13 अगस्त 2026
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पैकेज्ड फूड लेबलिंग में देरी पर सुप्रीम कोर्ट की केंद्र और FSSAI को कड़ी फटकार, दो हफ्ते में जवाब तलब

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पैकेज्ड फूड लेबलिंग में देरी पर सुप्रीम कोर्ट की केंद्र और FSSAI को कड़ी फटकार, दो हफ्ते में जवाब तलब

सारांश

सर्वोच्च न्यायालय ने केंद्र और FSSAI को साफ चेतावनी दी है — पैकेज्ड फूड पर FOP लेबल लागू करो या न्यायिक आदेश झेलो। बच्चों के स्वास्थ्य और व्यावसायिक हितों की इस लड़ाई में अदालत ने उपभोक्ता अधिकार को सर्वोपरि रखा।

मुख्य बातें

सर्वोच्च न्यायालय ने 13 अगस्त 2026 को केंद्र सरकार और FSSAI को पैकेज्ड फूड पर फ्रंट-ऑफ-पैक चेतावनी लेबल लागू करने में देरी पर कड़ी फटकार लगाई।
पारदीवाला और जस्टिस के.
विनोद चंद्रन की पीठ ने सार्वजनिक स्वास्थ्य — विशेषकर बच्चों के स्वास्थ्य — को व्यावसायिक हितों से ऊपर रखा।
अदालत ने निर्माताओं के कारोबार पर असर की दलीलें खारिज कीं; कहा — 'निर्माता स्वास्थ्य नीति तय नहीं कर सकते।' केंद्र को जवाब दाखिल करने के लिए दो सप्ताह का समय; पीठ ने इसे 'अंतिम अवसर' बताया।
अंतरराष्ट्रीय मानकों की आड़ में देरी की केंद्र की दलील को अदालत ने अस्वीकार किया।

सर्वोच्च न्यायालय ने 13 अगस्त 2026 को केंद्र सरकार और भारतीय खाद्य सुरक्षा एवं मानक प्राधिकरण (FSSAI) को कड़ी फटकार लगाई — अधिक चीनी, नमक और संतृप्त वसा वाले पैकेज्ड खाद्य उत्पादों पर फ्रंट-ऑफ-पैक (FOP) चेतावनी लेबल लागू करने में हो रही देरी को लेकर। अदालत ने स्पष्ट शब्दों में कहा कि सार्वजनिक स्वास्थ्य — विशेषकर बच्चों के स्वास्थ्य — से किसी भी कीमत पर समझौता स्वीकार्य नहीं है।

पीठ का सख्त रुख

जस्टिस जे.बी. पारदीवाला और जस्टिस के. विनोद चंद्रन की पीठ ने केंद्र की ओर से पेश अतिरिक्त सॉलिसिटर जनरल से अदालत के पूर्व निर्देशों का अनुपालन सुनिश्चित करने को कहा। पीठ ने सवाल किया कि सरकार सख्त पोषण संबंधी चेतावनियाँ लागू करने में क्यों हिचक रही है और अब तक उठाए गए कदमों का विस्तृत ब्यौरा माँगा।

पीठ ने FSSAI से सीधे पूछा, 'क्या आप नहीं चाहते कि इस देश के लोग, खासकर बढ़ते बच्चे, स्वस्थ रहें?' यह टिप्पणी उस व्यापक चिंता को दर्शाती है जो न्यायपालिका खाद्य नियामक की सुस्त कार्यशैली को लेकर लंबे समय से जता रही है।

उपभोक्ता अधिकार और सूचित निर्णय

अदालत ने रेखांकित किया कि उपभोक्ताओं को यह सामान्य जानकारी तो होती है कि पैकेज्ड खाद्य पदार्थों में चीनी, वसा और कार्बोहाइड्रेट होते हैं, लेकिन पैकेट के सामने स्पष्ट चेतावनी लेबल होने से वे उत्पाद खरीदने से पहले बेहतर और सूचित निर्णय ले सकेंगे। पीठ ने कहा कि किसी उत्पाद को खरीदना है या नहीं, यह अंतिम निर्णय उपभोक्ता का है — निर्माता का नहीं।

व्यावसायिक हित बनाम सार्वजनिक स्वास्थ्य

अदालत ने चेतावनी लेबल से निर्माताओं के कारोबार पर प्रतिकूल असर पड़ने की दलीलों को सिरे से खारिज कर दिया। पीठ ने स्पष्ट किया, 'यह नागरिकों के स्वास्थ्य से जुड़ा मामला है। निर्माता ऐसे मामलों में नीति तय नहीं कर सकते।' साथ ही अदालत ने यह भी कहा कि उसका उद्देश्य किसी विशेष उत्पाद को निशाना बनाना नहीं, बल्कि यह सुनिश्चित करना है कि उपभोक्ताओं को पूरी जानकारी मिले।

गौरतलब है कि पिछली सुनवाई में केंद्र ने तर्क दिया था कि अंतरराष्ट्रीय मानकों के अनुरूप व्यवस्था बनाने में व्यावहारिक चुनौतियाँ हैं। सर्वोच्च न्यायालय ने इस दलील को अस्वीकार करते हुए कहा कि भारत मजबूत सार्वजनिक स्वास्थ्य सुरक्षा उपायों में देरी के औचित्य के लिए विदेशी मानकों का सहारा नहीं ले सकता।

सरकार को अंतिम अवसर

सर्वोच्च न्यायालय ने केंद्र को अपना जवाब दाखिल करने के लिए दो सप्ताह का समय दिया है। पीठ ने इसे सरकार का 'अंतिम अवसर' करार देते हुए चेतावनी दी कि यदि कोई ठोस कदम नहीं उठाया गया, तो वह स्वयं इस मामले में फैसला सुना देगी। अदालत ने स्पष्ट किया कि सरकार को तय करना होगा कि वह प्रस्तावित लेबलिंग व्यवस्था स्वेच्छा से लागू करती है अथवा न्यायिक आदेश का इंतजार करती है।

यह मामला ऐसे समय में सामने आया है जब भारत में मोटापा, मधुमेह और हृदय रोग की दरें तेजी से बढ़ रही हैं और पोषण विशेषज्ञ लंबे समय से पैकेज्ड खाद्य पदार्थों पर स्पष्ट लेबलिंग की माँग करते रहे हैं। अदालत का यह हस्तक्षेप खाद्य नीति निर्माण में न्यायपालिका की बढ़ती भूमिका का संकेत है।

संपादकीय दृष्टिकोण

जो नियामक की स्वायत्तता पर गंभीर सवाल उठाता है। विडंबना यह है कि भारत उन देशों में शुमार है जहाँ पैकेज्ड फूड की खपत सबसे तेजी से बढ़ रही है, जबकि बचपन में मोटापे की दर भी चिंताजनक स्तर पर है। बिना समयबद्ध जवाबदेही के, यह 'अंतिम अवसर' भी उन लंबी कानूनी प्रक्रियाओं की कड़ी बन सकता है जो उपभोक्ताओं तक पहुँचने से पहले ही थक जाती हैं।
RashtraPress
13 अगस्त 2026

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

फ्रंट-ऑफ-पैक (FOP) चेतावनी लेबल क्या होता है?
FOP लेबल पैकेज्ड खाद्य उत्पाद के सामने की तरफ लगाया जाने वाला स्पष्ट चेतावनी संकेत है, जो उपभोक्ताओं को उत्पाद में अधिक चीनी, नमक या संतृप्त वसा होने की तत्काल जानकारी देता है। इसका उद्देश्य उपभोक्ताओं को खरीदारी से पहले सूचित निर्णय लेने में सक्षम बनाना है।
सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र और FSSAI को क्यों फटकारा?
अदालत ने पाया कि पैकेज्ड खाद्य पदार्थों पर FOP चेतावनी लेबल लागू करने में केंद्र और FSSAI अनावश्यक देरी कर रहे हैं, जबकि सार्वजनिक स्वास्थ्य — विशेषकर बच्चों का स्वास्थ्य — दाँव पर है। पीठ ने पूर्व के न्यायिक निर्देशों के अनुपालन में भी ढिलाई पाई।
सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र को कितना समय दिया है?
अदालत ने केंद्र सरकार को अपना जवाब दाखिल करने के लिए दो सप्ताह का समय दिया है। पीठ ने स्पष्ट किया कि यदि ठोस कदम नहीं उठाए गए, तो वह स्वयं इस मामले में फैसला सुना देगी।
क्या निर्माताओं की व्यावसायिक चिंताओं को अदालत ने माना?
नहीं। सर्वोच्च न्यायालय ने चेतावनी लेबल से कारोबार पर असर पड़ने की दलीलों को सिरे से खारिज कर दिया। पीठ ने कहा कि व्यावसायिक हितों को सार्वजनिक स्वास्थ्य से ऊपर नहीं रखा जा सकता और उत्पाद खरीदने का अंतिम निर्णय उपभोक्ता का है।
इस मामले का आम उपभोक्ताओं पर क्या असर होगा?
यदि FOP लेबलिंग लागू होती है, तो उपभोक्ताओं को पैकेट के सामने ही स्पष्ट संकेत मिलेगा कि उत्पाद में चीनी, नमक या वसा की मात्रा अधिक है। इससे विशेषकर बच्चों के लिए खाद्य उत्पाद चुनते समय अभिभावकों को बेहतर जानकारी मिलेगी।
राष्ट्र प्रेस
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