14 अगस्त 2026
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FSSAI ने खाद्य लेबलिंग और विज्ञापन नियमों पर FBO के लिए प्रशिक्षण कार्यक्रम आयोजित किया

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FSSAI ने खाद्य लेबलिंग और विज्ञापन नियमों पर FBO के लिए प्रशिक्षण कार्यक्रम आयोजित किया

सारांश

FSSAI ने खाद्य कारोबार संचालकों को लेबलिंग और विज्ञापन नियमों पर प्रशिक्षित किया — और यह तब हुआ जब सर्वोच्च न्यायालय पैकेज्ड फूड पर फ्रंट-ऑफ-पैक चेतावनी लेबल की देरी पर सरकार को घेर चुका है। व्यावसायिक हित बनाम सार्वजनिक स्वास्थ्य की यह बहस अब अदालती दबाव में नई धार पकड़ रही है।

मुख्य बातें

FSSAI ने 14 अगस्त 2026 को खाद्य कारोबार संचालकों के लिए लेबलिंग, डिस्प्ले, विज्ञापन और दावों के नियमों पर विशेष प्रशिक्षण सत्र आयोजित किया।
प्रशिक्षण में खाद्य उद्योग के बड़ी संख्या में प्रतिनिधियों ने भाग लिया, जिसे FSSAI ने उद्योग की बढ़ती अनुपालन-सजगता का संकेत बताया।
सर्वोच्च न्यायालय की न्यायमूर्ति जे.बी.
पारडीवाला और न्यायमूर्ति के.
विनोद चंद्रन की पीठ पहले ही फ्रंट-ऑफ-पैक पोषण चेतावनी लेबल लागू करने में देरी पर चिंता जता चुकी है।
अदालत ने स्पष्ट किया कि बच्चों के स्वास्थ्य के मामले में कोई समझौता नहीं और व्यावसायिक हितों को सार्वजनिक स्वास्थ्य से ऊपर नहीं रखा जा सकता।
केंद्र सरकार से प्रस्तावित लेबलिंग ढाँचे का पूरा विवरण माँगा गया है; ठोस प्रगति न होने पर अदालत के आगे निर्देश जारी करने की संभावना।

भारतीय खाद्य सुरक्षा एवं मानक प्राधिकरण (FSSAI) ने 14 अगस्त 2026 को खाद्य कारोबार संचालकों (FBO) के लिए पैकेज्ड खाद्य उत्पादों की लेबलिंग, डिस्प्ले, विज्ञापन और दावों से संबंधित नियमों पर एक विशेष प्रशिक्षण सत्र का आयोजन किया। यह कदम ऐसे समय उठाया गया है जब सर्वोच्च न्यायालय फ्रंट-ऑफ-पैक पोषण चेतावनी लेबल की देरी पर केंद्र सरकार और FSSAI से सवाल कर चुका है।

प्रशिक्षण कार्यक्रम का स्वरूप

FSSAI ने एक्स (पूर्व में ट्विटर) पर जानकारी साझा करते हुए बताया कि 'अंडरस्टैंडिंग लेबलिंग, डिस्प्ले, एडवरटाइज़िंग एंड क्लेम्स रेगुलेशंस' विषय पर आयोजित इस सत्र में खाद्य उद्योग के बड़ी संख्या में प्रतिनिधियों ने भाग लिया। प्राधिकरण के अनुसार, उद्योग की यह सक्रिय भागीदारी इस बात का संकेत है कि खाद्य कंपनियाँ लेबलिंग और विज्ञापन अनुपालन को लेकर अधिक सजग हो रही हैं।

गौरतलब है कि FSSAI पहले से ही देशभर में खाद्य सुरक्षा मानकों के गंभीर उल्लंघन पर FBO के विरुद्ध लगातार कार्रवाई करता रहा है। यह प्रशिक्षण उसी व्यापक अनुपालन अभियान का हिस्सा माना जा रहा है।

फ्रंट-ऑफ-पैक लेबलिंग की बढ़ती माँग

यह प्रशिक्षण ऐसे दौर में आया है जब अधिक चीनी, नमक और संतृप्त वसा वाले पैकेज्ड उत्पादों पर स्पष्ट पोषण चेतावनी लेबल लगाने की माँग तेज़ हो रही है। उपभोक्ता संगठनों और स्वास्थ्य विशेषज्ञों का मानना है कि पैकेजिंग के अग्र भाग पर सुस्पष्ट चेतावनी से आम उपभोक्ता को स्वस्थ विकल्प चुनने में सहायता मिलेगी।

सर्वोच्च न्यायालय की चिंता और सरकार का रुख

न्यायमूर्ति जे.बी. पारडीवाला और न्यायमूर्ति के. विनोद चंद्रन की पीठ ने पहले की सुनवाई में केंद्र सरकार से पूछा था कि मज़बूत पोषण चेतावनी प्रणाली लागू करने की दिशा में अब तक क्या ठोस कदम उठाए गए हैं। पीठ ने यह भी स्पष्ट किया कि विशेष रूप से बच्चों के स्वास्थ्य के मामले में किसी भी तरह का समझौता स्वीकार्य नहीं है।

अदालत ने उन तर्कों को भी खारिज किया जिनमें कहा गया था कि कड़े वार्निंग लेबल से खाद्य उत्पाद निर्माताओं के व्यावसायिक हितों पर प्रतिकूल असर पड़ सकता है। पीठ ने स्पष्ट शब्दों में कहा कि अंतिम निर्णय उपभोक्ता का होता है और व्यावसायिक हितों को सार्वजनिक स्वास्थ्य से ऊपर नहीं रखा जा सकता।

एक पूर्व सुनवाई में केंद्र सरकार ने अंतरराष्ट्रीय मानकों के अनुरूप चेतावनी प्रणाली लागू करने में व्यावहारिक चुनौतियों का हवाला दिया था, जिसे सर्वोच्च न्यायालय ने अस्वीकार करते हुए कहा कि भारत सार्वजनिक स्वास्थ्य सुरक्षा में देरी के लिए विदेशी मानकों का बहाना नहीं बना सकता।

आगे क्या होगा

सर्वोच्च न्यायालय ने केंद्र सरकार से प्रस्तावित लेबलिंग ढाँचे का पूरा विवरण माँगा है और जवाब दाखिल करने के लिए समय दिया है। अदालत ने संकेत दिया है कि यदि ठोस प्रगति नहीं दिखाई गई तो वह आवश्यक निर्देश जारी कर सकती है। FSSAI का यह प्रशिक्षण कार्यक्रम उस दबाव के बीच खाद्य उद्योग को अनुपालन के लिए तैयार करने की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम है।

संपादकीय दृष्टिकोण

लेकिन असली सवाल यह है कि प्रशिक्षण से अनुपालन तक की दूरी कितनी जल्दी पाटी जाएगी — खासकर जब सर्वोच्च न्यायालय सरकार को घेरे हुए है। फ्रंट-ऑफ-पैक लेबलिंग पर भारत वर्षों से विचार-विमर्श कर रहा है, जबकि चिली, मेक्सिको और ब्राज़ील जैसे देश इसे लागू कर चुके हैं। खाद्य उद्योग के 'व्यावहारिक चुनौतियों' वाले तर्क को अदालत ने खारिज किया है, फिर भी नीतिगत प्रगति धीमी है। जब तक लेबलिंग नियम बाध्यकारी और सत्यापन-योग्य नहीं बनते, ये प्रशिक्षण सत्र जागरूकता की औपचारिकता बनकर रह सकते हैं — उपभोक्ता सुरक्षा का ठोस ज़रिया नहीं।
RashtraPress
14 अगस्त 2026

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

FSSAI ने यह प्रशिक्षण कार्यक्रम क्यों आयोजित किया?
FSSAI ने खाद्य कारोबार संचालकों को लेबलिंग, डिस्प्ले, विज्ञापन और दावों से जुड़े नियमों की जानकारी देने के लिए यह सत्र आयोजित किया। यह कदम ऐसे समय उठाया गया है जब पैकेज्ड फूड पर पोषण चेतावनी लेबल को लेकर सार्वजनिक और न्यायिक दबाव बढ़ रहा है।
फ्रंट-ऑफ-पैक वार्निंग लेबल क्या होता है और यह क्यों ज़रूरी है?
फ्रंट-ऑफ-पैक वार्निंग लेबल पैकेजिंग के अग्र भाग पर स्पष्ट रूप से यह बताता है कि किसी उत्पाद में चीनी, नमक या संतृप्त वसा की मात्रा अधिक है। उपभोक्ता संगठनों और स्वास्थ्य विशेषज्ञों के अनुसार, इससे आम उपभोक्ता खरीदारी से पहले सोच-समझकर निर्णय ले सकता है।
सर्वोच्च न्यायालय ने इस मामले में क्या कहा है?
न्यायमूर्ति जे.बी. पारडीवाला और न्यायमूर्ति के. विनोद चंद्रन की पीठ ने केंद्र सरकार और FSSAI से पूछा है कि पोषण चेतावनी प्रणाली लागू करने में देरी क्यों हो रही है। अदालत ने स्पष्ट किया कि बच्चों के स्वास्थ्य से समझौता नहीं किया जा सकता और व्यावसायिक हितों को सार्वजनिक स्वास्थ्य से ऊपर नहीं रखा जा सकता।
केंद्र सरकार ने लेबलिंग में देरी पर क्या तर्क दिया और अदालत ने क्या कहा?
केंद्र सरकार ने अंतरराष्ट्रीय मानकों के अनुरूप पोषण चेतावनी प्रणाली लागू करने में व्यावहारिक चुनौतियों का हवाला दिया था। सर्वोच्च न्यायालय ने इस दलील को अस्वीकार करते हुए कहा कि भारत सार्वजनिक स्वास्थ्य सुरक्षा में देरी के लिए विदेशी मानकों का बहाना नहीं बना सकता।
इस मामले में आगे क्या होने की संभावना है?
सर्वोच्च न्यायालय ने केंद्र सरकार से प्रस्तावित लेबलिंग ढाँचे का पूरा विवरण माँगा है। यदि ठोस प्रगति नहीं दिखाई गई तो अदालत आवश्यक निर्देश जारी कर सकती है; FSSAI का यह प्रशिक्षण उसी संदर्भ में उद्योग को अनुपालन के लिए तैयार करने की कोशिश मानी जा रही है।
राष्ट्र प्रेस
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