10 अगस्त 2026
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MSME संशोधन विधेयक 2026 पास: 90 दिन में भुगतान अनिवार्य, पीएचडीसीसीआई ने बताया गेमचेंजर

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MSME संशोधन विधेयक 2026 पास: 90 दिन में भुगतान अनिवार्य, पीएचडीसीसीआई ने बताया गेमचेंजर

सारांश

दशकों से एमएसएमई की नकदी को जकड़े रखने वाली भुगतान देरी की समस्या पर संसद ने लगाम लगाई है। MSME संशोधन विधेयक 2026 के तहत अब 90 दिन में भुगतान अनिवार्य होगा, सरकारी कंपनियों को TReDS से बिल चुकाने होंगे और विवाद 6 महीने से अधिक खिंचा तो 50% अग्रिम भुगतान देना होगा।

मुख्य बातें

MSME विकास (संशोधन) विधेयक, 2026 को 8 अगस्त 2026 को लोकसभा में पारित किया गया।
एमएसएमई को किसी भी बिल के भुगतान के लिए अब 90 दिन से अधिक प्रतीक्षा नहीं करानी होगी।
सभी केंद्रीय सार्वजनिक उपक्रमों को एमएसएमई बिलों का भुगतान TReDS के माध्यम से अनिवार्य रूप से करना होगा।
मामला 6 महीने से अधिक लंबित रहने पर एमएसएमई को विवादित राशि का कम से कम 50% तत्काल मिलेगा।
सरकारी कंपनी को आर्बिट्रेशन फैसला चुनौती देने के लिए 75% राशि पहले जमा करनी होगी।
पीएचडीसीसीआई के महासचिव रणजीत मेहता ने इसे एमएसएमई की सबसे बड़ी समस्या का ठोस समाधान बताया।

सूक्ष्म, लघु और मध्यम उद्यम विकास (संशोधन) विधेयक, 2026 के लोकसभा में पारित होने के बाद पीएचडीसीसीआई के सीईओ और महासचिव रणजीत मेहता ने 10 अगस्त 2026 को कहा कि यह विधेयक एमएसएमई क्षेत्र की सबसे पुरानी और गहरी पीड़ा — भुगतान में देरी — का ठोस समाधान है। विधेयक में स्पष्ट प्रावधान है कि किसी भी एमएसएमई को उसके बिल के भुगतान के लिए 90 दिन से अधिक प्रतीक्षा नहीं करानी होगी।

विधेयक में क्या है खास

संशोधित कानून के तहत सभी केंद्रीय सार्वजनिक उपक्रमों (CPSEs) को लघु एवं मध्यम उद्यमों से की गई खरीद के समस्त बिलों का भुगतान व्यापार प्राप्य छूट प्रणाली (TReDS) के माध्यम से अनिवार्य रूप से करना होगा। इससे एमएसएमई को 6 महीने तक भुगतान का इंतजार नहीं करना पड़ेगा और सभी बिल 90 दिनों के भीतर निपटाए जाएंगे।

इसके अतिरिक्त, विधेयक में कई प्रावधानों का गैर-अपराधीकरण भी किया गया है, जिससे व्यापार करने में आसानी (Ease of Doing Business) को बल मिलेगा।

विवाद निपटारे की नई व्यवस्था

मेहता ने बताया कि भुगतान को लेकर विवाद उत्पन्न होने पर दोनों पक्ष मध्यस्थता (Mediation) या आर्बिट्रेशन का सहारा ले सकते हैं, और जो भी निर्णय आए उसका पालन अनिवार्य होगा।

यदि मध्यस्थता विफल हो जाती है, तो उसकी समाप्ति की तारीख से 30 दिनों के भीतर आर्बिट्रेशन के लिए रेफरेंस देना होगा। दोनों पक्षों की दलीलें पूरी होने के 90 दिनों के भीतर फैसला सुनाना अनिवार्य होगा। यदि कोई मामला 6 महीने से अधिक लंबित रहता है, तो एमएसएमई आपूर्तिकर्ता को तय रकम का कम से कम 50 प्रतिशत भुगतान तत्काल करना होगा।

सरकारी कंपनियों पर अतिरिक्त जवाबदेही

विधेयक में यह भी प्रावधान किया गया है कि यदि कोई सरकारी कंपनी आर्बिट्रेशन के फैसले को न्यायालय में चुनौती देना चाहती है, तो उसे पहले विवादित राशि का 75 प्रतिशत जमा करना होगा। यह प्रावधान सरकारी इकाइयों द्वारा मनमाने तरीके से अपील दायर कर भुगतान टालने की प्रवृत्ति पर अंकुश लगाएगा।

एमएसएमई क्षेत्र पर असर

भारत में एमएसएमई क्षेत्र देश के GDP में करीब 30 प्रतिशत का योगदान देता है और करोड़ों लोगों को रोजगार देता है। गौरतलब है कि भुगतान में देरी की समस्या दशकों से इस क्षेत्र की नकदी प्रवाह को बाधित करती आई है, जिससे छोटे उद्यमों को उच्च ब्याज दर पर कार्यशील पूंजी जुटानी पड़ती थी। यह विधेयक उस चक्र को तोड़ने का प्रयास है।

यह विधेयक शुक्रवार, 8 अगस्त 2026 को लोकसभा में पारित किया गया था। विशेषज्ञों का मानना है कि TReDS को अनिवार्य बनाने और समयबद्ध आर्बिट्रेशन की व्यवस्था से एमएसएमई की वित्तीय सेहत में उल्लेखनीय सुधार आ सकता है।

संपादकीय दृष्टिकोण

लेकिन असली परीक्षा क्रियान्वयन में है। TReDS को अनिवार्य बनाना एक साहसी कदम है, पर यह तंत्र वर्षों से स्वैच्छिक रहा और इसकी पहुँच सीमित रही — अब बाध्यता के बाद डिजिटल बुनियादी ढाँचे और अनुपालन निगरानी पर सरकार की असली परीक्षा होगी। 75% जमा की शर्त सरकारी कंपनियों की मनमानी अपील पर अंकुश लगाएगी, लेकिन निजी क्षेत्र के बड़े खरीदारों पर समान दबाव का अभाव एक खामी है जिसे भविष्य के संशोधनों में भरना होगा। एमएसएमई क्षेत्र GDP में 30% योगदान देने के बावजूद नकदी संकट से जूझता रहा है — यह विधेयक उस असंतुलन को पलटने की दिशा में एक महत्वपूर्ण, यद्यपि अधूरा, कदम है।
RashtraPress
10 अगस्त 2026

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

MSME विकास (संशोधन) विधेयक 2026 क्या है?
यह वह संशोधित कानून है जो एमएसएमई को उनके बिलों के भुगतान के लिए अधिकतम 90 दिन की सीमा निर्धारित करता है और विवाद निपटारे की प्रक्रिया को समयबद्ध बनाता है। इसे 8 अगस्त 2026 को लोकसभा में पारित किया गया।
TReDS को अनिवार्य बनाने से एमएसएमई को क्या फायदा होगा?
अब सभी केंद्रीय सार्वजनिक उपक्रमों को एमएसएमई से की गई खरीद के बिलों का भुगतान TReDS (व्यापार प्राप्य छूट प्रणाली) के माध्यम से करना अनिवार्य होगा। इससे एमएसएमई को 6 महीने तक इंतजार नहीं करना पड़ेगा और 90 दिनों में भुगतान सुनिश्चित होगा।
विवाद की स्थिति में एमएसएमई को कितना भुगतान मिलेगा?
यदि कोई मामला 6 महीने से अधिक लंबित रहता है, तो एमएसएमई आपूर्तिकर्ता को विवादित राशि का कम से कम 50 प्रतिशत तत्काल मिलेगा। मध्यस्थता विफल होने पर 30 दिनों में आर्बिट्रेशन और दलीलें पूरी होने के 90 दिनों में फैसला अनिवार्य है।
सरकारी कंपनियाँ आर्बिट्रेशन फैसले को चुनौती कैसे दे सकती हैं?
यदि कोई सरकारी कंपनी आर्बिट्रेशन के निर्णय को न्यायालय में चुनौती देना चाहती है, तो उसे पहले विवादित राशि का 75 प्रतिशत जमा करना होगा। यह प्रावधान मनमानी अपीलों पर रोक लगाने के लिए जोड़ा गया है।
पीएचडीसीसीआई ने इस विधेयक पर क्या कहा?
पीएचडीसीसीआई के सीईओ और महासचिव रणजीत मेहता ने कहा कि भुगतान में देरी एमएसएमई की सबसे बड़ी समस्या थी और यह विधेयक उसका सीधा समाधान है। उन्होंने TReDS की अनिवार्यता और समयबद्ध आर्बिट्रेशन को व्यापार सुगमता के लिए सकारात्मक कदम बताया।
राष्ट्र प्रेस
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