SEBI का बड़ा स्पष्टीकरण: चचेरे भाई-बहन भी बन सकते हैं कंपनी में स्वतंत्र निदेशक
सारांश
मुख्य बातें
भारतीय प्रतिभूति और विनिमय बोर्ड (SEBI) ने 2 जून को एक अहम स्पष्टीकरण जारी करते हुए कहा कि किसी कंपनी के प्रमोटरों या निदेशकों के चचेरे भाई-बहनों को लिस्टिंग नियमों के तहत स्वतः ‘रिलेटेड पर्सन’ नहीं माना जाएगा। इस व्याख्या से अन्य वैधानिक शर्तें पूरी होने पर ऐसे चचेरे भाई-बहनों के लिए सूचीबद्ध कंपनियों में स्वतंत्र निदेशक के पद पर नियुक्ति का रास्ता साफ हो गया है।
मामला कैसे उठा
यह स्पष्टीकरण मैथन अलॉयज द्वारा मांगे गए अनौपचारिक मार्गदर्शन (informal guidance) के जवाब में आया है। कंपनी ने नियामक से व्याख्या मांगी थी कि क्या प्रमोटर समूह के किसी सदस्य का चचेरा भाई मौजूदा नियमों के तहत स्वतंत्र निदेशक के रूप में नियुक्ति के लिए योग्य हो सकता है।
यह सवाल तब उठा जब कंपनी ने प्रमोटर समूह के एक सदस्य से संबंधित व्यक्ति को नियुक्त करने का प्रस्ताव रखा और जानना चाहा कि क्या यह नियुक्ति SEBI के लिस्टिंग दायित्व और प्रकटीकरण आवश्यकताएं (LODR) विनियमों की स्वतंत्रता शर्तों का उल्लंघन करेगी।
‘रिश्तेदार’ की परिभाषा क्या कहती है
बाजार नियामक के अनुसार, इस प्रश्न का उत्तर लागू कानूनों में ‘रिश्तेदार’ की कानूनी परिभाषा पर निर्भर करता है। SEBI ने स्पष्ट किया कि कंपनी अधिनियम और LODR विनियमों के तहत ‘रिश्तेदार’ की परिभाषा केवल निकट परिवार के सदस्यों — पति/पत्नी, माता-पिता, बच्चे और सगे भाई-बहनों — तक सीमित है, और इसमें चचेरे भाई-बहन शामिल नहीं हैं।
कंपनी द्वारा प्रस्तुत तथ्यों की जांच के बाद नियामक ने कहा कि स्वतंत्र निदेशक की पात्रता का आकलन करते समय चचेरे भाई-बहनों को स्वतः ‘संबंधित व्यक्ति’ की श्रेणी में नहीं रखा जाएगा। इस आधार पर प्रस्तावित उम्मीदवार स्वतंत्र निदेशक के रूप में नियुक्ति के योग्य हो सकते हैं।
शर्तें अभी भी लागू
हालांकि SEBI ने यह भी रेखांकित किया कि कंपनियों को अन्य सभी स्वतंत्रता आवश्यकताओं का अनुपालन जारी रखना होगा। इनमें शेयरधारिता, वित्तीय हित, आर्थिक संबंध और अन्य वैधानिक परीक्षणों से जुड़ी शर्तें शामिल हैं।
नियामक ने यह भी कहा कि उसका यह मार्गदर्शन पूरी तरह आवेदक द्वारा प्रस्तुत तथ्यों पर आधारित है, और इसे SEBI का बाध्यकारी निर्णय नहीं माना जाना चाहिए। अलग तथ्य या परिस्थितियाँ होने पर व्याख्या भी भिन्न हो सकती है।
क्यों मायने रखता है यह स्पष्टीकरण
गौरतलब है कि भारतीय सूचीबद्ध कंपनियों में स्वतंत्र निदेशकों की नियुक्ति को लेकर कॉर्पोरेट गवर्नेंस के मानक पिछले कुछ वर्षों में लगातार सख्त हुए हैं। ऐसे में चचेरे भाई-बहनों को लेकर रही अस्पष्टता का दूर होना प्रमोटर-नियंत्रित परिवार-आधारित व्यापारिक समूहों के लिए राहत भरा माना जा रहा है, जो भारत में कॉर्पोरेट परिदृश्य का बड़ा हिस्सा हैं।
आगे आने वाले महीनों में यह देखना अहम होगा कि कितनी सूचीबद्ध कंपनियाँ इस स्पष्टीकरण का उपयोग बोर्ड संरचना में बदलाव के लिए करती हैं, और क्या निवेशक समूह व प्रॉक्सी सलाहकार फर्में इस व्याख्या पर कोई नई बहस छेड़ती हैं।