रेल दुर्घटनाओं में 10 साल में 90% की कमी: 2014-15 में 135 से घटकर 2025-26 में 16 पर आईं
सारांश
मुख्य बातें
रेल मंत्री अश्विनी वैष्णव ने 29 जुलाई 2026 को लोकसभा में बताया कि भारतीय रेलवे में ट्रेन दुर्घटनाओं की संख्या 2014-15 के 135 से घटकर 2025-26 में मात्र 16 रह गई है — यानी लगभग 90 प्रतिशत की गिरावट। चालू वित्त वर्ष में जून 2026 तक केवल दो दुर्घटनाएँ दर्ज की गई हैं, जो रेलवे के इतिहास में अब तक का सबसे कम आँकड़ा बताया जा रहा है।
मुख्य सुरक्षा संकेतक
मंत्रालय के आँकड़ों के अनुसार, 'कॉन्सिक्वेंशियल एक्सीडेंट इंडेक्स' — यानी प्रति दस लाख ट्रेन-किलोमीटर दुर्घटनाओं की संख्या — 2014-15 में 0.11 से घटकर 2025-26 में 0.01 पर आ गई है, जो लगभग 91 प्रतिशत की कमी है। यह सूचकांक रेलवे की परिचालन सुरक्षा का सबसे विश्वसनीय पैमाना माना जाता है क्योंकि यह नेटवर्क के विस्तार को भी ध्यान में रखता है।
सुरक्षा पर निवेश में तीन गुना वृद्धि
सरकार के अनुसार, रेल सुरक्षा से जुड़े कार्यों पर व्यय 2013-14 के ₹39,200 करोड़ से बढ़कर 2026-27 में ₹1,20,389 करोड़ हो गया है — तीन गुने से भी अधिक की वृद्धि। यह ऐसे समय में आया है जब रेलवे नेटवर्क का विस्तार भी तेज़ी से हो रहा है और ट्रेनों की गति व संख्या दोनों बढ़ी हैं।
तकनीकी उपाय: इंटरलॉकिंग से कवच तक
मंत्रालय के बयान में कई तकनीकी हस्तक्षेपों का उल्लेख किया गया। 6,671 स्टेशनों पर केंद्रीकृत विद्युत एवं इलेक्ट्रॉनिक इंटरलॉकिंग प्रणाली लगाई गई है और इन सभी स्टेशनों पर पूर्ण ट्रैक सर्किटिंग की व्यवस्था की गई है। इसके अतिरिक्त, 10,395 लेवल क्रॉसिंग गेटों पर इंटरलॉकिंग सुविधा दी गई है।
सभी लोकोमोटिव में विजिलेंस कंट्रोल डिवाइस लगाए गए हैं। कोहरे की स्थिति में दृश्यता कम होने पर लोको पायलटों को जीपीएस-आधारित फॉग सेफ्टी डिवाइस मुहैया कराए गए हैं। विद्युतीकृत क्षेत्रों में सिग्नल से दो ओएचई मास्ट पहले रेट्रो-रिफ्लेक्टिव सिग्मा बोर्ड लगाए गए हैं, जो कोहरे में क्रू को आगे के सिग्नल की पूर्व-सूचना देते हैं।
ट्रैक की गुणवत्ता बनाए रखने के लिए अल्ट्रासोनिक फ्लॉ डिटेक्शन (USFD) परीक्षण नियमित रूप से किया जा रहा है। लंबी रेल बिछाने, एल्युमिनो थर्मिक वेल्डिंग का उपयोग सीमित करने और उन्नत वेल्डिंग तकनीक अपनाने से ट्रैक की मज़बूती बढ़ाई गई है।
कवच प्रणाली का विस्तार
वैष्णव ने संसद में देश में निर्मित स्वचालित ट्रेन सुरक्षा प्रणाली 'कवच' के क्रियान्वयन का विशेष उल्लेख किया। यह प्रणाली लोको पायलट को निर्धारित गति सीमा में ट्रेन चलाने में सहायता करती है और आवश्यकता पड़ने पर स्वतः ब्रेक लगाती है, जिससे टक्कर की संभावना काफी हद तक कम हो जाती है। गौरतलब है कि कवच को पहले 'एंटी-कोलिजन डिवाइस' के नाम से जाना जाता था और इसका विकास भारतीय रेलवे ने स्वदेशी तकनीक से किया है।
निरीक्षण और मानव प्रशिक्षण
तकनीकी उपायों के साथ-साथ, रेलवे कर्मचारियों को सुरक्षित कार्यप्रणाली का पालन सुनिश्चित कराने के लिए नियमित अंतराल पर निरीक्षण और प्रशिक्षण कार्यक्रम चलाए जा रहे हैं। मंत्रालय का कहना है कि मानवीय चूक को कम करना सुरक्षा सुधार का एक प्रमुख स्तंभ रहा है।
आँकड़ों के अनुसार, यह प्रगति एक दशक की निरंतर नीतिगत प्राथमिकता और बढ़ते पूंजी व्यय का परिणाम है। आने वाले वर्षों में कवच का विस्तार और अधिक मार्गों पर होने से सुरक्षा के स्तर में और सुधार की उम्मीद है।