मोबाइल फोन मैन्युफैक्चरिंग स्कीम (MPMS) से घरेलू पुर्जा उत्पादन को मिलेगी रफ्तार: उद्योग जगत
सारांश
मुख्य बातें
नई दिल्ली में 22 अगस्त को उद्योग जगत ने हाल ही में मंजूर की गई मोबाइल फोन मैन्युफैक्चरिंग स्कीम (MPMS) का स्वागत करते हुए कहा कि यह योजना भारत के इलेक्ट्रॉनिक्स विनिर्माण क्षेत्र में स्थानीय मूल्य संवर्धन बढ़ाने, आयातित पुर्जों पर निर्भरता घटाने और आपूर्ति शृंखला में बैकवर्ड इंटीग्रेशन को सुदृढ़ करने में निर्णायक भूमिका निभा सकती है। विशेषज्ञों के अनुसार, यह पहल भारत को महज मोबाइल असेंबली केंद्र से आगे ले जाकर एक सशक्त घटक-आधारित विनिर्माण राष्ट्र के रूप में स्थापित करने की दिशा में महत्वपूर्ण कदम है।
मुख्य घटनाक्रम: ECMS की प्रगति
इलेक्ट्रॉनिक्स कंपोनेंट्स मैन्युफैक्चरिंग स्कीम (ECMS) के अंतर्गत अब तक 106 परियोजनाओं को मंजूरी दी जा चुकी है। इनमें से 38 विनिर्माण संयंत्र उत्पादन शुरू कर चुके हैं, जबकि 16 अन्य परियोजनाएँ निर्माण के उन्नत चरण में हैं। उद्योग विशेषज्ञों का कहना है कि योजनाएँ अब केवल कागजों तक सीमित नहीं रहीं — उत्पादन स्तर पर इनका असर दिखने लगा है।
इसके अतिरिक्त, हाल ही में 31 नई परियोजनाओं को ECMS के तहत मंजूरी दी गई है, जिनमें लगभग ₹6,844 करोड़ का निवेश प्रस्तावित है। इससे पहले मात्र पाँच महीनों के भीतर 75 परियोजनाओं को स्वीकृति मिली थी, जिनमें ₹61,671 करोड़ के निवेश का प्रस्ताव था।
उद्योग विशेषज्ञों की राय
सेमी इंडिया और इंडिया इलेक्ट्रॉनिक्स एंड सेमीकंडक्टर एसोसिएशन (IESA) के अध्यक्ष अशोक चंदक ने कहा कि उद्योग लंबे समय से उत्पादन क्षमता विस्तार, मजबूत डिज़ाइन टीमों के निर्माण, स्थानीय आपूर्ति शृंखला को सशक्त बनाने और वैश्विक गुणवत्ता मानकों को अपनाने की आवश्यकता पर बल देता आया है। उन्होंने कहा, "मौजूदा आँकड़े दर्शाते हैं कि यह बदलाव अब जमीनी स्तर पर दिखाई देने लगा है।"
चंदक ने यह भी रेखांकित किया कि भारत लंबे समय तक मल्टीलेयर PCB, डिस्प्ले मॉड्यूल, सेंसर और रिले जैसे महत्वपूर्ण इलेक्ट्रॉनिक पुर्जों के लिए आयात पर निर्भर रहा है। उनके अनुसार, अब स्थिति बदल रही है और भारत केवल वैश्विक कंपनियों के लिए एक बड़ा बाज़ार नहीं, बल्कि एक वैश्विक उत्पादन केंद्र बनने की राह पर है।
पहली बार होगा इन घटकों का घरेलू उत्पादन
नई परियोजनाओं के अंतर्गत देश में पहली बार कई महत्वपूर्ण घटकों का स्वदेशी उत्पादन शुरू होगा। इनमें फिल्टर, कॉइल, स्पीकर जैसे प्रमुख इलेक्ट्रॉनिक हिस्सों के साथ-साथ एसीटिलीन ब्लैक और इलेक्ट्रोलाइट एडिटिव्स जैसे आवश्यक कच्चे माल का निर्माण भी शामिल है। चंदक के अनुसार, यह कदम भारत को असेंबली-केंद्रित मॉडल से घटक और सामग्री-आधारित विनिर्माण मॉडल की ओर ले जाएगा, जिससे भारतीय बौद्धिक संपदा, डिज़ाइन और उत्पादन क्षमताओं को हर स्तर पर बल मिलेगा।
मोबाइल उत्पादन और निर्यात में ऐतिहासिक उछाल
EY India में दूरसंचार और उद्योग क्षेत्र के प्रमुख प्रशांत सिंघल ने बताया कि वित्त वर्ष 2014-15 की तुलना में वित्त वर्ष 2025-26 में भारत का मोबाइल फोन उत्पादन 33 गुना और मोबाइल निर्यात 165 गुना बढ़ चुका है। यह आँकड़ा पिछले एक दशक में भारतीय इलेक्ट्रॉनिक्स क्षेत्र की रूपांतरकारी यात्रा को रेखांकित करता है।
सिंघल ने आगे कहा कि नई MPMS भारतीय मोबाइल ब्रांडों को विशेष प्रोत्साहन देगी — जिसमें घरेलू स्तर पर पुर्जों की खरीद और अनुसंधान एवं विकास (R&D) के लिए अतिरिक्त इनसेंटिव शामिल हैं। इससे भारतीय कंपनियों की वैश्विक प्रतिस्पर्धात्मकता बढ़ेगी और देश में एक सुदृढ़ इलेक्ट्रॉनिक्स विनिर्माण पारिस्थितिकी तंत्र विकसित होगा।
क्या होगा आगे
गौरतलब है कि यह पहल ऐसे समय में आई है जब वैश्विक आपूर्ति शृंखलाएँ पुनर्गठन के दौर से गुज़र रही हैं और बहुराष्ट्रीय कंपनियाँ चीन से इतर विकल्प तलाश रही हैं। उद्योग विशेषज्ञों के अनुसार, MPMS और ECMS का संयुक्त प्रभाव भारत को इस वैश्विक अवसर का लाभ उठाने में सक्षम बना सकता है — बशर्ते क्रियान्वयन समयबद्ध और पारदर्शी हो।