चे तेल की कीमतें या चालू खाते का घाटा नहीं, बल्कि घरेलू बाजार में एसआईपी के जरिए मजबूत निवेश प्रवाह और विदेशी संस्थागत निवेशकों (एफआईआई) की निरंतर बिकवाली है। 24 मई 2026 को जारी इस रिपोर्ट का शीर्षक 'आईएनआर प्रेशर — द डाउनसाइड ऑफ एसआईपी' है।
रिपोर्ट की मुख्य बातें
जेफरीज के अनुसार, बीते दो वर्षों में विदेशी निवेशकों ने भारतीय शेयर बाजार से करीब 78 अरब डॉलर की निकासी की है। इस अवधि में फॉरेन पोर्टफोलियो निवेशकों (एफपीआई), प्राइवेट इक्विटी फर्मों और विदेशी प्रमोटरों ने उच्च मूल्यांकन का फायदा उठाते हुए भारतीय बाजार में अपनी हिस्सेदारी घटाई।
रिपोर्ट के अनुसार, एफपीआई ने वित्त वर्ष 2026 में रिकॉर्ड 21 अरब डॉलर मूल्य के भारतीय शेयर बेचे और वित्त वर्ष 2027 में भी अब तक शुद्ध विक्रेता बने हुए हैं। इससे भी बड़ी बात यह है कि अप्रैल 2024 से अकेले एफपीआई ने 44 अरब डॉलर मूल्य के भारतीय शेयर बेचे हैं।
एसआईपी ने विदेशी निकासी को आसान बनाया
ब्रोकरेज फर्म का तर्क है कि एसआईपी, म्यूचुअल फंड और रिटायरमेंट-लिंक्ड निवेश के माध्यम से आने वाले मजबूत घरेलू प्रवाह ने विदेशी निवेशकों को भारी बिकवाली के बावजूद आसानी से बाहर निकलने का रास्ता दे दिया। घरेलू संस्थागत निवेशकों और खुदरा निवेशकों ने ईपीएफओ और एनपीएस से जुड़े निवेशों में बढ़ते आवंटन के साथ मिलकर इस बिकवाली को अवशोषित किया, जिससे बेंचमार्क इक्विटी सूचकांक अपेक्षाकृत स्थिर बने रहे।
गौरतलब है कि यह स्थिरता एक तरफ तो बाजार की मजबूती का संकेत देती है, लेकिन दूसरी तरफ इसने विदेशी पूंजी के बड़े पैमाने पर बाहर जाने को सुगम बना दिया।
पूंजी खाते पर असर
जेफरीज ने चेतावनी दी है कि इस प्रवृत्ति ने भारत की पूंजी खाता स्थिति को गंभीर रूप से कमजोर किया है। वित्त वर्ष 2025 और 2026 के दौरान भारत का पूंजी खाता अधिशेष जीडीपी के लगभग 0.5 प्रतिशत तक गिर गया — जो अब तक का सबसे निचला स्तर है। यह पिछले दशक के औसत 2.6 प्रतिशत की तुलना में बेहद कम है।
इसी दौरान, प्रमोटरों और निजी इक्विटी निवेशकों द्वारा हिस्सेदारी बिक्री के कारण शुद्ध प्रत्यक्ष विदेशी निवेश (एफडीआई) दो वर्षों में मात्र 5 अरब डॉलर पर स्थिर रहा।
भुगतान संतुलन और रुपए का भविष्य
रिपोर्ट में कहा गया है कि परिणामस्वरूप भारत का भुगतान संतुलन पिछले दो वर्षों से नकारात्मक बना हुआ है। जेफरीज को आने वाले वर्ष में भी इस कमजोरी के जारी रहने की आशंका है।
हालांकि, ब्रोकरेज फर्म ने यह भी कहा कि यदि विदेशी निवेशकों का विश्वास बहाल होता है, तो स्थिति में सुधार संभव है। यह ऐसे समय में आया है जब वैश्विक बाजारों में अनिश्चितता के बीच उभरते बाजारों में पूंजी प्रवाह की दिशा को लेकर बहस तेज हो गई है।