टाटा ग्रुप विवाद: शेयरधारकों के अधिकार नहीं छीने जा सकते — टाटा ट्रस्ट्स के वकील अभिषेक मनु सिंघवी
सारांश
मुख्य बातें
टाटा ट्रस्ट्स के वकील अभिषेक मनु सिंघवी ने 20 सितंबर 2026 को स्पष्ट शब्दों में कहा कि टाटा संस की लिस्टिंग और एन. चंद्रशेखरन की चेयरमैन पद पर दोबारा नियुक्ति को लेकर उपजे विवाद में मालिकों एवं शेयरधारकों के मौलिक अधिकारों को किसी भी स्थिति में समाप्त नहीं किया जा सकता। सिंघवी के अनुसार, यदि शेयरधारक-मालिकों के अधिकारों को इस तरह कमज़ोर किया गया तो यह भारत की सैकड़ों-हज़ारों कंपनियों में कॉर्पोरेट गवर्नेंस के लिए गंभीर संकट खड़ा कर सकता है।
सिंघवी की पहली प्रतिक्रिया: निराशा
सिंघवी ने बताया कि रतन टाटा के साथ मिलकर काम करने, टाटा ग्रुप की विरासत को करीब से देखने और दोनों पक्षों के प्रमुख लोगों के साथ गहरे व्यक्तिगत संबंध होने के कारण उनकी पहली प्रतिक्रिया निराशा की है। उन्होंने कहा कि वे दोनों तरफ के लोगों के प्रति सच्चा और गहरा सम्मान रखते हैं, चाहे वे ट्रस्ट के पक्ष में हों या कंपनी के।
हालाँकि, अब एक पक्ष के वकील के रूप में शामिल होने के बाद सिंघवी ने कहा कि व्यक्तिगत भावनाओं से परे यह मामला कानूनी और संवैधानिक सिद्धांतों का है, जिन पर कोई समझौता स्वीकार्य नहीं।
चैरिटी कमिश्नर के आदेश पर आपत्ति
सिंघवी ने चैरिटी कमिश्नर के उस कथित आदेश को लेकर कड़ी आपत्ति जताई, जिसके ज़रिये टाटा ट्रस्ट्स के कामकाज को रोका गया और निर्णय-प्रक्रिया में बाधा डाली गई। उनके अनुसार यह आदेश इतना व्यापक है कि ट्रस्ट अपनी आगामी रणनीति पर विचार के लिए बैठक तक नहीं कर सकता।
सिंघवी ने इसे ट्रस्ट के भीतर लोकतांत्रिक कामकाज को पूरी तरह नाकाम करने का एक और तरीका बताया। गौरतलब है कि इस तरह के प्रशासनिक हस्तक्षेप से न केवल टाटा ट्रस्ट्स बल्कि देश के अन्य धर्मार्थ ट्रस्टों पर भी व्यापक प्रभाव पड़ सकता है।
100 साल पुराने रिश्ते को तोड़ने की कोशिश
सिंघवी ने कहा कि टाटा ट्रस्ट्स और टाटा संस के बीच 100 वर्षों से अधिक पुराना और गहरा संबंध है। इस रिश्ते को ऐसे व्यवहार के ज़रिये तोड़ना, मानो दोनों के बीच 'तलाक' हो गया हो — न केवल कानूनी, बल्कि किसी भी दृष्टिकोण से अकल्पनीय है।
उन्होंने यह भी कहा कि टाटा संस के वे नियम जो टाटा ट्रस्ट्स के साथ कंपनी के विशिष्ट संबंधों को परिभाषित करते हैं, उन्हें अनदेखा करना उचित नहीं है। यह ऐसे समय में आया है जब सर्वोच्च न्यायालय पहले ही मिस्त्री मामले में इन्हीं नियमों को मान्यता दे चुका है।
कॉर्पोरेट गवर्नेंस पर व्यापक असर की चेतावनी
सिंघवी ने चेताया कि यदि शेयरधारक-मालिकों के अधिकारों को इस तरह से कमज़ोर किया गया, तो यह मिसाल भारत की सैकड़ों-हज़ारों कंपनियों के लिए एक खतरनाक नज़ीर बन सकती है। कॉर्पोरेट गवर्नेंस के बुनियादी सिद्धांत — जैसे कि स्वामित्व का अधिकार और निर्णय-प्रक्रिया में भागीदारी — इसी आधार पर टिके हुए हैं।
विशेषज्ञों का मानना है कि टाटा ग्रुप जैसे ऐतिहासिक और प्रतिष्ठित समूह में इस तरह का विवाद न केवल निवेशकों की धारणा को प्रभावित कर सकता है, बल्कि भारतीय कॉर्पोरेट जगत में पारदर्शिता और जवाबदेही को लेकर बड़े सवाल भी खड़े करता है। आने वाले दिनों में इस मामले में कानूनी और नियामकीय मोर्चे पर और घटनाक्रम की संभावना है।