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FSSAI का बड़ा प्रस्ताव: अधिक चीनी, नमक या फैट वाले पैकेट पर अनिवार्य लाल चेतावनी लेबल

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FSSAI का बड़ा प्रस्ताव: अधिक चीनी, नमक या फैट वाले पैकेट पर अनिवार्य लाल चेतावनी लेबल

सारांश

FSSAI ने सर्वोच्च न्यायालय में प्रस्ताव रखा कि अत्यधिक चीनी, नमक या वसा वाले प्रोसेस्ड खाद्य पैकेट पर लाल चेतावनी लेबल अनिवार्य हो। नेस्ले और पेप्सिको जैसी कंपनियों के विरोध के बावजूद, पीठ ने दो सप्ताह में रूपरेखा माँगी है।

मुख्य बातें

FSSAI ने 28 अगस्त 2026 को सर्वोच्च न्यायालय में अधिक चीनी, नमक या वसा वाले पैकेट पर लाल चेतावनी लेबल का प्रस्ताव रखा।
लेबल पर 'ज्यादा वसा वाला' , 'ज्यादा चीनी वाला' , 'ज्यादा नमक वाला' जैसी स्पष्ट भाषा होगी।
पारदीवाला और न्यायमूर्ति के.
विनोद चंद्रन की पीठ ने FSSAI को दो सप्ताह में रूपरेखा प्रस्तुत करने का निर्देश दिया।
नेस्ले , पेप्सिको और कोका-कोला इस प्रस्ताव का विरोध कर रही हैं, बिक्री प्रभावित होने की आशंका जताते हुए।
सर्वोच्च न्यायालय ने स्पष्ट किया कि व्यावसायिक हित सार्वजनिक स्वास्थ्य पर हावी नहीं हो सकते।

भारतीय खाद्य सुरक्षा और मानक प्राधिकरण (FSSAI) ने 28 अगस्त 2026 को सर्वोच्च न्यायालय में यह प्रस्ताव रखा कि अत्यधिक चीनी, नमक या वसा युक्त प्रोसेस्ड खाद्य एवं पेय पदार्थों के पैकेट के सामने लाल रंग का चेतावनी लेबल अनिवार्य रूप से लगाया जाए। यह कदम उपभोक्ताओं को सूचित और स्वस्थ विकल्प चुनने में सक्षम बनाने के उद्देश्य से उठाया गया है।

प्रस्तावित लेबलिंग व्यवस्था क्या है

FSSAI के प्रस्ताव के अनुसार, चेतावनी लेबल पर स्पष्ट भाषा में लिखा जाएगा — जैसे 'ज्यादा वसा वाला', 'ज्यादा चीनी वाला', 'ज्यादा नमक वाला' या 'बहुत ज्यादा मीठा पेय'। ये लेबल पैकेट के अगले हिस्से (फ्रंट-ऑफ-पैक) पर प्रमुखता से दिखाई देंगे, ताकि उपभोक्ता बिना पोषण संबंधी बारीक जानकारी पढ़े भी उत्पाद की प्रकृति तुरंत समझ सकें।

यह प्रस्ताव उन स्वास्थ्य कार्यकर्ताओं की याचिकाओं की पृष्ठभूमि में आया है जो पश्चिमी देशों की तर्ज पर भारत में भी सख्त चेतावनी लेबलिंग की माँग कर रहे हैं।

सर्वोच्च न्यायालय की सख्त टिप्पणियाँ

न्यायमूर्ति जे.बी. पारदीवाला और न्यायमूर्ति के. विनोद चंद्रन की पीठ ने अनिवार्य पैकेज्ड फूड चेतावनी लेबल लागू करने में हुई लंबी देरी पर FSSAI के प्रति गहरा असंतोष व्यक्त किया। पीठ ने सवाल उठाया कि क्या नियामक संस्था वास्तव में भारतीय नागरिकों के स्वास्थ्य को प्राथमिकता देती है।

न्यायालय ने स्पष्ट किया कि यदि कार्यकारी तंत्र स्वतंत्र रूप से कार्रवाई करने में विफल रहा, तो न्यायिक आदेश जारी किए जाएंगे। FSSAI को एक निश्चित रूपरेखा तैयार करने के लिए दो सप्ताह की सख्त समयसीमा दी गई है।

इसी सुनवाई में पीठ ने यह भी रेखांकित किया कि युवा उपभोक्ता, विशेषकर छोटे बच्चे, अल्ट्रा-प्रोसेस्ड उत्पादों के आक्रामक विपणन के सबसे अधिक शिकार हैं और मोटापे जैसी गंभीर बीमारियों के बढ़ते खतरे को देखते हुए पारदर्शी पोषण संबंधी जानकारी अनिवार्य है।

खाद्य उद्योग का विरोध

नेस्ले, पेप्सिको और कोका-कोला जैसी बहुराष्ट्रीय खाद्य कंपनियाँ इस प्रस्ताव का विरोध कर रही हैं। उनकी आशंका है कि फ्रंट-ऑफ-पैक लाल चेतावनी लेबल से उत्पादों की बिक्री पर प्रतिकूल असर पड़ेगा।

उद्योग पक्ष की ओर से यह भी तर्क दिया गया कि ऐसे लेबल पारंपरिक भारतीय पैक्ड स्नैक्स पर अनुचित प्रतिबंध की तरह काम कर सकते हैं। हालाँकि सर्वोच्च न्यायालय ने इस तर्क को खारिज करते हुए स्पष्ट किया कि व्यावसायिक हित सार्वजनिक स्वास्थ्य की अनिवार्यताओं पर हावी नहीं हो सकते।

आम जनता और उपभोक्ताओं पर असर

यह ऐसे समय में आया है जब भारत में मधुमेह, हृदय रोग और मोटापे के मामले तेज़ी से बढ़ रहे हैं और अल्ट्रा-प्रोसेस्ड खाद्य पदार्थों की खपत में भी उल्लेखनीय वृद्धि दर्ज की गई है। गौरतलब है कि चिली, मेक्सिको और ब्राज़ील जैसे देश पहले ही ऐसी लेबलिंग प्रणाली अपना चुके हैं और वहाँ उपभोक्ता व्यवहार में सकारात्मक बदलाव देखे गए हैं।

यदि FSSAI का यह प्रस्ताव लागू होता है, तो यह भारत में खाद्य पैकेजिंग नियमों में एक ऐतिहासिक बदलाव होगा — और उपभोक्ताओं को, विशेषकर कम साक्षर वर्ग को, स्वास्थ्यकर विकल्प चुनने में मदद मिलेगी।

आगे क्या होगा

सर्वोच्च न्यायालय द्वारा दी गई दो सप्ताह की समयसीमा में FSSAI को लेबलिंग की स्पष्ट रूपरेखा प्रस्तुत करनी होगी। अगली सुनवाई में न्यायालय यह तय करेगा कि प्राधिकरण का प्रस्ताव पर्याप्त है या न्यायिक हस्तक्षेप आवश्यक है। खाद्य नीति विशेषज्ञों का मानना है कि इस मामले का परिणाम भारत की खाद्य नियामक व्यवस्था की दिशा निर्धारित करेगा।

संपादकीय दृष्टिकोण

न्यायिक दबाव में उठाया गया कदम है। असली सवाल यह है कि क्या लेबलिंग की रूपरेखा उद्योग के दबाव में कमज़ोर पड़ेगी, जैसा कि पिछले कई वर्षों में होता आया है। चिली और मेक्सिको के अनुभव बताते हैं कि सख्त फ्रंट-ऑफ-पैक लेबलिंग वास्तव में उपभोक्ता व्यवहार बदलती है — लेकिन केवल तब, जब उसे उद्योग-अनुकूल अपवादों से मुक्त रखा जाए। भारत में मधुमेह और मोटापे की बढ़ती दर को देखते हुए, यह नीतिगत देरी केवल प्रशासनिक विफलता नहीं — एक सार्वजनिक स्वास्थ्य संकट है।
RashtraPress
29 अगस्त 2026

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

FSSAI का लाल चेतावनी लेबल प्रस्ताव क्या है?
FSSAI ने प्रस्ताव दिया है कि अत्यधिक चीनी, नमक या वसा वाले प्रोसेस्ड खाद्य एवं पेय पदार्थों के पैकेट के अगले हिस्से पर लाल रंग का चेतावनी लेबल अनिवार्य रूप से लगाया जाए। इस लेबल पर 'ज्यादा वसा वाला', 'ज्यादा चीनी वाला' जैसी स्पष्ट भाषा होगी ताकि उपभोक्ता तुरंत सूचित निर्णय ले सकें।
सर्वोच्च न्यायालय ने FSSAI को क्या निर्देश दिया है?
न्यायमूर्ति जे.बी. पारदीवाला और न्यायमूर्ति के. विनोद चंद्रन की पीठ ने FSSAI को दो सप्ताह के भीतर लेबलिंग की स्पष्ट रूपरेखा प्रस्तुत करने का निर्देश दिया है। न्यायालय ने चेतावनी दी है कि यदि नियामक विफल रहा तो न्यायिक आदेश जारी किए जाएंगे।
खाद्य कंपनियाँ इस प्रस्ताव का विरोध क्यों कर रही हैं?
नेस्ले, पेप्सिको और कोका-कोला जैसी कंपनियों को आशंका है कि लाल चेतावनी लेबल से उनके उत्पादों की बिक्री पर नकारात्मक असर पड़ेगा। उद्योग ने यह भी तर्क दिया था कि ऐसे लेबल पारंपरिक भारतीय स्नैक्स पर अनुचित प्रतिबंध जैसे होंगे, जिसे सर्वोच्च न्यायालय ने अस्वीकार कर दिया।
यह लेबलिंग आम उपभोक्ताओं को कैसे प्रभावित करेगी?
लाल चेतावनी लेबल उपभोक्ताओं — विशेषकर कम साक्षर वर्ग और बच्चों के माता-पिता — को किसी उत्पाद में अत्यधिक हानिकारक तत्वों की मौजूदगी एक नज़र में समझने में मदद करेगा। स्वास्थ्य विशेषज्ञों के अनुसार, यह मधुमेह और मोटापे जैसी बीमारियों की रोकथाम में सहायक हो सकता है।
क्या अन्य देशों में भी ऐसी लेबलिंग लागू है?
हाँ, चिली, मेक्सिको और ब्राज़ील जैसे देश पहले ही फ्रंट-ऑफ-पैक चेतावनी लेबलिंग प्रणाली अपना चुके हैं और वहाँ उपभोक्ता व्यवहार में सकारात्मक बदलाव दर्ज किए गए हैं। भारत में यह प्रस्ताव उन्हीं अंतरराष्ट्रीय मानकों की दिशा में एक कदम माना जा रहा है।
राष्ट्र प्रेस
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