पीएम-वीबीआरवाई के पहले वर्ष में 72 लाख से अधिक को मिला औपचारिक रोजगार, ₹99,446 करोड़ की योजना
सारांश
मुख्य बातें
प्रधानमंत्री विकसित भारत रोजगार योजना (पीएम-वीबीआरवाई) के लागू होने के पहले ही वर्ष में 72 लाख से अधिक पहली बार नौकरी पाने वाले कर्मचारी औपचारिक कार्यबल से जुड़ चुके हैं। 1 अगस्त 2026 को जारी एक आधिकारिक सरकारी बयान के अनुसार, यह योजना सामाजिक सुरक्षा का दायरा विस्तृत करने के साथ-साथ नियोक्ताओं को नए रोजगार सृजित करने के लिए भी प्रोत्साहित कर रही है।
मुख्य उपलब्धियाँ
सरकारी आँकड़ों के अनुसार, योजना के लाभार्थियों में करीब 30 प्रतिशत महिलाएँ हैं — जो श्रम बाज़ार में लैंगिक समावेश की दिशा में एक उल्लेखनीय संकेत है। इसके अतिरिक्त, 15 लाख से अधिक लाभार्थियों को रोजगार से जुड़ी प्रोत्साहन राशि पहले ही हस्तांतरित की जा चुकी है। कर्मचारी भविष्य निधि संगठन (ईपीएफओ) में पंजीकरण और प्रत्यक्ष लाभ हस्तांतरण (डीबीटी) के माध्यम से रोजगार को जोड़कर यह योजना देश के संगठित श्रम बाज़ार को सुदृढ़ बना रही है।
योजना की संरचना और बजट
यह योजना अगस्त 2025 में घोषित की गई थी और 1 अगस्त 2025 से 31 जुलाई 2027 तक लागू रहेगी। इसके लिए सरकार ने ₹99,446 करोड़ का बजटीय प्रावधान किया है। योजना का समग्र लक्ष्य 3.5 करोड़ से अधिक लोगों को रोजगार उपलब्ध कराना है, जिनमें 1.92 करोड़ पहली बार नौकरी पाने वाले कर्मचारी शामिल हैं।
पीएम-वीबीआरवाई दो हिस्सों वाली प्रोत्साहन व्यवस्था पर आधारित है। प्रति माह ₹1 लाख तक वेतन पाने वाले पहली बार नौकरी करने वाले कर्मचारियों को उनके एक महीने के ईपीएफ वेतन के बराबर, अधिकतम ₹15,000 तक का एकमुश्त प्रोत्साहन दिया जाता है। यह राशि दो किस्तों में जारी होती है — पहली किस्त 6 महीने की सेवा पूरी होने पर और दूसरी किस्त 12 महीने की निरंतर सेवा तथा वित्तीय साक्षरता कार्यक्रम पूरा करने के बाद।
नियोक्ताओं के लिए प्रावधान
नियोक्ताओं को प्रत्येक पात्र अतिरिक्त कर्मचारी के लिए — जिसे कम से कम छह महीने तक नौकरी पर रखा जाए — दो वर्षों तक प्रति माह ₹3,000 तक का प्रोत्साहन मिलता है। इससे कंपनियों की भर्ती लागत घटती है और दीर्घकालिक रोजगार को बढ़ावा मिलता है। विनिर्माण क्षेत्र की विशेष रोजगार क्षमता को देखते हुए इस क्षेत्र के लिए प्रोत्साहन अवधि को तीसरे और चौथे वर्ष तक भी विस्तारित किया गया है।
व्यापक संदर्भ और महत्व
गौरतलब है कि भारत में असंगठित क्षेत्र में कार्यरत श्रमिकों की संख्या अभी भी बड़ी है और कार्यबल के औपचारिककरण की रफ्तार ऐतिहासिक रूप से धीमी रही है। यह योजना ऐसे समय में आई है जब राष्ट्रीय विनिर्माण मिशन के तहत श्रम-प्रधान उद्योगों में रोजगार सृजन को प्राथमिकता दी जा रही है। ईपीएफओ-संचालित पारदर्शी व्यवस्था और डीबीटी के संयोजन से रिसाव की संभावना कम होती है और लाभ सीधे पात्र कर्मचारियों तक पहुँचता है।
आगे देखें तो योजना की सफलता इस बात पर निर्भर करेगी कि क्या नए पंजीकृत कर्मचारी दीर्घकालिक औपचारिक रोजगार में बने रहते हैं या केवल प्रोत्साहन राशि के लिए अल्पकालिक पंजीकरण होता है। सरकार की अगली रिपोर्ट से इस प्रवृत्ति पर अधिक स्पष्टता मिलने की उम्मीद है।